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Tuesday, September 8, 2026

सार छन्द गीत

 विश्व आदिवासी दिवस के गाड़ा-गाड़ा बधाई जय सेवा🌹🙏🏻


सार छन्द गीत


मूल निवासी हम भारत के, जंगल के रखवाला।

लोग आदिवासी कहिथें जी, कहिथें भोला-भाला।


इष्ट देवता हमर प्रकृति हे, करथन एखर पूजा।

बुढ़ा देव ले बड़का देवा,नइ हे कोनों दूजा।

जय सेवा जय सेवा संगी, मिलके जपथन माला।

मूल निवासी हम भारत के, जंगल के रखवाला।।


रेला-पाटा करमा सरहुल, सुघ्घर नाचा-गाना।

गौर-माड़िया सैला गेंड़ी, सुख के हमर खजाना।।

बिरसा मुंडा के हम वंशज, झन परहू रे पाला।

मूल निवासी हम भारत के, जंगल के रखवाला।।


डी.पी.लहरे'मौज'

कवर्धा छत्तीसगढ़

सार छन्द गीत (हरेली)

 सार छन्द गीत (हरेली)


नागर बख्खर कुदरी राँपा, घर-घर मा धोवाही।

बड़े बिहनिया पूजा होही, सबके मन मुस्काही।।


भोग लगाये खातिर संगी, चुरही गुर के चीला।

बहुते बँटही आज प्रसादी, खाहीं माई-पीला।।

कमियाँ मन घर छत्तीसगढ़ के, सुख के बादर छाही।

नागर बख्खर कुदरी राँपा, घर-घर मा धोवाही।।


बइला-भैंसा सबो मवेशी, के होही जी सेवा।

आज जड़ी बूटी के संगे, खाहीं रोट कलेवा।।

लीम-डार ला राउत सबके, घर मा खोंचे जाही।

नागर बख्खर कुदरी राँपा, घर-घर मा धोवाही।।


लइका मन के गेंड़ी बनही,रचरच रचरच बजही।

परब हरेली आये हावय, घर-अँगना हा सजही।।

गली-गली मा लग्गा लगही, नरियर हा फेंकाही

नागर बख्खर कुदरी राँपा, घर-घर मा धोवाही।।


परब हरेली धरके लाये, जन-जन मा खुशहाली।

चारो कोती छाये संगी, हरियाली-हरियाली।।

छत्तीसगढ़ के संस्कृति हा,दुनिया मा ममहाही।

नागर बख्खर कुदरी राँपा, घर-घर मा धोवाही।।


डी.पी.लहरे'मौज'

कवर्धा छत्तीसगढ़

हरेली तिहार

 आप सब झन ला हरेली तिहार के गाड़ा गाड़ा बधाई। जै जोहार।

🌹🌹🌹🌹🌹


हरेली तिहार

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छन्न पकैया छन्न पकैया, सावन हे मनभावन ।

