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Tuesday, December 31, 2024

गीत-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 गीत-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

नवा बछर मा नवा आस धर,नवा करे बर पड़ही।
द्वेष दरद दुख पीरा हरही,देश राज तब बड़ही।

साधे खातिर अटके बूता,डॅटके महिनत चाही।
भूलचूक ला ध्यान देय मा,डहर सुगम हो जाही।
चलना पड़ही नवा पाथ मा,सबके अँगरी धरके।
उजियारा फैलाना पड़ही, अँधियारी मा बरके।
गाँजेल पड़ही सबला मिलके,दया मया के खरही।
द्वेष दरद दुख पीरा हरही,देश राज तब बड़ही।

जुन्ना पाना डारा झर्रा, पेड़ नवा हो जाथे।
सुरुज नरायण घलो रोज के,नवा किरण बगराथे।
रतिहा चाँद सितारा मिलजुल,रिगबिग रिगबिग बरथे।
पुरवा पानी अपन काम ला,सुतत उठत नित करथे।
मानुष मन सब अपन मुठा मा,सत सुम्मत ला धरही।
द्वेष दरद दुख पीरा हरही,देश राज तब बड़ही।

गुरतुर बोली जियरा जोड़े,काँटे चाकू छूरी।
घर बन सँग मा देश राज के,संसो हवै जरूरी।
जीव जानवर पेड़ पकृति सँग,बँचही पुरवा पानी।
पर्यावरण ह बढ़िया रइही, तभे रही जिनगानी।
दया मया मा काया रचही,गुण अउ ज्ञान बगरही।
द्वेष दरद दुख पीरा हरही,देश राज तब बड़ही।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा(छग)
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नवा बछर के बहुत बहुत बधाई

घनाक्षरी-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

             1
बिदा कर गाके गीत,बारा मास गये बीत।
का खोयेस का पायेस,तेखर बिचार कर।।
गाँठ बाँध बने बात,गिनहा ला मार लात।
अटके ला चौबीस के,पच्चीस मा पार कर।।
बैरी झन होय कोई,दुख मा न रोय कोई।
तोर मोर छोड़ संगी,सबला जी प्यार कर।।
जग म जी नाम कमा,सबके मुहुँ म समा।
बढ़ा मीत मितानी ग,दू ल अब चार कर।।

              2
गुजर गे बारा मास,बँचे जतके हे आस।
पूरा कर ये बछर,हटा जमे रोक टोंक।।
मुचमुच हाँस रोज,पथ धर चल सोज।
बुता काम बने कर,खुशी खुशी ताल ठोंक।
दिन मजा मा गुजार,बांटत मया दुलार।
खाले तीन परोसा जी,लसून पियाज छोंक।।
नवा नवा आस लेके,दिन तिथि खास लेके।
हबरे बछर नवा,हमरो बधाई झोंक।।

              3
होय झन कभू हानि,चले बने जिनगानी।
बने रहे छत छानी,बने मुड़की मिंयार।।
फूल के बिछौना रहै, महकत दौना रहे।
जीव शिव प्रकृति के,सदा मिले जी पिंयार।।
आदर सम्मान बढ़े,भाग नित खुशी गढ़े।
सपना के नौका चढ़े,होके घूम हुसियार।।
होवै दिन रात बने,मनके के जी बात बने।
नवा साल खास बने,भागे दूर अँधियार।।

               4
सबे चीज के गियान,पा के बनो गा सियान।
गाँव घर देश राज,छाये चारो कोती नाम।।
मीठ करू खारो लेके,सबके जी आरो लेके।
सेवा सतकार करौ,धरम करम थाम।।
खुशी खुशी बेरा कटे,दुख के बादर छँटे।
जिनगानी मा समाये,सुख शांति सुबे शाम।।
हमरो झोंको बधाई,संगी संगवारी भाई।
नवा बछर मा बने,अटके जी बुता काम।।

                5
अँकड़ गुमान फेक,ईमान के आघू टेक।
तोर मोर म जी मन, काबर सनाय हे।।।
दुखिया के दुख हर,अँधियारी म जी बर।
कतको लाँघन परे, कतको अघाय हे।।।
उही घाट उही बाट,उही खाट उही हाट।
उसनेच घर बन,तब नवा काय हे।। ।।।।
नवा नवा आस धर,काम बुता खास कर।
नवा बना तन मन,नवा साल आय हे।।।।

जीतेंद्र वर्मा""खैरझिटिया
बाल्को,कोरबा
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गजल- जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

