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Sunday, August 9, 2026

विष्णु पद छंद गीत- *गुरु महिमा*

 विष्णु पद छंद गीत- *गुरु महिमा*


माथ नवावँव गुरु चरनन मा, शत-शत वंदन हे।

गुरु के ज्ञान सरोवर जइसे, शीतल चंदन हे।।


गुरु ही सत के राह दिखाथे, उँगरी ला धरके।

मन मा निरमल ज्ञान बहाथे, झरना कस झरके।।

गुरु के तप आगी मा तपके, चमके कुंदन हे।

माथ नवावँव गुरु चरनन मा, शत-शत वंदन हे।।


भव सागर ले पार लगइया, बन पतवार खड़े।

ज़िनगी मा गुरु ज्ञान कवच बन, हे रखवार बड़े।।

मानवता के भाव धरे गुरु, बन सुखनंदन हे।

माथ नवावँव गुरु चरनन मा, शत-शत वंदन हे।।


अगम अगोचर गुरु के महिमा, संत सुजान कहे।

पा के गुरु के सत संगत ला, लोभ घमंड ढहे।।

सत्यबोध कर जोर करे नित, गुरु अभिनंदन हे।

माथ नवावँव गुरु चरनन मा, शत-शत वंदन हे।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)22/07/2026

रोला-छंद

 रोला-छंद 


छत्तीसगढ़ी लोकगीत के गौरव

1- 

रामचंद जी नाम, सुनव सब छत्तिसगढ़िया । 

लोकमंच हे देन ,  चंँदैनी गोंदा बढ़ि‌या ॥ 

राहय साव खुमान, धरै संगीत ल सुर मा । 

जम जावय सुरताल, धूम मातै रइपुर मा ।।

2-

जनकवि कोदूराम, रचै माटी के गाना । 

सुन के लागय गाँव, हवै जी कतिक सुहाना ।। 

मस्तुरिया के गीत, जीत लेथय जनमन ला । 

करथे भाव विभोर, सुहाथे जी जन- जन ला।।

3-

कौशल भाइ मुकुंद, लिखै बड़ रचना सुघ्घर । 

दानेश्वर जी गीत, रचै बड़ उज्जर-उज्जर ॥ 

चंद्राकर जी प्रेम, गिरीवर लिखथें गाना। 

छत्तिसगढ़ के सौंध, रिथे सब ताना-बाना ॥

4- 

नारायण परमार, लिखै जीवन यदु रचना । 

धनहा खेती खार, पेड़ अउ माटी पखना ॥ 

रामेश्वर के लेख, सुहाथे सब ला भारी । 

बद्री लाल विशाल, नरेन्द सबो संँगवारी ॥

5-

दूधमोंगरा के नाम, सुनत मन हा ममहाथे।

मास्टर पीसी लाल, जनक जेखर कहलाथे।।

गायक रचनाकार, कलम मा ताकत भारी।

लिखथें बढ़िया शोध, पढ़ै जी सब नर नारी ।।

6-

गायक जब केदार, उठै सब के मन मोहय । 

जब-जब गावय गीत, कंठ मा मदरस पोहय ॥ 

परस जवाहर लाल, पवन अउ नवल ह गावय । 

लगय कृष्ण ब्रजधाम, बाँसुरी मधुर सुनावय।

7-

पंचराम के गान, संग मा जनता बाचैं । 

बैतल थिरके मंच, झूम के लोगन नाचैं।।

गजानंद अनुराग, तान मा सुघ्घर गाथें । 

बिंदु खुशी जी दास, गजब के लय लहराथें ।।

8-

दुखिया धुरवा राम, बटोरँय कसके ताली । 

ममता जब जब गाँय, मंच नइ राहय खाली ॥ 

बासंती देवार, कंठ सरस्वती बिराजै। 

गावय पुनम विराट, आँख मा आँसू साजै ॥

9- 

गायक गौतम चंद, कान मा मदरस घोलय।

कविता के आवाज, खनक जस मयना बोलय ।। 

लता खापर्डे गाँय, लगै कोयल के बानी । 

सफरी गीत सुनाय, करेजा होवय चानी ॥

10- 

आवय भैया लाल, मंच मा गदर मचावँय । 

हेड़ाऊ जी और, कहत जनता चिल्लावँय ॥ 

हिरवानी महदेव, बाँध के सुर ला साजँय । 