भोले बाबा के पूजा सँग ,मनै हरेली पावन।।


 छन्न पकैया छन्न पकैया, गरवा लोंदी खाथे।

 अंडी पाना नून बँधाये, राउत बने खवाथे।।


 छन्न पकैया छन्न पकैया ,नइ तो धरय बिमारी ।

हे दशमूल दवाई बढ़िया ,खावव सब सँगवारी।।


  छन्न पकैया छन्न पकैया , चाउँर देवय मइया।

  सिंग दुवारी लीम डार ला,  खोंचय राउत भइया।।


 छन्न पकैया छन्न पकैया , कारीगर हा आथे।

 खीला ठोंक बाँध के घर ला, मान गउन ला पाथे।।


  छन्न पकैया छन्न पकैया, घर घर पूजा होथे।

  नागर जूड़ा वाहन बक्खर, ला किसान हा धोथे।।


 छन्न पकैया छन्न पकैया , मनय तिहार हरेली।

  भाँठा मा जब खो खो मातय,खेलयँ सबो सहेली।।


  छन्न पकैया छन्न पकैया, खुड़वा हा मन भाथे।

   फेंकत नरियर बेला भरके, कोनो दाँव लगाथे।।


  छन्न पकैया छन्न पकैया, बोरा दउँड़ त्रिटंगी।

 नौजवान मन डोर इचौला ,खेलयँ जमके संगी।।


  छन्न पकैया छन्न पकैया , खेल जमाये पासा।

  सकलायें सब गुड़ी सियनहाँ, नइये कहूँ हतासा।।


 छन्न पकैया छन्न पकैया, रच रच बाजै गेंड़ी।

नँगत मचयँ जब लइका मन जी,उठा उठा के ऍड़ी।।


  छन्न पकैया छन्न पकैया , गेंड़ी महिमा भारी।

 द्वापर युग मा पांडव मन हा, चढ़े रहिंन सँगवारी।।


  छन्न पकैया छन्न पकैया, हे रिवाज जी सुग्घर।

 हँसी-खुशी सब मना हरेली, चीला खाबो मनभर।।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