बिछे जाल देख के मोर उदास हावे मन हा।
बुरा हाल देख के मोर उदास हावे मन हा।।1

बढ़े हे गजब बदी हा, बहे खून के नदी हा।
छिले खाल देख के मोर उदास हावे मन हा।2

अभी आस अउ बचे हे, बुता खास अउ बचे हे।
खड़े काल देख के मोर उदास हावे मन हा।।3

गला आन मन धरत हे, सगा तक दगा करत हे।
चले चाल देख के मोर उदास हावे मन हा।।4

कती खोंधरा बनावँव, कते मेर जी जुड़ावँव।
कटे डाल देख के मोर उदास हावे मन हा।5

धरे हाथ मा जे पइसा, उही लेगे ढील भँइसा।
गले दाल देख के  मोर उदास हावे मन हा।।6

कई खात हे मरत ले, ता कहूँ धरे धरत ले।
उना थाल देख के  मोर उदास हावे मन हा।7

जे कहाय अन्न दाता, सबे मारे वोला चाँटा।
झुके भाल देख के  मोर उदास हावे मन हा।8

नशा मा बुड़े जमाना, करे नाँचना नँचाना।
नवा साल देख के मोर उदास हावे मन हा।9

जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)
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बधाई नवा बछर के(सार छंद)

हवे  बधाई   नवा   बछर   के,गाड़ा  गाड़ा  तोला।
सुख पा राज करे जिनगी भर,गदगद होके चोला।

सबे  खूँट  मा  रहे  अँजोरी,अँधियारी  झन  छाये।
नवा बछर हर अपन संग मा,नवा खुसी धर आये।
बने चीज  नित नयन निहारे,कान सुने सत बानी।
झरे फूल कस हाँसी मुख ले,जुगजुग रहे जवानी।
जल थल का आगास नाप ले,चढ़के उड़न खटोला।
हवे  बधाई  नवा  बछर  के,गाड़ा  गाड़ा  तोला----।

धन बल बाढ़े दिन दिन भारी,घर लागे फुलवारी।
खेत  खार  मा  सोना  उपजे,सेमी  गोभी  बारी।
बढ़े बाँस कस बिता बिता बड़,यश जश मान पुछारी।
का  मनखे  का  जीव जिनावर, पटे  सबो सँग तारी।
राम रमैया कृष्ण कन्हैया,करे कृपा शिव भोला-----।
हवे  बधाई  नवा  बछर के,गाड़ा  गाड़ा  तोला------।

बरे बैर नव जुग मा बम्बर,बाढ़े भाई चारा।
ऊँच नीच के भेद सिराये,खाये झारा झारा।
दया मया के होय बसेरा,बोहय गंगा धारा।
पुरवा गीत सुनावै सबला,नाचे डारा पारा।
भाग बरे पुन्नी कस चंदा,धरे कला गुण सोला।
हवे बधाई नवा बछर के,गाड़ा गाड़ा तोला---।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

नव वर्ष उछाह मंगल धरके आये
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Thursday, December 26, 2024

किसान--- दोहा छंद

 आज किसान दिवस मा जम्मों किसान मन ला अउ पूर्व प्रधानमंत्री आद0 चौधरी चरण सिंह जी ला सुरता करत मोर ये रचना🙏🙏🙏



किसान--- दोहा छंद  



सबके मीत किसान तँय, बोथस गेहूँ धान।

धुर्रा  माटी  तन  लगे,  इही हावय पहिचान।।


लकर- धकर बूता करै,  धूप रहय या छाँव।

महिनत हावय संग मा, कभू थकय ना पाँव।।


पागा कलगी शान हे,  माटी तोर मितान।

नाँगर बइला संग मा, जावय खेत किसान।।


भूख-प्यास तैंहा सहे, अउ सहथस जी घाम।

धनहा- डोली खेत हे,  करथस खेती काम।।


कहिथें तोला सब इहाँ, भुइयाँ के भगवान।

हे किसान मन के सदा, करथे जग गुणगान।।



मुकेश उइके "मयारू"

ग्राम- चेपा, पाली, कोरबा(छ.ग.)

