सरसी - छंद
विधान – 16 - 11
डाड़ – 2 / चरण चार
कसके बने दमोर
सब ला तोरे हवय सहारा, धुर्रा उड़गे खोर ।
तरिया नदिया घलो सुखागे, सुक्खा परगे बोर ।।
लगगे अब चौमासा भगवन, अब तो पानी झोर ।
नाँगर बइला घलो निकलही, कसके बने दमोर ॥
गरमी ले अब प्रान छुट्त हे, लाइन होथे गोल ।
आँधी अंधड़ चलथे भारी, टूटत हावय पोल ॥
गिर जा पानी झन तरसा तैं, जादा नइ तो थोर ।
नाँगर बइला घलो निकलही, कसके बने दमोर ।।
तीपत लकलक चारों कोती, देखव आके हाल ।
सब के मालिक एक तहीं हस, भर दे नदिया ताल।।
तरतर-तरतर चुहत पसीना, चट चट जरथे खोर ।
नाँगर बइला घलो निकलही, कसके बने दमोर ।।
कमलेश प्रसाद शर्माबाबू
कटंगी-गंडई जिला केसीजी छत्तीसगढ़
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