गोरे बर्मन गाँय, सुनत जनता पगलावंँय ।।

11- 

प्रीतम झल्लूराम, द्वारिका गावंँय बढ़िया ।

लागय सुघ्घर नीक, मदन जी छत्तिसगढ़िया ।। 

मंसूरी संतोष, कुलेश्वर हा जब गावँय । 

सुन लेवन इक बार, कान मा उही सुनावँय ।।

12- 

गावय शेख हुसैंन, बढ़े दिल के बड़‌ धड़कन । 

सुनन भगत के गीत, दही बासी हम झड़कन ॥ 

माधव जी जब गाँय, गाँव के दरशन होवय । 

ललिता गीत सुनाय, प्रेमिका मन-मन रोवय ।।

13-

आशा येलिस जान, साधना संग जयंती । 

गावय गंगादास, अनचुरी अउ कुलवंती || 

अलका कंचन गाँय, निर्मला कंठ सुहावय । 

चतुर कांति के गीत, शैल छाया मन भावय ॥ 

14- 

ज्योती सुघ्घर मीठ, सरसती गावय करमा । 

सीमा गावय गीत, गूँजै सब के घर-घर मा ।। 

रेखा रजनी संग, सुमित्रा गुरुतुर बोली। 

साधराम के शोर, कुवाँरा लागय भोली ।।

15- 

सुर मा राजकुमार, रामनारायण बानी । 

गयाराज के बोल, आँख मा लावय पानी ।। 

रविशंकर सुरेन्द्र, संजना स्वर के ग्यानी । 

दीपक लालू गाँय , चढ़े सब लोग जुबानी ।।

16- 

मुरली जी मन भाय, कुसुम ठाकुर अउ बरसन । 

महासिंग के बोल, सुने बर हम सब तरसन ।।

ननकी अउ मिथलेश, झुमुक झमकावय गाना । 

अउ किस्मत देवार, छेड़ दंँय नवा तराना ।।

17-

चिन्ता गंगाराम, नायडू सुर बड़ भाँजय । 

भुलुवा न्यायिक दास, गीत ला झाँझी माँजय ।। 

सुशील सीताराम, कलम के गजब सिपाही । 

हरिठाकुर के गीत, सबो के मन ला भाही ॥

18- 

नीता गीता भट्ट, फरीदा अउ सुरिखयारिन । 

गावंँय बढ़ि‌या गीत, मया के गठिया पारिन ।। 

सावित्री के गान, सुचित्रा स्वर फरियावय । 

अनुसुइया मन भाय, इंदिरा तान लमावय ॥

19- 

नील कमल लहराय, किरण शरमा सुर मीठी । 

स्वर्णा गरिमा गाँय, रुकय नइ कखरो सीटी ॥ 

पदमा पायल तान, छेड़ के गावंँय गाना । 

पुष्प लता नेताम, कंठ बड़ लगै सुहाना ।।

20-

फिरतु विष्णु अउ हेम, गजब के हावय मोती । 

लिखे भगवती गीत, सुनय सब चारों कोती ।। 

मीनाक्षी मन जीत, दीप माला के गाना । 

गावय गजब विवेक, झुमैं सब लोग दिवाना।।

21 -

गावंँय राम प्रसाद,अंजली शुक्ला सविता । 

लक्ष्मी सालिक राम, सुहावय सपना कविता ।। 

बिमला मुन्ना पाल, त्रिवेणी गावँय  बढ़िया। 

मेरी डिमान गाँय, चमन के लागय पुड़िया।

22- 

सुघ्घर लागय बोल, उदल गीता ध्रुव मथुरा । 

केशव सुनिता संग, उत्तरा गावँय गजरा ॥ 

सोनी जी घनश्याम, माधुरी नत्थू तोड़े । 

जीवन तीरथ राम, जानकी सुर बड़ छोड़े ।।

23- 

जय प्रकाश गजराज, शारदा बढ़िया गाथें । 

तुलसी गोराचंद, बखत मा सुरता आथें । 

मधु मेहत्तर राम, केशरी गौरी नीका । 

अनिता तोरणलाल, बिना सब लागय फीका ।।

24-

पदम मदन चौहान, अजय जलक्षत्री रेखा । 

सुर ला भाजँय खूब, करँव मैं कइसे लेखा ।। 

खोमचंद थनवार, मालती छाँया माया । 

सुघ्घर गावँय गीत, हिलोरय मन अउ काया ।।

25- 

पीलू रामाधार, सुशीला गावय ठमकय । 