जाड़

 [12/19, 4:23 PM] मुकेश 16: जाड़- जयकारी छंद


गोड़-हाथ अउ काँपय हाड़।

बाढ़े हावय बिक्कट जाड़।। 

एकर बर कुछु करव उपाय।

नइतो अब गा जाड़ सहाय।। 


कुनकुन लागय देखव घाम।

रोज बिहनिया सेंकव चाम।। 

कथरी कमरा बने सुहाय।

आगी अँगरा सब ला भाय।।


लकड़ी छेना लेवव जोर।

झन देखव गा दाँत निपोर।। 

जड़काला बइरी हा आय।

लटपट मा अब रात पहाय।। 


बिगड़े हावय सबके हाल।

जड़काला हा बनगे काल।। 

अलकरहा गा जाड़ भराय।

कोन नहाये खोरे जाय।। 


लइका पिचका संग सियान।

जाड़ करय सब ला हलकान।। 

सुरुर-सुरुर पुरवा हा आय।

नाक घलो अब्बड़ बोहाय।। 


छेरी पथरू पावय जाड़।

उँकरो बर गा करव जुगाड़।। 

गरुवा बइला बड़ नरियाय।

पैरा भूसा नइतो खाय।।



मुकेश उइके "मयारू"

ग्राम- चेपा, पाली, कोरबा(छ.ग.)

[12/19, 5:56 PM] राज निषाद: *विषय - जाड़ दोहा छंद*


जड़काला मा गोरसी, अँगरा आगी ताप।

बइठे-बइठे राम के,  करत रहौ सब जाप।।


बइठे दाई डोकरी, बने रौनिया ताप।

संग म हावय डोकरा, करत राम के जाप।।


जगह-जगह भुर्री बरय, लकड़ी छेना डार।

कुनकुन-कुनकुन ताप ले, अँगरा आगी बार।।


हाथ गोड़ हा काँपगे, सब झन हे थर्राय।

जाड़ सीत ला देख के, बुढ़वा मन डर्राय।


अबड़ करत हे जाड़ जी, कंबल कथरी लान।

सुत जा सुग्घर ओढ़ के, हाथ गोड़ मुँह कान।।


राजकुमार निषाद"राज"

बिरोदा धमधा जिला-दुर्ग

7898837338

[12/19, 6:17 PM] S K Miree: जाड़ *(सरसी छंद)*


देख असो के ठंडा मौसम, लानिस हे बड़ जाड़।

हाथ गोड़ हर सफ्फा ठरगे, ठण्डा भेदिस हाड़।।


स्वेटर पहिरे कथरी ओढ़े, गरमी तभो उछींद।

धरे कँपकपी दाँत बजत हे, आवत नइ हे नींद।।


करा सही पानी हा ठरथे, कइसे हाथ लगाव।

नरी घलो ठंडा पर जाथे, पीयत देख डराँव।।


हिम्मत नइ होवत हे संगी, कइसे रोज नहाँव।

गुनत हवँव अतका ठंडा मा, कइसे बूता जाँव।।


सूरज दादा घलो लुकाये, उग जा कहँव बुलाँव।

भुर्री तापत बइठे मैं हर, दिन ला रोज पहाँव।।


सरसर-सरसर पवन चलत हे, अउ बाढ़त हे जाड़।

कान नाक ला बिन बाँधे तैं, होय सकस नइ ठाड़।।


जाड़ बाढ़ के देख दिनों दिन, जिनगी देत उजाड़।

जीव जंतु अउ सब मनखे के, जीना होगिस काड़।।


लोको पायलट -संतोष मिरी 'हेम'

       कोरबा (छत्तीसगढ़)

************************************

[12/23, 3:01 PM] +91 84358 44508: कुंडलिया छंद


थरथर काँपत जाड़ मा, सोचत हवय किसान। 

मंडी मा अब पहुँच गे, कट्टा - कट्टा धान।।

कट्टा- कट्टा धान, बेच के पइसा पाबो।

गर्मी फसल उधार, पटा के फेर कमाबो।

भगा जाहि  जी जाड़, पसीना गिरही तरतर।

श्रम के गजब प्रभाव, हाड़ नी  काँपे  थरथर।।


अमितारवि दुबे©®

Thursday, December 19, 2024

गुरु घासीदास जयंती विशेषांक*



: दोहा छंद- *सतगुरु घासीदास*


..........................*.........................