हथबंद, छत्तीसगढ़

चौपई छंद- हरियर हरेली

 चौपई छंद- हरियर हरेली


आय हरेली हमर तिहार।

सावन महिना बहे बयार।।

होय खुशी के बड़ बरसात।

झूमय डारा झूमय पात।।


हरियर-हरियर खेती खार।

हरियाली मन मोहय यार।।

धरती करे हवय सिंगार।

दुल्हन जइसे पाटी पार।।


नाँगर बक्खर अउ औजार।

सजे धजे हे अँगना द्वार।।

नरियर गुड़ के भोग लगाँय।

चीला सोंहारी घलो बनाँय।।


पान अरंडी नून पिसान।

धरे किसान चले दइहान।।

गरुवा मन ला भोग लगाँय।

बइगा गुनिया गाँव बनाँय।।


घर-घर आवय जी लोहार।

खीला ठोकय घर के द्वार।।

राउत खोंचय डारा नीम।

इही परब के नेक उदीम।।


रचरच गेड़ी बाजय खोर।

चढ़े मचावँय लइका शोर।।

छत्तीसगढ़ के परब महान।

गजानंद जी करे बखान।।


✍️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)12/08/2026

हरेली के गेड़ी

 🙏🙏 आभार सवैया 🙏🙏

हरेली के गेड़ी 

आये हरेली खपाये ग गेड़ी धरे बाँस बाबू बनाये हवै मोर।

भाई चढ़े खूब नाचै-कुदै जी चुहे आज पानी घटा हे बड़ा जोर।

देखौ मचे खूब गेड़ी चढ़े वो मजा पाय भारी हँसै जी करै शोर।

जेती ग देखौ दिखे आज गेड़ी बजै रूचरूची इहाँ जी सबे ओर।।


कमलेश प्रसाद शर्माबाबू कटंगी-गंडई जिला केसीजी छत्तीसगढ़

शंकर छंद- *भारत माँ के वीर लाड़ला*

 शंकर छंद- *भारत माँ के वीर लाड़ला*


दिये हवँय जी वीर सिपाही, देश खातिर जान।

नाम अमर दुनिया मा होगे, मिलत हे सम्मान।।

बहा लहू के कतरा-कतरा, भरिन हें हुंकार।

उँखरे खातिर आजादी के, मिले हे अधिकार।।


भारत माँ के वीर लाड़ला, नमन हे सौ बार।

कइसे चुका भला हम पाबो, तुँहर जी उपकार।।

लौट दुबारा फिर आ जावव, मचे हाहाकार।

छुपे हवँय बहरुपिया बनके, देश मा गद्दार।।


संविधान मा वार करत हें, रखे कुंठित सोच।

सजे सिंहासन स्वारथ के हे, देश खाहीं नोच।।

मँडरावत हे खतरा फिर से, हमर भारत देश।

हलाकान हें आम लोग सब, दुभर हे परिवेश।।


✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)14/08/2026

स्वतंत्रता दिवस के जोत्था जोत्था बधाई

 स्वतंत्रता दिवस के जोत्था जोत्था बधाई


जब जब आय परब आजादी, सुरता आथे बलिदानी।

येला पाये खातिर संगी, होंगे कतको कुर्बानी।।


हमर देश के  शान तिरंगा, लहर लहर ये लहराये।

भेदभाव ला छोड़ छाड़ के, हँसी खुसी सब फहराये।।


केसरिया सादा अउ हरियर, तीन रंग झंडा प्यारा।

सदा उड़य नित ये अगास मा, दुनियाँ ले सुग्घर न्यारा।।


ऊँच नीच अउ जाँत पाँत के, पाँटन हम सब मिल खाई।

एक संग सब मिलजुल रहिबो, छोड़न हम अपन ढिठाई।।


छोड़ लोभ लालच स्वारथ ला, सुग्घर अब रोज कमाबो।

प्रान देश हित बर अरपन कर, भुइयाँ के लाज बचाबो।।


 ज्ञानु

सरसी छंद गीत- धजा तिरंगा लिपटे आये

 सरसी छंद गीत- धजा तिरंगा लिपटे आये


धजा तिरंगा लिपटे आये, जब -जब वीर जवान।

झर-झर नीर बहावय नैना, दिये करेजा चान।।


माता के तब ममता सुसकय, पिता नसीब ठठाय।

घर के नारी कलपत रोवय, सुख सिंदूर मिटाय।।

भाई के हिरदे मा चलगे, बिधुना के तो बान।

धजा तिरंगा लिपटे आये, जब -जब वीर जवान।।


बेटा बेटी रोवत बोलय, जाग न पापा आज।

बहिनी बोलय कोंन निभाही, राखी के तो लाज।।

सँग साथी पारा मोहल्ला, होगे आज बिरान।

धजा तिरंगा लिपटे आये, जब -जब वीर जवान।।


गये रहे सीमा मा तँय तो, लड़हूँ कहिके जंग।

तोर बिना होली दीवाली, लागत हे बेरंग।।

देश सुरक्षा खातिर ललना, होगे तँय कुर्बान।

धजा तिरंगा लिपटे आये, तँय तो वीर जवान।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/08/2023

सरसी छंद गीत- *शान बढ़य भारत भुइँया के*

 सरसी छंद गीत- *शान बढ़य भारत भुइँया के*


तीन रंग मा सजे तिरंगा, देवत हे संदेश।

शान बढ़य भारत भुइँया के, सुग्घर हो परिवेश।।


तान खड़े हें सीना सेना, सरहद मा दिन रात।

सरदी गरमी धूप ठंड हो, या चाहे बरसात।।

देश सुरक्षा खातिर सहिथें, वीर सिपाही क्लेश।

शान बढ़य भारत भुइँया के, सुग्घर हो परिवेश।।1


रीति नीति संस्कार सिखावय, गीता ग्रन्थ कुरान।

अनेकता मा बसे एकता, भारत के पहिचान।।

हिन्दू मुस्लिम सिक्ख इसाई, रखँय नहीं मन द्वेष।

शान बढ़य भारत भुइँया के, सुग्घर हो परिवेश।।2


ये भुइँया के भाग जगावय, माटी पूत किसान।

गार पसीना अन्न उगावय, करथे कर्म महान।।

जग के पालनहार ल देवव, आशीर्वाद अशेष।

शान बढ़य भारत भुइँया के, सुग्घर हो परिवेश।।3


इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/08/2023

सरसी छंद- *नमन- नमन सौ बार*

 