अउ सुनील बंसोड़, धरे माइक ला बमकय ॥ 

भरय जोश दुष्यंत, गिरी नारायण बाबा । 

शशि नरेश झम गीत, लगै बड़ नावा-नावा ॥

26- 

रामशरण सुर साज, नर्मदा गाय ददरिया । 

पिताम्बर के संग, गाँय कमला हा बढ़ि‌या ।। 

चंदराम के गान, मधुलिका तुलसी गावय । 

कौशल उरमी संग, दलेश्वर के सुर भावय ॥

27- 

दुकालु जस सम्राट, कारतिक के जस गाना । 

चढ़ै देवता लोग, मँगै नरियर अउ बाना ।। 

जस गावय शहनाज, भकाभक देवन उनडंँय । 

दिलिप षडंगी मंत्र, पढ़ै देबी मन घुनडँय।।

28-

तीजन झाडूराम, पंड‌वानी के नायक । 

सुरुज उषा प्रहलाद, रीतु पूना बड़ गायक।।

मानदास के गीत, फिदा रेखा मन मोहय । 

देवदास इक नाम, नचावत पंथी सोहय ।।

29- 

शिव सुनील राकेश, अनुज के जादू भारी। 

रचना रचै मिनेश, सुनै मिलजुल सँगवारी ।। 

चम्पा मोना सेन, अनुपमा गावय जमके । 

आरु स्वेच्छा आज, कनक तारा कस चमके ।।

30- 

राहय बढ़िया राज , रेडियो घर-घर बाजय।

नवा बहुरिया रोज, सुनत पैरी ला माँजय ॥ 

भक्ति गीत के संग, सबेरा सबके होवय । 

जागंँय ओखर संग, ओखरे संग म सोवंँय।।

31- 

बाबू के चौपाल, दाइ के हे घर आँगन । 

लइका किसलय बाल, सुनय जे हे मनभावन ॥ 

बहिनी बिंदिया भाय, कहानी सुनथे बाई | 

जोहत रहिथे राह, फोन फरमाइश भाई ।।

32-  

युववाणी के गोठ, हमू मन उही म आथन । 

आथे भुइँया गोठ, सुने बर हम डट जाथन ।। 

कवि लेखक के बात, सुने बर बढ़िया मिलथे । 

सुघ्घर-सुघ्घर गोठ, कमल तरिया कस खिलथे ॥

33- 

आज-काल के गीत, लजावंँय लोगन सुन के । 

फुहड़ता भरमार, भरे हे जी चुन चुन के।। 

मिट जाही संस्कार, बनाहीं अइसन गाना । 

"शर्मा बाबू” रोय, आँख हो झन बन काना ॥


कमलेश प्रसाद शर्माबाबू 

कटंगी-गंडई जिला केसीजी 

 छत्तीसगढ़ 491888

साधक सत्र -20

प्रकाशनाधिन संकलन-छंद च्यवनप्राश

गुरु

 छ्न्द साधना गुरु हवै, सुग्घर लय संगीत।

अंतस मैल मिटात हे, बना अपन हे मीत।।


गुरु पँवरी मा हे नवा, सदा जोर कर माथ।

बिपत घड़ी मा देत हे, देव हमेशा साथ।।


गुरु के आशीर्वाद ले, जग ला लेवव जीत।

जन जन के मन मा भरौ, गुरुवर के ही गीत।।


कोटि-कोटि कर के जतन, जनम जनम गे बीत।

होय नहीं बिन गुरु कृपा, राम किशन ले प्रीत।।


गुरु के पँवरी मा हवै, जम्मो तीरथ धाम।

जेन भजे इन मन लगा, पावैं खुशी तमाम।।


गुरुवर तारनहार हे, करें सदा भव पार।

नाँव उबारत हे फँसे, बीच नदी मझधार।।


गुरु के पद नख मा हवै, शीतल गंगा नीर।

जिनकर पूजन ध्यान ले, कट जावै दुख पीर।।



कल्प वृक्ष गुरुदेव हे, जानैं मन के बात।

मन इच्छा पूरन करें, देत नवाँ सौगात ।।


मन करथे रहितेंव मँय, गुरुवर के ही ठाँव।

कारज कर हनुमान अस, सेवक मँय बन जाँव।।


     तातु राम धीवर 

भैंसबोड़ जिला धमतरी 

मो. 6267792997

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गुरुदेव के पँवरी मा सादर नमन वंदन हे!