पावन धाम गिरौदपुर, माह दिसंबर खास।

सत्य रूप मा अवतरे, सतगुरु घासीदास।।


अमरौतिन के कोख अउ, महँगू दास दुलार।

सत्रह सौ छप्पन रहिस, लेइस गुरु अवतार।।


छागे अँगना मा खुशी, बाजय मंगल गीत।

गुरु दर्शन बर आय सब, सगा सहोदर मीत।।


मांदर झाँझ मृदंग सँग, सजे आरती थाल।

आये जग उद्धार बर, अमरौतिन के लाल।।


देवँय आशीर्वाद ला, नर नारी सब लोग।

सत्यपुरुष अवतार ये, करही सत के जोग।।


मातु पिता गुरु नाम ला, राखिस घासीदास।

बनही संत महान गुरु, हरही जग जन त्रास।।


जतन करे लइका बढ़े, पानी पाये धान।

बाढ़े उही प्रकार ले, गुरु जी धारत ज्ञान।।


नानपना ले ही करिस, गुरु जी सत के काम।

महिमा गजब दिखाय हे, नाम जपत सतनाम।।


सखा बुधारू ला दिये, गुरु जी जीवन दान।

तारिस गौ माता घलो, लगा सत्य के ध्यान।।


बिना अन्न पानी बिना, जेवन दिये बनाय।

बिना सुरूज प्रकाश के, कपड़ा घलो सुखाय।।


भाटा बारी ले बबा, लानिस मिरचा टोर।

जोतिस नाँगर ला अधर, होगे महिमा शोर।।


वैज्ञानिकता तर्क ले, सत के करिस प्रचार।

गुरु के दे सिद्धांत ले, आज चलत संसार।।


शादी घासीदास गुरु, माता सफुरा साथ।

हँसी खुशी जिनगी जिये, थाम हाथ मा हाथ।।


चार पुत्र के संग मा, होइस पुत्री एक।

बेटा सब ज्ञानी गुनी, बेटी सुशील नेक।।


अमरदास बेटा बड़े, मझला बालकदास।

तीसर आगरदास गुरु, अउ अड़गड़िहा खास।।


सहोदरा बेटी सुघर, बहुत चतुर हुशियार।

मातु पिता के लाड़ली, पाये मया दुलार।।


सपना देइस एक दिन, पुरुषपिता सतनाम।

कइसे माया मा गे भुला, घासी तँय सतकाम।।


दुनिया के उद्धार बर, लिये हवस अवतार।

घासी तँय तो हस फँसे, मोह मया परिवार।।


सपना ले झकना उठिस, बाबा घासीदास।

पुरुषपिता गुरु माफ कर, तोड़े हँव विश्वास।।


फेर वचन हँव देत मँय, करहूँ जग उद्धार।

जावत हँव सत खोज बर, छोड़ आज घर द्वार।।


सत खोजन बर गे निकल, गुरु जी छात पहाड़।

जिहाँ शेर भालू रहय, कटकट जंगल झाड़।।


धुनी रमाये बैठ गे, ध्यान लगा सतनाम।

पाये जी गुरु ज्ञान ला, बना हृदय सत धाम।।


छै महिना ले तप करिस, पाये बर सत ज्ञान।

जोग साधना से बनिस, गुरु जी संत महान।।


सफुरा पुत्र वियोग मा, तज दे राहय प्रान।

आके घासीदास गुरु, देइस जीवन दान।।


आंदोलन सतनाम के, करिस जोर शुरुआत।

जाति- पाति के बँध मा, फँसे रहिन सब जात।।


मनखे ले मनखे छुआ, छूत करे कुछ लोग।

रूढ़िवाद पाखण्ड के, छाये राहय रोग।।


बोले घासीदास गुरु, मनखे-मनखे एक।

एक खून तन चाम हे, राह चलौ सत नेक।।


मानवता के पाठ पढ़, लौ सब संत सुजान।

आही सुमत समाज मा, बोले संत महान।।


जगह-जगह सत रावटी, होवय गुरु जी तोर।

जोड़े सबो समाज ला, बाँध दया के डोर।।


ढोंग रूढ़ि पाखण्ड के, छाय रहय अँधियार।

मुक्ति दिलाइस संत गुरु, करके सत्य प्रहार।।


सत रद्दा चलिहौ कहिस, बानी रखिहौ नेक।

लोभ मोह अभिमान ला, देहव संतो फेक।।


मनखे जग कल्यान बर, देइस सत संदेश।

कर लौ पालन संत जन, मिट जाही सब क्लेश।।।


दिये सात संदेश गुरु, ब्यालिस अमरित बोल।

अमल करौ सब संत हो, हिरदे के पट खोल।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/12/2024

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[12/18, 8:44 AM] मनोज वर्मा:

 सत के राह बताय हस, बाबा घासीदास।

सद्गुरु परमात्मा तँही, टोरे भव के फाँस।।


सादा झंडा सत्य के, जैतखाम पहिचान।

लहर लहर लहरात हे, धरती अउ असमान।।


सत्य अहिंसा अउ शांति के, संग सात संदेश।

मानवता बड़का गढ़े, मेटे सबो कलेश।।


सत मा रख बिसवास बड़, कर्म हवै परधान।

जपत रहौ सतनाम ला, सार इही जग जान।। 


फोकट गढ़े प्रपंच जन, जात पात तज भेद। 

मनखे मनखे एक सब, ऊँच नीच दव खेद।। 


जीव बराबर हे सबो, करव नहीं संघार। 

प्रीत जीव ले हो सदा, छोड़व मांसाहार।। 


पर धन नजर लगाव झन, दूसर हक झन खाव। 

रहव जुआ ले दूर तुम, घिनही जानौ घाव।। 


नशा नाश करथे सकल, धन आदर परिवार। 

रख एकर ले बैर नित, तन मन लेवय मार।। 


रद्दा सत के रेंग चल, भक्ति भाव धर पास। 

कहे सात संदेश शुचि, बाबा घासीदास।। 


मनोज कुमार वर्मा 

बरदा लवन बलौदा बाजार 



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 ₹

[12/18, 9:45 AM] मुकेश 16: बाबा गुरु घासीदास-- बरवै छंद



महँगू के लाला हे,  घासीदास।

तोर नाँव ले मन मा, भरे उजास।।


पेड़ तरी धौंरा के, ध्यान लगाय।

पोठ तपस्या करके, सत ला पाय।।


जन मानस मा जाके, अलख जगाय।

मानवता के सब ला, पाठ पढ़ाय।।


मनखे-मनखे जानव, एक समान।

देइस सुग्घर सब ला, सत के ज्ञान।।


स्वेत ध्वजा हा तोरे, सुमता लाय।

जैतखाम हा सत के, राह बताय।।


करव कभू झन संगी, मदिरा पान।

सत्य नाम ला जपलव, पाहव मान।।


छुआछूत ला बाबा, दूर भगाय।

दीन-दुखी के तँय हा, बने सहाय।।


परनारी ला जानव, मातु समान।

नारी ले ही होथे,  जग कल्यान।।


सादा जिनगी सब झन, करव गुजार।

पाप हवय जी करना,  मांसाहार।।


सबो धरम ला देवव, गा सम्मान।

जात-पात ला छोड़व, बनव महान।।


काम-क्रोध ला टारव, सोंच विचार।

सदा लगाथे गुरु हा, भव ले पार।।


छोड़व अंधविश्वास, मन मा ठान।

हवय जीव हत्या हा, पाप समान।।


सत्य अहिंसा के तँय, दे संदेश।

लोगन के जिनगी ले, काटे क्लेश।।


दूर  रहव  चोरी  ले,  जाथे मान।

जुआ घलो मा होथे, बड़ नुकसान।।


मूर्ति कभू झन पूजव, मोर मितान।

सत मा हावय ईश्वर, लेवव जान।।


मन मा विश्वास रखव, जय सतनाम।

तुरते बनही सबके,  बिगड़े काम।।



मुकेश उइके "मयारू"

ग्राम- चेपा, पाली, कोरबा(छ.ग.)

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[12/18, 9:54 AM] विजेन्द्र: बाबा घासीदास के संदेश - चौपई छंद


सादा जीवन उच्च विचार Iपरहित सेवा सद व्यवहार II

खुदे बनाये गा पहचान I तभे मिलत हावय सम्मान II


छुआ-छूत ला माने रोग I विधवा मन के सुने बियोगII

जात-पात के भेद मिटाय।सत्यनाम के अलख जगाय II


मनखे-मनखे एक बताय I सत के रद्दा उही दिखाय II

नशा-पान होथे जी काल I जीवन मा झन येला पाल II


पर के धन ला पथरा जान Iपर नारी महतारी मान II

अइसन देवय वो हर सीख I करम करव झन माँगव भीख II


नोनी बाबू एके जान Iदूनों मा बसथे गा प्रान II

सत मा राखव गा विश्वास I होही तब कुमता के नास II

विजेन्द्र कुमार वर्मा 

नगरगाँव (धरसीवाँ)