सरसी छंद- *नमन- नमन सौ बार*


हे! महेंद्र देवांगन 'माटी', नमन -नमन सौ बार।

कलम सिपाही सुरता तोरे, करय छंद परिवार।।


छंदकार कवि लेखक उम्दा, साहित के मर्मज्ञ।

लिखे कहानी गोठ सियानी, करे कर्म के यज्ञ।।

बोली राहय मृदुभाषी अउ, सरल सहज व्यवहार।

हे! महेंद्र देवांगन 'माटी', नमन -नमन सौ बार।।


सब बर दया मया हिरदे मा, मुख मा नित मुस्कान।

शिक्षा के तँय जोत जलाये, गुरु बन बाँटे ज्ञान।

'पुरखा के इज्जत' बर देये, गहना 'तीज तिहार'।

हे! महेंद्र देवांगन 'माटी', नमन -नमन सौ बार।।


'माटी के काया' माटी मा, मिलगे संगी तोर।

बोल बिधाता काबर हम ला, दुख मा दिये चिभोर।।

सुन्ना हे साहित के अँगना, सुन्ना हे घर द्वार।

कलम सिपाही सुरता तोरे, करय छंद परिवार।।


इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 16/08/2026

शंकर छंद- संत गुरु घासीदास

 शंकर छंद- संत गुरु घासीदास 


जग मा सत के अलख जगाये, संत घासीदास।

ढोंग रूढ़ि पाखंड मिटाये, अउ मिटाये त्रास।।

बँटे रहिस जब जाति-पाति अउ, धरम मा इंसान।

मनखे ला मनखे के असली, दिये तब पहिचान।।


करे एकजुट गुरु आंदोलन, चला के सतनाम।

सत्य प्रतीक गड़ाये बाबा, सेत जोड़ा खाम।।

फहर-फहर सादा के झंडा, सुमत के फहराय।

छत्तीसगढ़ पावन माटी मा, जनम धर गुरु आय।।


दीन-हीन के बने मसीहा, करे दुख ला दूर।

करत रहिन जब सामंती मन, जिये बर मजबूर।।

नारी के उत्थान करे अउ, दिलाये अधिकार।

गजानंद कर जोर करत हे, तोर जय जयकार।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)20/08/2026

मनहरण घनाक्षरी*

 *मनहरण घनाक्षरी*


*राखी के तिहार आगे,*

          *हिरदे उमंग छागे*

              *मेंहदी लगाहूँ  बने*

                   *बाली झूले कान के*


*मया डोर बाँध लेहूँ*

     *रोटी पीठा राँध लेहूँ*

           *मइके के डेहरी मा*

                 *कोठी हवै मान के*


*हँसी खुशी मन भरे*

      *गठरी मया के धरे*

           *भैया घर जाहूँ मैं तो*

                 *मान पाहूँ जान के*

 

*भेंट होही भाई संग*

      *गोठ बात रंग रंग*

           *बीते दिन सुरता ला*

                 *हाँस लेबो  लान के*


*सुमित्रा शिशिर*

कुण्डलिया-रक्षाबंधन

 कुण्डलिया-रक्षाबंधन


बंधन बाँधय हाँस के, बहन निभावय रीत।

हिरदे मा भर प्रीत ला, मन भाई के जीत।

मन भाई के जीत,  प्रीत के बाँधय धागा।

कुमकुम तिलक लगाय, सुघर पहिराये पागा।

भाई हे अनमोल, करे बहिनी आराधन।

हाँसत अउ हँसवात, प्रीत के बाँधत बंधन।।


रक्षाबंधन प्रीत के, सुग्घर आय तिहार।

डोरी रेशम के बने, राखी के ये तार।

राखी के ये तार, मया के भाव जगाथे।

हिय मा उठे उमंग, सदा खुशियाँ बरसाथे।

बहिनी मन के संग, मगन हे भाई के मन।

झूमय घर-परिवार, मना के रक्षाबंधन।।


विजेन्द्र कुमार वर्मा 

नगरगाँव (धरसीवां)

कमरछट-कुण्डलिया

 कमरछट-कुण्डलिया 


महतारी मन आज तो, रहिथें सुघर उपास।

बेटा-बेटी खुश रहय, माँगँय वर जी खास।

माँगँय वर जी खास, उमर लइकन के बाढ़य।

पोती मारय मूड़, कहूँ विपदा झन माढ़य।

एक ठउर सकलाय, हाथ मा लेके थारी।

महादेव ला पूज, फूल चढ़ाँय महतारी।।


विजेन्द्र कुमार वर्मा 

नगरगाँव (धरसीवांँ)