हरि गीतिका छंद छत्तीसगढ़ के धार्मिक पर्यटन स्थल

 हरि गीतिका छंद 


छत्तीसगढ़ के धार्मिक पर्यटन स्थल


राजिम 

राजिम जिहाँ के धाम हे, बसथे उहाँ भगवान हा।

दरशन हवय वो रूप के, तरथे दुखी धनवान हा ॥


खिचरी लगे हे भोग मा, करमा खवाये हाथ मा ।

पावन त्रिवेणी हे घलो, देखव कुलेश्वर साथ मा॥


डोंगरगढ़ बमलाई

ऊँचा पहाड़ी मा बसे, देखव ग बमलाई सती ।

डोंगर हवै चारों मुड़ा, मैदान हे खाल्हे कती।

मनखे इहाँ सब दूर से, आवत रिथें सब वार मा ।

ज्योती जला वर माँगथें, उन चैत मास कुँवार मा ।।


सिरपुर

सिरपुर चलौ देखव उहाँ, तीरथ बरोबर लागथे ।

लक्ष्मण लला मंदिर हवै, देखत सबो दुख भागथे ।

आवत रिथें भिक्षुक इहाँ, धरमी सबोझन बौध के ।

चारों मुड़ा बिखरे हवय, अवशेष जुन्ना शोध के ।।


चम्पारन

वल्लभ इहाँ के हे गुरु, अउ नाम चम्पारन हवै ।

बड़ दिव्य आलौकिक भरे, ब्रजधाम कस येहा भवै।।

गोठान हे गोलोक कस, गिरिराज के ये धाम हे ।

शिवलिंग बिराजे हे घलो, कतकोन शिव के नाम हे ।।

खल्लारी

हे सीढ़ि‌याँ सुघ्घर बने, सौ आठ आगर साठ हे ।

साक्षात खल्लारी हवै, दुरलभ मनोहर पाठ हे।।

बइठे रिथे दू शेर हा, देखव उहाँ बनवाय हे ।

हे कामना कतको धरे, लोगन उहाँ सब आय हें ।।


घटारानी

देखौ घटा रानी सुघर, जल के बने परपात हे । 

चारों मुड़ा फइले बिकट, जंगल घलो मन भात हे ।।

रद्दा हवै उपर घलो, नीचे बने हे पास मा ।

जनता नँगत आवत रिथें,  दरशन करे के आस मा ।।


भोरमदेव

भोरम हवै बड़ देवता, फइले सघन वन घाँस हे।

लोगन धरे काँवर इहाँ, सावन उहाँ बर खास हे ।।

मंदिर जघा तरिया बने, वोटिंग करैं सब लोग जी ।

भोला दरस बर झूम के, आवत रिथें सब रोज जी ।।


शिवरी नारायण

शिवरी नरायण धाम हे, शबरी खवाइस बेर ला ।

आवत हवै देखत रिहिस, वो देख माया फेर ला।।

पा गे नरायाण के दरस, वो तप जघा अब धाम हे ।

पावन हवै तीरथ बरत, शिवरी नरायण नाम हे ।।


झलमला

बालोद मा चल देख लौ, मंदिर हवै बड़ भव्य जी ।

गंगा झलमला हा फबै, सोहत हवै बड़ दिव्य जी ।।

कैलाश कस भीतर गुफा, मैया रहै जस लोक मा ।

लहरात हे कतको जगह, तैं देख झंडा फोक मा ।।


चंडी माता

चंडी बिराजे हे चलौ, ऊँचा पहाड़ी पाठ मा ।

आवत रिथें दरशक उहाँ, घूँमत रिथें सब घाट मा ।।

वो बागबाहारा बड़ा, जंगल जिहाँ सब आत हें ।

"बाबू” घुँचापाली देखौ, भलुवा प्रसादी खात हें ।।


कमलेश प्रसाद शर्माबाबू 

(साहित्यकार छत्तीसगढ़ी भाषा)

 कटंगी-गंडई जिला केसीजी छत्तीसगढ़ 

छंद साधक -सत्र-20

(छंद के छः)

प्रकाशनाधिन संकलन-छंद च्यवनप्राश

गुरु पूर्णिमा

 गुरु पूर्णिमा



मोरो कर  दे गुरु उद्धार, आप  ह  सबके  पालनहार।

तब  चलथे  जम्मो  संसार, होथे  जिनगी  बेड़ा पार।।


बदले हस जीए के ढंग, सबला ले  हस  अपने संग।

तैही  सब के  प्राणाधार, तब  ले  होवत  नैया पार।।


सजथे सुग्घर जिनगी साज, खुशी ल भर के लाथे राज।

सँग-सँगवारी करथे बात, हँसी-खुशी के इहि सौगात।।


जे  हा  जपथे  गुरु के नाम, हर दिन होथे उँखरे काम।

वो भला-बुरा  करथे  भेद, काम-क्रोध  के  करथे छेद।।


विनती करबो गुरु के आज,खुलही भीतर दिल के राज।

आत्म ज्ञान के होही बोध, अड़बड़  करथे गुरुजी शोध।।


छंद-बंध के बहथे धार, अरुण निगम गुरुजी आधार।।

चेला मन ल बताथे सार, ओहा करत  हमर  उपकार।।


साधक  मन बर  मया  दुलार, छंद सिखैय्या बर उपहार।

फूल  हार  पहिराबो  साथ, चरणन  धूल  लगाबो  माथ।


इही  हमर  बर  खेती  खार, बीज छंद ला बोअन सार।

एहा  जही  बीज  भंडार,   कंपनी  ह  करही  उपचार।।

छंद छ के करथँव जोहार, सुग्घर  रहे  निगम  परिवार।

मिले बधाई हा भरमार, सुग्घर देवत छंद संस्कार।।


सुधि बुधि गुणि मन गुरुवर खास, करथँव मैंहा सब विश्वास।

लिखथँव महुँ हा बनके दास, बीतत हाबे सावन मास।। 

गुरु जी के मँय करँव बखान, सूझ - बूझ ले बढ़थे शान।

गुरतुर बोली के पहिचान, हाथ जोड़ करथँव गुणगान।।


धर्मेंद्र कुमार श्रवण शिक्षाश्री 

बालोद

💐💐💐💐



गुरु

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शब्द-शब्द मा जेकर होथे,

सबो शास्त्र के सार।

तीन देव कस सँउहे गुरु के,

महिमा अगम अपार।।


जेहा चेला के हिरदे के,हर लेथे अज्ञान।

बरत रथे मन के मंदिर मा, जोत अखंड समान।।

मातु-पिता कस दया-मया के,जे छलकत भंडार।

तीन देव कस सँउहे गुरु के,महिमा अगम अपार।।


कइसे जीना हे दुनिया मा, जेन बताथे मर्म।

फोर-फोर समझाथे जे हा, का हे मानव धर्म।

अँगरी धर सद राह चलाथे, करथे बड़ उपकार।

तीन देव कस सँउहे गुरु के,महिमा अगम अपार।


मिलै नहीं सिरतो कोनो ला, कभू बिना गुरु ज्ञान।

गुरु के चरण वंदना करथें, संत सिद्ध भगवान।

गुरु के किरपा बिन साधक के, नइ होवय बढ़वार।

तीन देव कस सँउहे गुरु के,महिमा अगम अपार।।


टूटी-फूटी गुन गावत हँव, अड़हा चोवा राम।

पूज्यनीय गुरुदेव निगम के, सुमर-सुमर के नाम।

पाये हाववँ मैं जेकर ले,  छंद- सुधा रसधार।

तीन देव कस सँउहे गुरु के,महिमा अगम अपार।।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

हथबंद, छत्तीसगढ़

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छंद के छ महकत फुलवारी, फूल खिले सुख लाली।