💐💐💐💐💐💐💐💐💐

: *रूप घनाक्षरी*

विषय: *सतनामी*


सतनामी कोन हरै, काहीं ले जे नइ डरै,

करै सदा सत बात, जपै नित सतनाम।

माॅंस कभू खाय नइ, दारु भट्ठी जाय नइ,

देवै नइ गारी कभू, करै नेक हर काम।

रखै नइ छल द्वेष, जेकर हे सादा भेष,

एक मानै मनखे ला, गिरौदपुरी ला धाम।

चंदन लगाय सादा, ताम-झाम नइ जादा,

अपन निभाय वादा,पूजै जोड़ा जैतखाम।।


*तुषार शर्मा "नादान"* 

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐// 

हिनमान के आँसू पोंछाईस //

गिरौदपुरी के सुरुज हा संगी, सत के सुरुज परघाईस।

धरम- करम जग जीव मरम,गुरु घासीदास बताईस।।

पान- सुपारी नरियर-भेला, चंदन-बन्दन स्वारथ खेला।

सतनाम रमे हे घट - घट मा ,सुजानिक मन पतियाईस।।


कोन्हो मनखे होय न हीनहर,जग ल जग जग ले परखाईस।

असत के हीरा कीरा बरोबर, बीमारी रहिस दूरि- हाईस।।

जनम ले कोन्हो न निचहा ऊंचहा,करम ले मिले पीढ़ा ऊंचहा।

सत बल ले धरती अगास हावय,भरम के बादर चटकाईस।।


जुग-जुग ले तोपे ढांपे सत उघरिस,जग अंजोर बगराईस।

मुँह लुकाय उनला परगे,जेन मन सत के सुरुज लुकाईस ।।

मनखे-मनखे बरोबर होथे, पापी अधरमी काँटा बोथें।

छुआछूत अउ ऊँच-नीच,हिनमान के आँसू पोंछाईस।।


सत के जोत मिलिस तेनला,जग म बांट-बांट बगराईस।

बंटईया बर तो कभू खंगय नही,देवईया घलो सँहराईस।।

दुख-सुख के सबो बरोबर बांटा,संग संगिनी सफुरा माता ।

अमरौतिन महंगू के ललना, सुग्घर सत धजा फहराईस।।

🙏🙏🙏🙏🙏🙏

             रोशन साहू 'मोखला' राजनांदगांव

                        7999840942

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[ *गुरु बाबा घासीदास जयंती के शुभकामना अउ बधाई*


(1)

मनखे मनखे एक, इही हे सुख के मन्तर

जिहाँ नहीं हे भेद, उहीं असली जन-तन्तर

बाबा घासी दास, हमन ला इही बताइन

जग ला दे के ज्ञान, बने रद्दा देखाइन ।।

(2)

जिनगी के दिन चार, नसा पानी ला त्यागौ

दौलत माया जाल, दूर एखर ले भागौ।

जात-पात ला छोड़, सबो ला मनखे जानौ

बोलव जय सतनाम, अपन कीमत पहिचानौ।।

(3)

काम क्रोध मद मोह, बुराई लाथे भाई

मिहनत करके खाव, इही हे असल कमाई

सत्य अहिंसा प्रेम, दया करुणा रख जीयव

गुरु के सुग्घर गोठ, मान अमरित तुम पीयव।।


*अरुण कुमार निगम*

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*गुरु घासीदास जयंती विशेषांक*


*बरवै छंद*


गुरू महिमा


अमरौतिन के कोरा ,खेले लाल।

महँगू के जिनगी ला ,करे निहाल।1।


सत हा जइसे चोला ,धरके आय।

ये जग मा गुरु घासी ,नाम कहाय।2।


सत्य नाम धारी गुरु ,घासीदास।

आज जनम दिन आये ,हे उल्लास।3।


मनखे मनखे हावय ,एक समान।

ये सन्देश दिए हे, गुरु गुनखान।4।


देव लोक कस पावन ,पुरी गिरौद।

सत्य समाधि लगावय ,धरती गोद।5।


जैतखाम  के महिमा ,काय बताँव।

येला जानव भैया ,सत के ठाँव।6।


निर्मल रखव आचरण ,नम व्यवहार।

जीवन हो सादा अउ ,उच्च विचार।7।


बिन दीया बिन बाती ,जोत जलाय।

गुरु अंतस अँंधियारी ,दूर भगाय।8।


अंतस करथे उज्जर ,गुरु के नाम।

पावन पबरित सुघ्घर ,गुरु के धाम।9।


आशा देशमुख

💐88889889

[

हाथ जोड़ विनती करॅंव , बाबा घासीदास ।

दया मया ला राखहूॅं , अतके हाबय आस।।


सत् के रद्दा मा चलव , अइसन दे गुरु ज्ञान।

 पबरित राहय मन सदा , करॅंव तोर बस ध्यान।।


 संजय देवांगन सिमगा 

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परमपूज्य संत गुरु घासीदास जी

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(रोला छंद)