कमरछठ (बरवै छंद)

 कमरछठ तिहार के हार्दिक बधाई 

🌹🌹🌹🙏


कमरछठ 

(बरवै छंद)


हवै कमरछठ पावन,परब हमार।

नारी पूजा करथें, बिधि अनुसार।।


कृष्ण पक्ष भादो के ,छट तिथि खास।

छै ठन कथा-कहानी,भरे हुलास।।


छै विकार दुरिहाथे, रहे उपास।

गौरी के किरपा ले, हे बिंसवास।।


मउहा काड़ी दतवन,कर असनान।

बलदाऊ भगवन के,धरे धियान।।


छोटे -छोटे सगरी,दू ठन कोड़।

छै लोटा जल अरपन, हाथ ल जोड़।।


फूल -पान अउ लाई , भेंट चढ़ाय।

काँसी के मड़वा ला, सुंदर छाय।।


छै ठन भाजी पसहर, चाँउर भोग।

हूम-धुँआ ले जेकर, भागय रोग।।


मउहा पाना पतरी, मा फरहार।

दूध-दही भँइसी के, सान मिंझार।।


हवै उपसहिन मन के,रीत रिवाज।

पावन ये तिहार के, हावय नाज।।


शक्ति स्वरूपा नारी, हवयँ महान।

श्राप ताप सब हरथें, दे वरदान।।


घर परिवार सुखी अउ, हो खुशहाल।

चिरंजीव हो सब के, सुग्घर लाल।।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