अरुण निगम गुरु पेड़ बने हे, हम ओखर अन डाली।।


रंग बिरंगी छंद फूलवा, ये भुइँया के कोरा मा।

शब्द ज्ञान के भरय खजाना, छत्तीसगढ़ कटोरा मा।।

जतन करिन महतारी भाखा, बन के हम सब माली।

छंद के छ महकत फुलवारी, फूल खिले सुख लाली।।1


गाँठ बाँध के छंद लिखत हन, हम तो गोठ सियानी।

गाँव-गाँव अउ ठाँव-ठाँव मा, गूँजय छंद जुबानी।।

पुरखा सपना पूरा करबो, आज नही तो काली।

छंद के छ महकत फुलवारी, फूल खिले सुख लाली।।2


जोड़ रखे हे छोट बड़े ला, छंद मया के बानी।

सुमता समता के बिरवा ला, सींचत हन  दे पानी।।

छत्तीसगढ़ के छंद छाँव ले, आवय जग खुशहाली।

छंद के छ महकत फुलवारी, फूल खिले सुख लाली।।3


छंद के छ परिवार बने हे, छत्तीसगढ़ के माटी।

दया मया सुख दुख मिल बाँटय, सुग्घर हे परिपाटी।।

सकलाये हन साधक गुरु जन, मिलन परब दीवाली।

छंद के छ महकत फुलवारी, फूल खिले सुख लाली।।4


छंदकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

साधक: सत्र 2

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हावय गुरु के जन्मदिन, का देवँव उपहार।

देने वाला हा दिये, मया भरे संसार।।

मया भरे संसार, करत अरजी हम हावन।

गुरुवर ले आशीष, सदा दिन हम सब पावन।।

सुवासिता गुरु चाँद, गगन ला छूते जावय।

हर पल रहँय निरोग, कामना प्रभु से हावय।।


सुवासिता 


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[7/29, 6:34 AM] नारायण वर्मा बेमेतरा: *दोहा-गुरू वंदना*


करँव वंदना आरती, मन के दियना बार।

हरव मोर अज्ञानता, देवव ज्ञान फुहार।।


शरण परे हँव तोर मँय, हाबँव निचट गँवार।

हाथ मूड़ मा राख दे, भव ले पार उतार।।


बानी ले अमरित झरै, करथे बहुत दुलार।

दिल के सरल उदार बड़, हाबय गुरू हमार।।


दूधारी तलवार कस, लगथे ये संसार।

ज्ञान रतन हा सार हे, बाकी माया झार।।


मोर बुद्धि हे नानकुन, महिमा तोर अपार।

टूटी फूटी गात हँव, दुरगुन सबो बिसार।।


हाड़ माँस के देह मा, अइसन दिव्य विचार।

गुरू तोर पइँया परँव, कर मोरो उद्धार।।


🙏🙏🙏🙏

नारायण प्रसाद वर्मा *चंदन*

ढ़ाबा-भिंभौरी, बेमेतरा छग

7354958844

[7/29, 8:00 AM] अमृतदास साहू 12: सार छंद *गुरू महिमा*


गुरु के महिमा अड़बड़ भारी,होथें अवघड़ दानी।

शक्ति अतक के करयँ हंस जस,विरल दूध ले पानी।


कठिन तपस्या करके अड़बड़,शक्तिवान बन जाथें।

अपन तेज अउ तपो शक्ति ले, उजियारा बगराथें।

कहलाथें जग मा येमन हा,ऋषि मुनि ध्यानी ज्ञानी।

शक्ति अतक के करयँ हंस जस,विरल दूध ले पानी।


रहिथें‌ गुरु मन सहनशील अउ,दृढ़ निश्चय विश्वासी।

दुख पीरा चिंता हर लेथें,दूर भगाय उदासी।

सूरज कस चमके सूरत हा,अद्भुत अनुपम बानी।

शक्ति अतक के करयँ हंस जस,विरल दूध ले पानी।


विनम्रता के आवँय मूरत,सत के हरयँ पुजारी।

सादा जीवन जीथें सुग्घर,होथें गुरु बलिहारी।

करव सदा सदगुरु के संगत,होथें बड़ वरदानी।

शक्ति अतक के करयँ हंस जस, विरल दूध ले पानी।


अमृत दास साहू 

ग्राम कलकसा, डोंगरगढ़

[7/29, 8:12 AM] आशा देशमुख: गुरुपूर्णिमा के पावन अवसर मा मोर काव्य गुरु मन ला समर्पित काव्य पुष्प


