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Thursday, July 9, 2026

चौपई छन्द- *बरसात*

 चौपई छन्द- *बरसात*


तक-तक अम्बर नैना हार। कर दौ बादर अब उपकार।।

सुखगे धरती मरत पियास। बइठे हवॅंय किसान उदास।।


अँगरा कस बरसत हे घाम। रुकगे हे सब खेती काम।।

फटगे भुइॅंया छागे त्रास। टूटत हावय मन के आस।।


भूख पियासे लइका आज। बढ़गे करजा बढ़गे ब्याज।।

सुक्खा अँगना दिखे बिरान। कब आही सुख धरे बिहान।।


जइसे चातक रोवय रात। कब होही कहिके बरसात।।

तइसे तरसत हवॅंय किसान। बोयें बर धनहा मा धान।।


घूमड़-घूमड़ बस करथस शोर। फेर न होवय दर्शन तोर।

करिया बादर अब तो आव। ये जियरा ला मोर जुड़ाव।।


बरसव झमझम धरके धार। मिट जावय दुख हाहाकार।।

अमरित बरसा कर दौ दान। तभे बाॅंचही सबके प्रान।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)20/06/2026

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