*दोहा-बिहतरा कपड़ा*
चार हाथ के चेंदरा, कइसन रीत निभाय।
काम आय ना काखरो, नाँचत खाँध लजाय।।
कोनो हर पहिरय नही, नइ कोनो हर भाय।
फेर इही फरिया बिना, पहुना घात रिसाय।।
कपड़ा नेंग बिहाव के, देथन जे उपहार।
देखा-देखी मा बने, लिलहर के मुड़ भार।।
विरथा उरकय जेब हर, पनकत साहूकार।
फँसत उधारी मा कहूँ, बेंचत खेती-खार।।
लेनदेन मा हे टिके, अगर प्रेम व्यवहार।
फेर हमर रिश्ता नता, हाबय सब बेकार।।
हमर प्रीत के बीच मा, वस्तु बनय आधार।
चिंतन करव सुजान तब, माँगत समय सुधार।।
सोंच बने आवय नही, जब ये कखरो काम।
फेर दिखावा ले भला, का मिलही परिणाम।।
सुग्घर छाँट निमार के, देथन भारी दाम।
तब ले आय पसंद ना, देवव फेर विराम।।
का गिनहा बनही बने, नइहे जब उपयोग।
अइसन रीति रिवाज तब, हे समाज बर रोग।।
नवाँ गृहस्थी ला मिलय, जमके आशीर्वाद।
दव पंदोली थोरकिन, हो जाही आबाद।।
दू आत्मा मिलथे जिहाँ, होवय जबर उछाव।
फरिया खातिर फेर झन, मन मा आय कुभाव।।
प्रथा कहूँ अड़चन बनय, करय विवश लाचार।
छोंड़व जुन्ना रीत तब, टोरव ये दीवार।।
लगे रीत मा खोट जब, करलव बने विचार।
सुधर जही मतभेद हा, बस लगही दिन चार।।
बनही परिपाटी नवाँ, करबो जब व्यवहार।
बढ़ही देश समाज हा, होही नित उजियार।।
🙏🙏🙏🙏
नारायण प्रसाद वर्मा *चंदन*
ढाबा-भिंभौरी, बेमेतरा छग
7354958844
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