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Sunday, September 9, 2018

पोरा विशेषांक - छन्द के छ परिवार












चौपई छन्द - 

कइसे मानन हमू तिहार।
दँउड़ावन बइला ला यार।।
बइला चुलहा चकला जान।
बरतन भाँड़ा सबो मितान।।

माटी के बरतन सब लान।
नोनी बाबू खेलन जान।।
हर तिहार के महिमा ताय।
खेल खेल मा देत बताय।।

जीये बर सब लागै चीज।
खेलत खेलत सीख तमीज।।
आज ठेठरी डटके खाव।
सुग्घर पोरा  परब मनाव।।

सूर्यकांत गुप्ता..सिंधिया नगर दुर्ग(छ्त्तीसगढ़)

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शंकर छंद - बोधन राम निषाद राज
(1)
हमर राज के जाँता चुकिया,देख सुग्घर आय।
घर घुँदिया मा कइसे साजे,बइला ला सजाय।।
नन्दी  बइला  ला  दउड़ावय,खोर  चारो ओर।
जघा-जघा मा होवत हावय,खेल फुगड़ी सोर।।
(2)
रंग-रंग  के  बने  खजानी, ठेठरी  ला भाय।
लउहा-लउहा टूरी टूरा,आज खुरमी खाय।।
मन उछाह भर जाथे तन मा,अइसन जी तिहार।
मया बँधाथे जम्मो  घर मा,होय खुश परिवार।।
(3)
पटकत पोरा हाँसत कुलकत,नोनी घलो आय।
चीला  चौंसेला ला  राँधत, दाई ह मुस्काय।।
बइठ नँगरिहा बइला बाँधत,कोठा म सुरताय।
बच्छर भर के ये पोरा ला,देखौ सँग मनाय।।

छंदकार:- बोधन राम निषाद राज
सहसपुर लोहारा,कबीरधाम(छ.ग.)

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कइसे के मानँव पोरा (लावणी छंद-गीत)

अब दुकाल के संसो सँचरे, मन मा परगे बड़ फोरा।
खेत किसानी करजा बूड़े, कइसे के मानँव पोरा।....
बहिनी बेटी बछर बखत मा, मइके के करथें सुरता।
का होही अब थोर-थार मा, कइसे लँव लुगरा कुरता।
जिवरा हा लेसावत हावय, मन होवत हे मनटोरा।-१
कइसे के मानँव पोरा......
चढ़ही कामा तीन तेलई, कइसे के करू करेला।
सावन भादो सुक्खा बीतय, बाढ़त हे सरी झमेला।
बादर बैरी का ठिकना हे, करते हँव तभो अगोरा।-२
कइसे के मानँव पोरा..........
बने-बने के तीज तिहार सब, सम्मत मा सबो सुहाथे,
रिंगी चिंगी रहना बसना, सबके मन 'अमित' लुहाथे।
चिरहा चड्डी फटहा बण्डी, गुनँव फिकर मा भिड़े कछोरा।-3
कइसे के मानँव पोरा.........

✍ *कन्हैया साहू "अमित"*✍
शिक्षक~भाटापारा,
जिला-बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
©संपर्क~9200252055®
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सार छंद - 

दीदी बहिनी जम्मो झन ला, नँगते रहिस अगोरा।
धरके जी खुशहाली सब बर, आये हाबय पोरा।1।
घर घर आये हाबय संगी,पहुना बेटी-माई।
मनवाये बर पोरा तीजा, लाये हाबयँ भाई।2।
नँदिया बइला सजगे हाबय, सजगे चुलहा चुकिया।
जाँता धरके बइठे हाबय, देखव भाँची सुखिया।3।
करत हवयँ जी पूजा मिलके, घर भर माई पीला।
जेंवाये बर राँधे हाबयँ, गुरहा भजिया चीला।4।
नँदिया बइला ला भाँचा मन, झींकयँ धरके डोरी।
हवयँ चलावत गुड़गुड़ गुड़गुड़, देखव ओरी ओरी।5।
जुरियाये सब दीदी बहिनी, बइठे हवयँ दुवारी।
नवा नवा गा लुगरा पहिरे, खुश हाबयँ जी भारी।6।

रचना- मनीराम साहू 'मितान'
कचलोन(सिमगा) , जिला - बलौदाबाजार, छत्तीसगढ़

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पोरा(ताटंक छंद)

बने हवै माटी के बइला,माटी के पोरा जाँता।
जुड़े हवै माटी के सँग मा,सब मनखे मनके नाँता।
बने ठेठरी खुरमी भजिया,बरा फरा अउ सोंहारी।
नदिया बइला पोरा पूजै, सजा आरती के थारी।
दूध धान मा भरे इही दिन,कोई ना जावै डोली।
पूजा पाठ करै मिल मनखे,महकै घर अँगना खोली।
कथे इही दिन द्वापर युग मा,कान्हा पोलासुर मारे।
धूम मचे पोला के तब ले,मनमोहन सबला तारे।
भादो मास अमावस पोरा,गाँव शहर मिलके मानै।
हूम धूप के धुँवा उड़ावै,बेटी माई ला लानै।
चंदन हरदी तेल मिलाके,घर भर मा हाँथा देवै।
धरती दाई अउ गोधन के,आरो सब मिलके लेवै।
पोरा पटके परिया मा सब,खो खो अउ खुडुवा खेलै।
संगी साथी सबो जुरै अउ,दया मया मिलके मेलै।
बइला दौड़ घलो बड़ होवै,गाँव शहर मेला लागै।
पोरा रोटी सबघर पहुँचै,भाग किसानी के जागै।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया", बाल्को(कोरबा)