गुरु चालीसा


दोहा


करत हवँव गुरु वंदना, चरणन माथ नँवाय ।।

भाव भक्ति मन मा धरे , श्रद्धा फूल चढ़ाय।।


सदा रहय गुरु के कृपा,अतकी विनती मोर।

अंतस रहय अँजोर अउ,भागे अवगुण चोर।।


चौपाई


गुरु ब्रह्मा अउ विष्णु महेशा। गुरु हे पहिली पूर्ण अशेषा।।

बरन बरन हे गुरु के वंदन।आखर आखर बनथे चंदन।।


 गुरु ला जानव सुरुज समाना।  गुरु आवय जी ज्ञान खजाना।।

गुरु जइसे नइहे उपकारी।गुरु के महिमा सब ले भारी।।


गुरु सउँहत भगवान कहाये। गुण अवगुण के भेद बताये।।

सात समुंदर बनही स्याही।गुरु गुण बर कमती पड़ जाही।।


गुरु के बल ला ईश्वर  जाने। तीन लोक  महिमा पहिचाने।।

गुरुवर सुरुज तमस हर लेथे। उजियारा जग मा भर देथे।।


जब जब छायअमावस कारी। गुरु पूनम  लावय उजियारी।।

गुरु पूनम के अबड़ बधाई।माथ नँवा लव बहिनी भाई।।


शिष्य विवेकानंद कहाये।परमहंस के मान बढ़ाये।।

द्रोण शिष्य हें पांडव कौरव ।अर्जुन बनगे गुरु के गौरव।।


त्याग तपस्या मिहनत पूजा।गुरु ले बढ़के नइहे दूजा।।

वेद ग्रंथ हे गुरु के बानी।पंडित मुल्ला ग्रंथी ज्ञानी।।


ज्ञान खजाना जेन लुटाए।जतका बाँटय बाढ़त जाए।।

गुरु के वचन परम हितकारी।मिट जाथे मन के बीमारी।।


जेखर बल मा हे इंद्रासन।बलि प्रहलाद करे हें शासन।।

ये जग गुरु बिन ज्ञान न पाये।गुरु गाथा हर युग हे गाये।।


सत्य पुरुष गुरु घासी बाबा। गुरु हे काशी गुरु हे काबा।।

 देवै ताल कबीरा साखी।

 उड़ जावय  मन भ्रम के पाखी।।


गुरु के जेन कृपा ला पाथे। पथरा तक पारस बन जाथे।।

माटी हा बन जावय गगरी। बूँद घलो हा लहुटय सगरी।।


महतारी पहली गुरु होथे । लइका ला संस्कार सिखोथे।।

देवय जे अँचरा के छइयाँ।दूसर हावय धरती मइयाँ।।


जाति धरम से ऊपर हावय।डूबत ला गुरु पार लगावय।।

आदि अनादिक अगम अनन्ता।जाप करयँ ऋषि मुनि अउ संता।।


गुरु के महिमा कतिक बखानौं।    ज्योति रूप के काया जानौं।।

बम्हरी तक बन जाथे चंदन। घेरी बेरी पउँरी वंदन।।


हाड़ माँस माटी के लोंदी।बानी पाके बोले कोंदी।।

पथरा के बदले हे सूरत। गढ़थे छिनी हथौड़ी  मूरत।।


भुइयाँ पानी पवन अकाशा।कण कण में विज्ञान प्रकाशा।।

समय घलो बड़ देथे शिक्षा।रतन मुकुट तक माँगे भिक्षा।।


अमर हवैं रैदास कबीरा। निर्गुण सगुण  बसावय मीरा।।

सातों सुर मन कंठ बिराजे। तानसेन के सुर धुन बाजे।।


कण कण मा गुरु तत्व समाये।सबो जिनिस कुछु बात सिखाये।।

गोठ करत हे सूपा चन्नी।कचरा ला छाने हे छन्नी।।


गुरु के दर हा सच्चा दर हे। मुड़ी कटाये नाम अमर हे।।

एकलव्य के दान अँगूठा। अइसन हे गुरु भक्ति अनूठा।।


श्रद्धा से गुरु पूजा करलव। ज्ञान बुद्धि से झोली भरलव।

जे निश्छल गुरु शरण म जावै।।अष्ट सिद्धि नवनिधि जस पावै।।


गुरु चालीसा जे पढ़े,ओखर जागे भाग।

दुख दारिद अज्ञानता ,ले लेथे बैराग।।


आशा देशमुख

एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा

[7/29, 8:29 AM] भागवत प्रसाद, डमरू बलौदा बाजार 15: अरुण निगम गुरुदेव हमर हें, खूब छंद विद्वान।

 साधक मन ला देवत हावँय, जम्मो छंद विधान।।


सहज-सरल व्यक्तित्व धनी हें,उत्तम हे व्यवहार। 

मिलनसार अरु मृदुभाषी हें,  सुंदर शील विचार।।

जन -मानस के हावँय प्रेमी, मनखे हवँय सुजान।

अरुण निगम गुरुदेव हमर हें,खूब छंद विद्वान।।



 करौं कामना शुभ भविष्य के, बाढ़य साल हजार।

हाँसत- मुस्कावत दिन गुजरे, सुख के हो गुलजार।।

उर विराट धर बनथें छोटे, ये ऊँखर पहिचान। 

अरुण निगम गुरुदेव हमर हें, खूब छंद विद्वान।।


भागवत प्रसाद चन्द्राकर🙏🙏🙏🙏🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹

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गुरु चरणन मा जेहर रहिथे, वो खुशहाल हवै |