गुरु हे घासीदास , सत्य के परम पुजारी।

 सत के जोत जलाय, संत जग के हितकारी।

 पावन गांँव गिरौद,मातु अमरौतिन कोरा।

 धन-धन महँगू दास, पिता बन करिन निहोरा।1


 सत्य पुरुष अवतार, तोर महिमा हे भारी।

 सुमर-सुमर सतनाम, मुक्ति पाथें नर-नारी। 

ऊँच-नीच के भेद,मिटाये अलख जगाके।

 मनखे- मनखे एक, कहे सब ला समझाके। 2

तोर सात संदेश, सार हे मानवता के ।

समता के व्यवहार, तोड़ हे दानवता के।

 छुआछूत हे पाप, पुण्य हे भाईचारा।

 जात पात हे व्यर्थ, कहे सब करौ किनारा। 3


मातु पिता हे देव, तपोवन हावय घर हा।

 सबके हिरदे खेत, प्रेम के डारन थरहा।

 गुरु के आशीर्वाद,पाय हन छत्तीसगढ़िया।

 सत मारग मा रेंग, बने हन सब ले बढ़िया।4


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद,छत्तीसगढ़

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[ रूप घनाक्षरी - बोल हे सतनाम (१८/१२/२०२४)

(८,८,८,८)४ , अंत - गुरु लघु



बोल जय सतनाम , बनही बिगड़े काम ,

सत के पुजारी कहे , गुरु बाबा घासीदास ।

गुरतुर बोली बोल , जिनगी मा रस घोल ,

दया - मया कर लेना , जब तक हवै साॅंस ।

छोड़ दे इरखा द्वेष , कट जाही सबो क्लेश ,

सुख - चैन घर आही , मन मा रख ले आस ।

माया के फइले जाल , जे बने जीव के काल ,

बच के रहिबे तॅंय , घूमत हे आस - पास ।



✍️ओम प्रकाश पात्रे 'ओम '🙏

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[


जय बाबा गुरू घासीदास 

        (सार छंद)

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छत्तीसगढ़ के सुरुज बरोबर, सत अँजोर बगरइया। 

जन जन मा भाईचारा अउ, सुम्मत भाव जगइया। ।

मनखे सबो समान बताके, सत्यनाम गुन गाइन। 

मानवता के सुघ्घर रस्ता, दुनिया ला देखाइन। ।

अइसन संत सुजानी के हर, करम बचन हें पावन। 

बाबा घासीदास गुरु ला, जन जन करथें बंदन। ।

       जय सतनाम!!

दीपक निषाद -लाटा (बेमेतरा)

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[12/18, 4:13 PM] +91 84358 44508: *कुंडलिया छंद*


*बाबा घासीदास के,महिमा गजब महान।*

*मछरी- मास शराब ला ,त्याग तभे  पा ज्ञान।।*

*त्याग तभे पा ज्ञान,करम जस गावत जाबे।*

*मनखे  - मनखे एक,नाम सत के गुन गाबे।*

*रद्दा  रेंगव नेक, मया भर काबा- काबा।*

*हिंसा - हत्या पाप, करव झन  कहिथे बाबा।।*



*अमितारविदुबे©®*

*छत्तीसगढ़*

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मैंहा बदना बदथौं तोर नाम के हों गुरुबाबा 

पंइया परत हों जैतखाम के

तै बिराजे गिरौदपुरी धाम में हो गुरुबाबा 

दीया जलाये सतनाम के

 

दाई अमरौतिन बाबा ददा मंहगू दास हो

तोला पाये खातिर बाबा करिन हे उपास हो

बनके दीया हो बाबा अंगना मा आये हो 

जगमग जगमग जग जगमगाये हो

बनके सुरुज तैहा छाये हो गुरुबाबा 

महिमा बढ़ाये गिरौद धाम के...


धरम करम सत नियम बताये हो

सादा रंग झंडा सादा जीवन सिखाये हो

बांटे सदज्ञान बाबा जग हरसाये हो

तोर दिये ज्ञान आज जग गुन गाये हो

ऊंचनीच भेद ला मिटाये हो गुरुबाबा 

सुमता जगाये सरेआम मे...