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घनाक्षरी (पोरा तिहार )

बैला माटी के बना ले,रंग रंग के सजा ले,
चार पाँव चक्का डार, बने पहिराव जी।
माथा मा टीका लगा दे,फूल माला पहिरादे,
पूजा पाठ करेबर, सुग्घर सजाव जी।
पोरा के तिहार आये,रोटी पीठा ला बनाये,
दाई माई दीदी संग, पोरा फोर आव जी।
आनी बानी खेल खेलौ,बोछडे सखी ले मिलौ,
सुख दुख बाँट सबो,तिहार मनाव जी।
दिलीप कुमार वर्मा , बलौदा बाज़ार

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।। छन्न पकैया छंद ।।
छन्न पकैया छन्न पकैया,आगे तीजा पोरा।
झटकुन आबे तैंहर बहिनी,सुनले ओ मनटोरा।।
छन्न पकैया छन्न पकैया,रखले जोरन जोरे।
लाने हांवव तीजा लुगरा,सुनले बहिनी मोरे।।
छन्न पकैया छन्न पकैया,मया पिरित ला बाँधे।
किसम किसम के रोटी तैंहर,राखे रहिबे राँधे।।
छन्न पकैया छन्न पकैया,नाँदा बइला लाहूँ।
भाँचा भाँची संगे लाबे, बइठे मैं खेलाहूँ।।
छन्न पकैया छन्न पकैया,कपड़ा नावा लेंहा।
भाँचा भाँची बर हे सब हा, सुनले बहिनी तेंहा।।
छन्न पकैया छन्न पकैया,सबके सुरता आथे।
पोरा धर के सबो सखी मन,पटके बर गा जाथे।।
छन्न पकैया छन्न पकैया,बहिनी मन के पोरा।
आथे भइया हमरों कहिके,वोमन करय अगोरा।
राजेश कुमार निषाद , ग्राम चपरीद पोस्ट समोदा तहसील आरंग जिला रायपुर (छ. ग.)

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शंकर छन्द--पोरा-

हमर गाँव मा पोरा के दिन, गाँव भर सकलाँय।
ढंग-ढंग के खेल करावँय,बइला ल दँउड़ाँय।
फुगड़ी खोखो दौंड़ कबड्डी, होय सइकिल रेस।
माई-पिल्ला सब झन आवँय,साज सुघ्घर भेस।।१।।
बहिनी मन मइके आयें हें,पोरा के तिहार।
सजे हवय दाई घर अँगना, हाँसय मुख निहार।
बइला मन के छुट्टी हावय, होत हावय साज।
सुघ्घर सज-धज दँउड़ लगाहीं,खाँय जेवन आज।।२।।
किसिम-किसिम के बने कलेवा,सबो जुर-मिल खाव।
ठेठरी-खुरमी बरा सुहारी,मजा गुझिया पाव।
बाबू नाँगर नोनी जाँता,मगन खेलँय खेल।
पोरा के दिन खुशी मनावव,होवय हेल मेल।।३।।

--नीलम जायसवाल(भिलाई)--

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पोरा  (लावणी छंद )

भारत माँ के अबड़ दुलौरिन , माटी हे छत्तीसगढ़ के ।
लोग इहाँ के सिधवा हितवा , धरम करम मा बढ़ चढ़ के ।।
नाँगर बइला संग मितानी , जतन करइया धरती के ।
उवत सुरुज ला जल देवइया, पाँव परइया बूड़ती के ।।
रंग रंग के परब मनइया, होली अउ देवारी जी ।
रक्षाबंधन आठे पोरा , तीजा रहिथे नारी जी ।।
पोरा के महिमा हे भारी , बइला के पूजा करथें
बेटी बहिनी पटके पोरा , मइके के बिपदा हरथें।।
पोरा मा भरके रोटी ला, आथें पटक दुबट्टा जी ।
लइका मन रोटी ला खाथें , करथें लूट झपट्टा जी ।।
गाँव गाँव मा बैल दउँड़ अउ , खुडुवा खो खो  होथे जी ।
नोनी मन जब सुवा नाँचथें , देखत खुशी उनोथे जी ।।
शिव के हवय सवारी नंदी , बैल रूप मा सँगवारी ।
पोरा के दिन ओकर भाई , मान गउन होथे भारी ।।
बइला ला जी नँहवा धोके , सब किसान पूजा करथें ।
तिलक सार के करैं आरती , माथ नवाँ पइयाँ परथें ।।
भाँचा भाँची लइका मन बर , खेलौना लेथें भारी ।
माटी के चुकिया सँग जाँता , माटी के चूल्हा थारी ।।
मिहनत के जी शिक्षा देथे ,  बइला चूल्हा बचपन ले ।
छत्तीसगढ़िया मन के हिरदे , रहिथे भरे समरपन ले ।।

छन्दकार - श्री चोवाराम "बादल"