ओखर जिनगी ले दुरिहा गा, सब जंजाल हवै ||


कतको घपटे अँधियारी हा, ज्ञान अँजोर करै ||

दिव्य ज्ञान ले पुंज प्रकाशित, सुग्घर भोर करै ||


सही गलत पहिचान करावय, शिक्षा दान करै |

तीनों लोक भुवन चौदा मा, थाथी ज्ञान भरै ||


गुरु के महिमा के दुनिया मा, अगम अनन्त हवै |

गुरु चरणन मा तन - मन अर्पित, मूड़ी रोज नवै ||


भाई कोनो कभू कपट छल, गुरु ले झन करहू |

ज्ञान बताये अमरित बानी, हिरदै मा धरहू ||


काम अबड़ आथे जिनगी मा, गुरु के ज्ञान दिए |

नाम तोर होवत दुनिया मा, वो पहिचान दिए ||


ज्ञानु


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[जग के खेवनहार गुरुजी ।

सबके पालनहार गुरुजी ।

जनम जनम के कालिख धोकर

ऐसे करे निखार गुरुजी ।

माया बीज सदा  को नाशै

है मेरे करतार गुरुजी ।

करुणा कृपा सदा बरसाते 

प्रेम भरे पुचकार गुरुजी ।

सत अरु असत दिखाएं हंसा

 हर जीवन का सार गुरुजी ।

[7/29, 11:06 AM] गुमान साहू: जलहरण घनाक्षरी 

।। गुरू महिमा।। 

गुरू गुण के खदान, गुरू देथे ज्ञान दान, पाके ज्ञान सब झन, जिनगी सँवार लव।

अज्ञान के अंधियार, देथे गुरू हर टार, ज्ञान के प्रकाश गुरू, सब उजियार लव।

पथरा ला सोना करे,गुरू वो पारस हरे, आके शरण इँखर, जिनगी उबार लव।

सच-झूठ भला-बुरा, भेद बतावय पूरा, जीवन सफर बर, रस्ता(रद्दा) चतवार लव।। 


-गुमान प्रसाद साहू 

समोदा (महानदी) 

साधक- सत्र-6

[7/29, 11:09 AM] Sumitra कामड़िया 15: दोहा-


गुरुवर संत सुजान है , गुरुवर ज्ञान प्रकाश। 

गुरुवर ग्रंथ कुरान है, गुरुवर से आकाश। ।


सुमित्रा शिशिर

[7/29, 11:09 AM] Sumitra कामड़िया 15: दोह- 


गुरुवर के वंदन करव, हे गुरु गुन के खान। 

अग्यानी ला ज्ञान दे, गुरुवर हवे  महान।। 


मिलथे गुरुवर भाग ले, खोजत फिरथे लोग। 

सँउहत मिलगे गुरु दरस, बने रहिस सँजोग।। 


भीतर मधुरस मीठ हे, ऊपर हवय कठोर। 

कोवँर मन भीतर रखय, अउ देवय बड़ जोर।। 


देवय दीक्षा ज्ञान के, गरब गुमान ल छोड़। 

रद्दा सहीं दिखाय के,  टूटे मन दे जोड़।। 


ज्ञान उजाला बाँट के, हृदय रखय पट खोल। 

भीतर उपजे आस ला, लेवत रहय टटोल।। 


कण-कण गुरु के बास हे, गुरुवर हे भगवान। 

पीरा हर हीरा करय, गुरुवर हे धनवान।। 


मात पिता हे गुरु हमर, येला नवाँव शीश। 

इँकर चरण मा हे सदा, अबड़ अकन आशीष।। 


सुमित्रा कामड़िया शिशिर "