कमरछठ

 कमरछठ


माता गौरी कर कृपा, सबो रहँय खुशहाल।

सबके अमर सुहाग हो,  जुग-जुग जीयय लाल।।

जुग-जुग जीयय लाल, मया के   रुखवा बाढ़य।

छलकै कोठी धान, घरो घर सुनता माढ़य।।

सबो बिपत ला टार, सुखी जग रखबे दाता।

करथें भक्त पुकार, कृपा तैं करबे माता ।।


डॉ. दीक्षा चौबे

कज्जल छंद- परब कमरछठ

 कज्जल छंद- परब कमरछठ


परब कमरछठ हवय खास।

महतारी रहिथें उपास।

कोरा सुख के रखे आस।

सब संकट के हो विनाश।।


भादो के छठ हरय माह।

सुख सम्मत के हवय चाह।

रखव बनाये प्रभु निगाह।

रहय बिराजे घर उछाह।।


अँगना मा सगरी खुदाय।

कथा पुजारी हा सुनाय।

पान प्रसाद तहाँ बटाय।

ये प्रकार ले व्रत मनाय।।


बिन नाँगर के अन्न भोज।

पसहर चाउँर लाँय खोज।

भैंस दूध घी एक रोज।

खाथें भाजी बोज-बोज।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/09/2026

सुमुखी सवैया

कामड़िया 15: सुमुखी सवैया 

121,,121,,121,,121,,121,,121,,121,,12


दही लपटे मुख कोर फभै मनमोहन तो चटखोर हवै। 

भरे गगरी जब फोर डरै मुरली धर तो बरजोर हवै।। 

खड़े जमुना पग तीर रहै मधु सूदन हा चित चोर हवै। 

बजै बसरी जब भोर सखी हिरदे बँधना मन डोर हवै।। 


सुमित्रा शिशिर

[9/4, 7:41 AM] Sumitra कामड़िया 15: मदिरा सवैया 

211,211,211,211,211,211,211,,,2


हे मुरली धर हे करुणाकर, 

टार सबो दुख बादर के। 

हे मनमोहन नंद लला सुन, 

भाव मिटै सुख सागर के।। 

कोन कहै कतको लबरा मन, 

नाम मिटा दिन सादर के। 

हे जग नायक हे सुख दायक, 

लाज बचा घर गागर के।। 


सुमित्रा शिशिर

[9/4, 7:41 AM] Sumitra कामड़िया 15: मत्तगयंद सवैया 

7 बार भगण+ दो गुरु 


श्यामल रूप धरे मनमोहन, 

हे जग मोहत कृष्ण मुरारी। 

सोहत पांख मजूरन के प्रिय, 

रास रचावत रास बिहारी।। 

माखन खावत संग सखा धर, 

देख लुभावत हे मन हारी। 

व्याकुल आकुल हे अँखियाँ मन, 

आन मिलौ अब हे गिरधारी।। 


सुमित्रा शिशिर

[9/4, 7:41 AM] Sumitra कामड़िया 15: मत्तगयंद सवैया 

211,,211,,211,,211,,211,,211,,211,,22


शोर करै अउ माखन खावय, 

संग सखा धर गाय चरावै। 

ग्वाल कहै बसरी मन मोहन, 

जागत सोवत रोज बजावै।। 

मोह डरे मनखे मन ला अउ, 

सुग्घर मोहक तान सुनावै। 

चीर हरे छुप गोपिन के जब, 

मानस मंथन भाव जगावै।। 


सुमित्रा शिशिर

कुकुभ छंद-माटी मोर महतारी*

 *कुकुभ छंद-माटी मोर महतारी*


माटी ला झन खाबे कान्हा, दाँत तोर सर जाही गा।

ग्वाल बाल गोकुल के तोला, सरहा कहि कुड़काही गा।।

देह करे बीमार बिहारी, अड़बड़ पेट पिराही गा।

नइ देवय का खाय पिये बर,अपजस लोग लगाही गा।।

माटी ला झन खाबे कान्हा.............



कहे यशोदा सुन तो लाला, श्रीखंड देत हँव आजा,

खीर पुड़ी अउ माखन मिश्री, खा पेट भरत ले राजा,

अरन-पपइ अंगूर बिही हे, अनानास आमा ताजा,

मोहनभोग जलेबी पेड़ा, मनभर तैं खाले खाजा,

नंदबबा के नव लख गइँया, काम कोन दिन आही गा।

माटी ला झन खाबे कान्हा......


दूध दही माढ़े सींका मा, छाँछ भरे हे गगरी मा,

काबर तैं छुछवाथस बेटा,पर के रोज डेहरी मा,

मटका टोर-फोर ले होवत, बदनामी बड़ नगरी मा,

लिगरी करथे ग्वालिन मिलके, बिहना साँझ दुपहरी मा,

लाज बहुत के आथे ललना, मिलय नही अउ काँही गा।

माटी ला झन खाबे कान्हा...........


कहे कन्हैया सुनले मइँया, माटी काबर खाथँव ओ,

खेलत हाबँव जे भुइँया मा, ओला माथ नवाँथँव ओ,

छप्पन भोग मिठावत नइहे, खाथँव कहाँ अघाथँव ओ,

माटी माखन मा महतारी, तोर मया ला पाथँव ओ,

चंदन जननी जनमभूमि हर, भव ले पार लगाही गा।

माटी ला झन खाबे कान्हा..........



🙏🙏🙏🙏

नारायण प्रसाद वर्मा *चंदन*

ढाबा-भिंभौरी, बेमेतरा छग

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गंगोदक सवैया राम ही कृष्ण हे

