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Saturday, June 16, 2018

जल हरण घनाक्षरी - श्री चोवाराम "बादल"

      1  ममहाबे
ममहाबे चारों खूँट , होही भाई तोरो पूछ ,
जिनगी  सवँर जाही, उदबत्ती कस खप ।
पक्का बन जबान के, संग धर ईमान के,
 काबर कच्चा कान के, छोंड़ देना लपझप ।
मिहनत कर संगी, नइ राहै कभू तंगी,
उदाबादी झन कर ,  इही आय बड़े तप ।
भुईंया ल सिंगार के, पसीना ल ओगार के,
भाईचारा बाँट लेना , प्रेम मन्त्र माला जप ।।

      2  हवै पहात उमर
नेत नेत नेत बने, चेत चेत चेत बने,
देख देख देख बने, हवै पहात उमर ।
तन ला दिंयाँर कस, चिंता चरत हावय,
धक धक करे जीव, बाढ़े  बीपी ग सुगर ।
एको ठन दाँत नहीं, चना चाब खाहूँ कहे ,
लालच म डूब मरे , पचै नहीं खा
 कुचर ।
हरे राम हरे कृष्ण , गोविंद गोपाल भज,
चौथा पन आगे हवै, सोंच थोरको सुधर ।।

    3 लइका बिगड़ जाथे

उपराहा पैसा पाके, होटल सिनेमा जाके,
गलत संगति धर, जाथे लइका बिगड़ ।
मौका म दुलार बने, मया परवान चढ़े,
डाँट फटकार घलो, कहूँ करै गड़बड़ ।
जादा मीठ कीरा परे, रोबे तहाँ मूँड़ धरे,
बेरा म ईलाज कर, लगा दवई झाफड़ ।
सिक्छा अउ संस्कार दे, पाही रोटी रोजगार ,
बचपन सँवार दे, गुन गाही अड़बड़ ।।

रचनाकार - श्री चोवा राम " बादल"
( छन्द के छ परिवार साधक)
     हथबन्द, छत्तीसगढ़
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