[7/29, 11:09 AM] Sumitra कामड़िया 15: चरण कमल वंदन करूं, गुरुवर आप महान। 

मुझ अनगढ़ को गढ़ दिया, गुरुवर श्री भगवान। ।


भाव पुष्प अर्पित करूं, भरकर मन उल्लास। 

दीजै आशीर्वाद मम, याद रखे इतिहास। ।


सादर प्रणाम गुरुवर सदा आशीर्वाद बनाए रखिएगा 🌹🌹🙏🙏

[7/29, 11:09 AM] विजेन्द्र: गुरु

करथे जिनगी ला उजियार I 

माथ नवावँव बारंबार II

कतका हे गुरु के उपकार I

 उही लगाथे भव के पार II


बाँटय चेला मन ला ज्ञान I

 मूरख तको बनय विद्वान II

जिनगी सुग्घर वो सिरजाय I 

नेक राह ला धरव बताय II


खुलय ज्ञान के सबो कपाट I

 दमके सुग्घर उँकर ललाट II

गुरुवर के जे मानय बात I

 बइरी मन खा जावय मात II


अड़चन अलहन देवय टार I 

बोली-भाखा अमरित धार II

ज्ञान-दान के वोहर खान I

 गुरु ला देवव गा सम्मान II


गुरु ले बड़का हावय कोन I

 पथरा ला कर दय वो सोन II

हरथे मन के सबो विकार I

 जिनगी सुग्घर देय सँवार II


विजेंद्र


[7/29, 11:57 AM] बोधन जी: गुरु वंदना - मत्तगयंद सवैया 


श्री गुरु वंदन पाँव पखारत साँझ-बिहान सदा गुण गावौं।

हे गुरुदेव कृपा बरसादव ये जग मा मँय नाम कमावौं।।

ज्ञान बिना अँधियार सबो तुँहरे बिन थाह कहाँ मँय पावौं।

राह दिखा सद् मारग के मँय ज्ञान अँजोर हिया बगरावौं।।


मातु-पिता गुरुदेव तहीं अँगरी धरके लिखना सिखवाए।

आखर-आखर जोरत-जोरत छंद सुजान तहींच बनाए।।

सोझ चलौं सद् मारग मा अइसे बढ़िया  गुरु ज्ञान बताए।

आज उतार सकौं करजा नइ, हे गुरुदेव कृपा बरसाए।।


पार करौं भवसागर ले पतवार धरौ गुरुदेव उबारौ।

ये जग भार सहौं कतका अब जीव बियाकुल आवव तारौ।।

कोन इहाँ रखवार हवै गुरुदेव सम्हालौ काज सँवारौ।

हे विनती गुरुजी सुनले गलती कछु होय हमार बिसारौ।।


रचना :-

बोधन राम निषाद

[7/29, 6:09 PM] +91 89639 56080: दोहे

गुरु महिमा


अड़बड़ मया दुलार दय, हिरदे मा रख लेव।

राखय सब ला बाँध के, अरुण निगम गुरुदेव।।


सुरुज देव के सारथी, बन उजियारा लाय।

वइसन ही गुरुदेव हा, दया-मया बगराय।।


बरगद के जस पेड़ जी, देथे सुग्घर छाँव।

गुरुवर के आशीष हा, हावय शीतल ठाँव।।


छंद के छ परिवार ला, सींचय पिता समान।

राखय सबके ध्यान जी, अइसन हे अवदान।।


अनुशासित संस्कार दय, जइसे छंद बँधाय।

अंतस करय उजार गा, अवगुण सब मिट जाय।।


उषाकिरण निर्मलकर

मगरलोड

धमतरी(छत्तीसगढ़)

कुंडलियाँ छंद-डिजिटल दौर मा

 कुंडलियाँ छंद-डिजिटल दौर मा


डिजिटल इंडिया हा गजब, मारत हावै जोर।

तुरते होवय काम सब, हाँसे रोवँय चोर।।

हाँसे रोवँय चोर, खबर फइले आगी कस।

पाय बने मन मान, डरे मनखें दागी कस।।

बड़े होय या छोट, मिलत हावँय सबला बल।

सबके मन के बात, बतावय बेरा डिजिटल।।


हावी डिजिटल दौर हे, चारो कोती देख।

कई ऊँचाई ले गिरे, फिरे कई के लेख।।

फिरे कई के लेख, कई पछ्तावत तक हें।

घर लागे ना रोड, सबे कोती बकबक हें।।

करनी करही काय, कोन जन बेरा भावी।

सोच समझ बतियाव, हवै डिजिटल युग हावी।।


राखत हवै रिकार्ड ला, डिजिटल अपन मेर।

गुररावत हे साथ पा,  बकरी तक बन शेर।।

बकरी तक बन शेर, आज नाचत हे बन ठन।

चारी चुगली झूठ, आय आघू मन दनदन।।

सबके खोले पोल, देख कतको हें काँखत।

डिजिटल बेर रिकार्ड, सबे के हावय राखत।।


दिखगिस डिजिटल मा चरित, कइसन हावय कोन।

लोहा आये कोन हा, आय कोन हा सोन।।

आय कोन हा सोन, जान जावत हें दुनिया।

झूठ मूठ हे शोर, असल मा काँपे मुनिया।।

देखावा अउ झूठ, इही मा सबझन टिकगिस।

राजा प्रजा समेत, सबें के नीयत दिखगिस।।


सबझन इस्टाग्राम मा, करत हवँय बकलोल।

दुनिया ला बतलात हे, अपन जिया के बोल।।

अपन जिया के बोल, सबें झन हावैं बोलत।

कई नाच देखाय, कई झन हें विष घोलत।।

होही कलो हिसाब, बने आजे भर झन बन।

काखर का हे काम, गड़ाये आँखी सबझन।।


डिजिटल के बाजा बजिस, होगिस बत्ती गोल।

छोट लगत हे अउ ना बड़े, सबें कहें दिल खोल।।

सबें कहें दिल खोल, जिया मा जउने हावँय।

मन मुताबित गीत, सबें झन कइसे गावँय।।

पके झूठ सुन कान, करे जिवरा बड़ तलमल।

बनगे हे हथियार, आज ये बेरा डिजिटल।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


रिमझिम-रिमझिम-रिमझिम पानी

 ताटंक छन्द गीत

रिमझिम-रिमझिम-रिमझिम पानी


तरिया-नदिया मन भर जाथें, भुइयाँ हा हरियाथे जी ।

रिमझिम-रिमझिम-रिमझिम पानी, सबके मन ला भाथे जी ॥


बिजली चमकय बादर गरजय, इंदर दागय गोली ला ।

बड़ उपकारी हावय देवा, भर देवय नित झोली ला ॥


नइ राहय आगी कस गरमी, बरसा देख जुड़ाथे जी ।

रिमझिम-रिमझिम-रिमझिम पानी, सबके मन ला भाथे जी ॥


नाँगर-बइला धरे किसनहा, जावय बहरा डोली मा ।

मोर-पपीहा झूमँय-नाचँय, मया भरँय हमजोली मा ॥


ये पानी ले सुग्घर जिनगी, सुख-सुविधा घर आथे जी ।

रिमझिम-रिमझिम-रिमझिम पानी, सबके मन ला भाथे जी ॥


सुवा-ददरिया-करमा गावँय, नर-नारी के टोली हा ।

अन्तस के पीरा हर लेवँय, हँसी-ठिठोली बोली हा ॥


सावन-भादो-क्वाँर महीना, चउमासा कहलाथे जी ।

रिमझिम-रिमझिम-रिमझिम पानी, सबके मन ला भाथे जी ॥


ओम प्रकाश पात्रे 'ओम'