  कमलेश प्रसाद 20 शरमाबाबू: गंगोदक सवैया 

राम ही कृष्ण हे  

राम ही कृष्ण हे कृष्ण ही राम हे, तैं इहाँ देख ले जी सबो रूप मा। 

हे विधाता उही प्रान दाता उही, वो बसे देख छाया घलो धूप मा । 

वो भिखारी अनाड़ी सबो के पिया, रौशनी डार देथे घलो कूप मा । 

हे बड़े कोन छोटे ल देखै नही, भक्त "बाबू" बना देथे वो भूप ला ।

कमलेश प्रसाद शर्माबाबू

[9/4, 2:10 PM] कमलेश प्रसाद 20 शरमाबाबू: मंदार माला सवैया 

कान्हा 

कान्हा बजावै चढ़े पेड़ बंशी रिझावै सबो गोप ग्वाला उहाँ ।

भागै सबो काम कौड़ी उहाँ छोड़ बैठे हवै जी कन्हैया जहाँ | 

गैया भुलावै चरे घास नाही लुकागे हवै मोर कान्हा कहाँ । 

"बाबू" बिराजे मुड़ी मोरपंखा खड़े साँवरा गोप नाचै तहाँ ।

कमलेश प्रसाद शर्माबाबू कटंगी-गंडई

[9/4, 2:10 PM] कमलेश प्रसाद 20 शरमाबाबू: मदिरा सवैया

मोहन के मुरली

मोहन के मुरली यमुना तट बाजय ग्वालिन दौड़ पड़े।

गोकुल के गलियाँ मनभावन देखत लोगन रोज खड़े।

माणिक काँचन हीर जवाहर नंद बबा घर खंब जड़े । 

नाचत कूदत हें ‘शरमा’ सब बाल सखा मन रोज अड़े ॥

कमलेश प्रसाद शर्माबाबू

मत्तगयंद सवैया""

 ""  मत्तगयंद सवैया""


दूध दही सब खाॅंवत जावय गोप गुवालिन देख लजावै ।

देखय मोहन नाचय गावय छेड़य तान ल गीत सुनावै ।।

सूरत हा सब ला अति भावय फेर बड़ा बन नाच नचावै ।

भोग लगे मिसरी सॅंग माखन बैठ सखा सॅंग भोग लगावै।।


गोकुल गाॅंव गुवालिन रोवय रोवत हे जग मोहन आना ।

गाय गरू सब रोवत हावय आ के बने मुरली ल बजाना ।।

आज इहाॅं बनगे सब दानव हे कमला पति लाज बचाना।

लालच में मनखे मरगे नइहे कखरो जिनगी म ठिकाना ।।


गो रस में बस पानी मिले पहिली कस गो रस तैं हर लाबे ।

होय मिलावट के दुनिया अब लोगन ला अतके समझाबे ।।

स्वारथ में मनखे सब डूबय आज बने गिनहा ल बताबे।

हे मुरलीधर हे घट नागर आज बने मुरली ल बजाबे।।


   संजय देवांगन सिमगा✍🏻

मनहरण घनाक्षरी*

 *मनहरण घनाक्षरी* 


ज्ञान  दीया रोज बरै, शिक्षक अज्ञान हरै,

शिक्षा के सम्मान सबो,

नोनी बाबू हा करौ।


ज्ञान  जोत परंपरा, हिरदे ला करे हरा,

शिक्षा पाय खातिर मा,

गुरु नाम ला धरौ।।


ज्ञान  हवै वरदान, शिक्षा देथे  पहिचान,

शिक्षा ले मनखे जागे,

अँधियारी ला हरौ।


ज्ञान  हे प्रकाशवान, शिशिर बने महान ,

शिक्षा महतारी बर,

अंतस अमृत भरौ।।


सुमित्रा शिशिर

विष्णुपद छंद

 


