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Sunday, July 26, 2020

छप्पय छन्द - अजय अमृतांशु

छप्पय छन्द - अजय अमृतांशु

लहूदान :-
करव लहू के दान, बचाना जिनगी हावय।
जउन करय ये काम, खुशी जीवन भर पावय।
पूजत हव भगवान, यहू तो पूजा होथे।
बिना लहू के देख, अबड़ झन जिनगी खोथे।
लहूदान के काम हा, सिरतो देथे जान जी।
अइसन काम ल देख के, खुश होथे भगवान जी।

परिवार :-
आवव जुरमिल काम, करे बर जाबो सब झन।
सुमत रहय परिवार, तभे जी बनही जन धन ।
अब दुरमत के बीज, नहीं हे हम ला बोना।
सुमत रखव परिवार, छोड़ के रोना धोना ।
अपन बुता मा ध्यान रख, जावव झन तुम छोड़ के
मिहनत करना हे धरम, का मिलही मुँह मोड़ के।

मोबाइल:-
मोबाइल बरबाद, करत हे लइका मन ला।
मानत नइ हे बात, बिगाड़त हावय तन ला।
रात रात भर जाग, अपन आँखी ला फोड़य।
खाना छूटय फेर, कहाँ मोबाइल छोड़य।
मोबाइल ला छोड़ही, सुग्घऱ बनही काम हा।
लइका मन पढ़ही तभे, होही जग मा नाम हा।।

छंदकार - अजय अमृतांशु
भाटापारा, छत्तीसगढ़