विष्णुपद छंद


बिन स्वारथ के ज्ञान जगत मा, वो बगरावत हे।

रोज छात्र मन ला शिक्षक हा, खूब पढ़ावत हे।।


पढ़ा रोज लइका ला शिक्षक, देवय ज्ञान इहाँ।

परमारथ बर जिनगी अर्पित, काम महान इहाँ।।


जइसे बरसा ये भुइँया के, प्यास बुझावत हे।

जइसे रद्दा मनखे मन ला, घर पहुँचावत हे।।


नदी कुआँ अउ रुखराई, पर सेवा करथे।

जंगल पर्वत खेतीबारी, सबके दुख हरथे।।


माटी के लोंदा ला सुग्घर, दे आकार इहाँ।

आनी बानी जिनिस बनाथे, रोज कुम्हार इहाँ।।


शिक्षक हा शिक्षक के शिक्षक, लइका  मास्टर हे।

नेता अधिकारी वकील अउ, कोनो डॉक्टर हे।।


ज्ञानुदास मानिकपुरी

चंदेनी- कवर्धा

कज्जल छंद- गुरु हे सूरज के समान

 कज्जल छंद- गुरु हे सूरज के समान


पाँच सितंबर दिन महान।

रहिथे शिक्षक दिवस जान।

पाथें गुरु सम्मान-मान

होथे गुरुवर ज्ञान खान।।


गुरु गीता अउ गुरु कुरान।

वेद बाइबिल ग्रँथ पुरान।

गुरु हे सूरज के समान।

कहिथें सुन लौ सब सुजान।।


होथे गुरु के कई रूप।

जेकर महिमा हे अनूप।

कभू ददा-दाई स्वरूप।

ले हरथे तकलीफ धूप।।


करय नहीं गुरु भेद-भाव।

एक समान रखे लगाव।

होथे गुरु मझधार-नाव।

जग के हित बर दै सुझाव।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)05/09/2026

शिक्षा-जयकारी छंद

 शिक्षा-जयकारी छंद 


आखर-आखर के धर ज्ञान I 

पढ़बे लिखबे मिलही मान II

शिक्षा जिनगी के आधार I

अनपढ़ के जीवन बेकार II


रंग रूप के का हे काम I 

ग्यानी धानी के हे नाम II

विनय बुद्धि हे जेकर पास I 

छूथे भइया उही अगास II


शिक्षा बनथे जी हथियार I 

कुरुति मा तो करे प्रहार II

नव चेतन मन मा भर जाय I 

सही गलत के राह दिखाय II


ऊँच-नीच मा फरक मिटाय I

मानवता के राह दिखाय II

शिक्षा के जब जले मशाल I 

जीवन सबके बड़ खुशहाल II


भटके मन ला राह दिखाय I

अन्धकार ला दूर भगाय II 

ज्ञान-जोत के शिक्षा पाय I

तभ्भे जिनगी बड़ ममहाय II


विजेन्द्र कुमार वर्मा 

नगरगाँव धरसीवांँ

शिक्षक दिवस

 शिक्षक दिवस


आज हवय पावन दिवस , गुरु पूजा त्योहार ।

वंदत हँव गुरु के चरण , शीश नवाँ सौ बार ।।


राधा कृष्णन ला नमन,  जन्म दिवस हे आज ।

शिक्षक जन जेकर उपर , करथें अबड़े नाज ।।


जेन रहिंन चिंतक बड़े , राजनीति के संत ।

बनिन राष्ट्रपति दूसरा , भारत के श्रीमंत ।।


शिक्षा सँग संस्कार के , जेहा अलख जगाय ।

सुग्घर जी सद ज्ञान दय ,वो हर शिक्षक आय ।।


करिया पट्टी  शिष्य के , आखर भरय अँजोर ।

 रटवा दै जी  पाहड़ा  , भाषा भाव चिभोर ।।


ब्रह्मा विष्णु महेश कस ,गुरुजी तभे कहाय ।

मातु पिता कस मानके , सब झन शीश नँवाय।।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

हथबंद, छत्तीसगढ़

कज्जल छंद- *कहाँ गवाँगे मोर गाँव*

 कज्जल छंद- *कहाँ गवाँगे मोर गाँव*


कहाँ गवाँगे मोर गाँव।

अमरइया बर नीम छाँव।

माते हावय काँव-काँव।

खोर-गली अउ ठाँव-ठाँव।।


भाई-भाई लड़त आज।

भूल गये हें सुमत काज।

आवत हे जी देख लाज।

दुख के रोजे गिरत गाज।।


बाँट डरिन घर खेत-खार।

संग ददा-दाई दुलार।

कोला-बारी के उजार।

होगे जम्मो तार-तार।।


सुन्ना हे चौपाल देख।

फुटहा होगे करम लेख।

गोठ मोर संगी सरेख।

होगे सब मीटियामेख।।


नशा करे लइका सियान।

रथें पड़े उन तो उतान।

आज मरे होगे बिहान।

देबो संगी चलौ ध्यान।।


पाँव गड़य झन कभू शूल।

चलौ खिलाबो सुमत फूल।

बैर भाव सब द्वेष भूल।

लेबो सुख झूलना झूल।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)06/09/2026