रचनाकार 

तोषण चुरेन्द्र 'दिनकर' 

धनगाँव डौंडी लोहारा बालोद छत्तीसगढ़

Monday, December 16, 2024

कुर्सी महिमा-चौपई छंद

 कुर्सी महिमा-चौपई छंद


दागी मन के धोथे दाग।समझव येला तीर्थ प्रयाग।।

मूरख बाँचे कथा पुरान।कहाँ उँखर बर बने विधान।।


कुर्सी के जब चढ़े बुखार।नीत नियम होवय लाचार।।

पद रुतबा के जय जयकार। कुर्सी ले चलथे सरकार।।


रंग बदलथे बारंबार। कुर्सी बर गिरगिट अवतार।।

कुर्सी सहिथे कतको भार।लेन- देन चलथे व्यापार।।


पद पाये बर लगे कतार।लोग भुलाके शिष्टाचार।।

कहूँ मचे हे चीख पुकार।कहूँ सजे हावय दरबार।।


कुर्सी के सब पूछन हार।बिन कुर्सी जीवन बेकार।।

अइसन करथे खेल कमाल।इँखर कृपा ले गलथे दाल।।


कुर्सी पा के गंग नहाय।सात पुस्त वोकर तर जाय।।

नाता-गोता मन बउराय।छप्पन भोग रोज के खाय।।


कुर्सी ला समझव भगवान।घर बन निक गा सरग समान।।

हावय कतका येकर ताप।धुल जाथे कतको गा पाप।।


लबरा बाँटे सुग्घर ज्ञान।होय देख के जन हैरान।।

ज्ञान बाँट के माल डकार।मारय पर के हक अधिकार।।


जल जंगल अउ भुईं पहाड़। कुर्सी के बल होय उजाड़।।

सांसत मा सबके हे जान।बचा तहीं हर अब भगवान।।


सत्ता लोभी मन हर आज।झन बइठे कुर्सी ला साज।।

अइसे मन हा शोभित होय।बीज करम के जे मन बोय।।

विजेन्द्र कुमार वर्मा 

नगरगाँव (धरसीवाँ)

Thursday, December 12, 2024

अमर शहीद वीर नारायण सिंह के शहादत दिवस मा तीन पीढ़ी के कलमकार मन के कविता के संग्रह - 🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

 अमर शहीद वीर नारायण सिंह के शहादत दिवस मा तीन पीढ़ी के कलमकार मन के कविता के संग्रह -

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क्रान्तिकारी कवि लक्ष्मण मस्तुरिया के वीर काव्य *सोनाखान के आगी* के कुछ अंश


भाई-भाई म फूट डार दिन, मनखे-मनखे ल देइन लड़ाय

करजा बाँट करेजा काटिन, धरमी धरम सबो सर जाय।


किस्सा बड़े-बड़े कतको हे, ये भुइयाँ के सोसन के

जयचंद अउ मिरजाफर जतका, मुखिया होथे लोकखन के।


जोर जुल्म के उही समे मा, सभिमानी मन करिन विचार

परन ठान के कफन बाँध के, म्यान ले लिन तलवार निकाल।


फूँकिन संख सन सन्तावन म, कापिन बइरी गे घबराय

साह बहादुर लक्ष्मीबाई अउ, नाना टोपे सुरेन्दर साय।


मंदसौर ले खान फिरोजा, ग्वालियर के बैजा रानी

सहीद कुँअर सिंह आरा वाले, बानपुर के मर्दन बागी।


राहतगढ़ के आदिल मोहम्मद, अमझेर  ले बख्तावर सिंग

सादत खाँ इंदौर ले गरजिस, देस धरम बर जीव दे दिन।


उही समे म छत्तीसगढ़ के, गरजिस वीर नारायेन सिंग

रामराय के बघवा बेटा, सोनाखान धरती के धीर। 


सन छप्पन के परे दुकाल, कंद मूल घलो मिलै न पान

जंगल छोड़ पसु-पंछी परागै, भूख म परजा तजै परान।


निरमोही बयपारी आगू, वीर नारायेन जोरिस हाथ

परजा भूख मरत हे ठाढ़े, दे दौ करजा अन्न धन बाँट।


बड़े मुनाफा के लालच म, बयपारी बइठिन कठुवाय।

कोनो मरै जियै का हम ला, नइ कुछ देवौ बात सुनाय।


अन्यायी के आगू आके, अन्न धन लूट देइस बँटवाय

बनवासी जैकार करिन सब, जै-जै वीर नारायेन राय।


अँगरेजिया संग मिल बयपारी, नारायेन ल दिन बेड़वाय

चोरी डाका दफा लगाके, रइपुर जेल म दिन बँधवाय।


जमींदार मैं सोनाखान के, सोना उपजे मोर माटी म

जिहाँ के भुइँधर भूख मरत हे, आग बरै मोर छाती म।


आगी लगगे सोनाखान म, दहकिस सोना अँगरा कस

जेल टोर के बागी भागगे, इलियट भइगे अँधरा कस।


देवरी के जमींदार दोगला, बहनोई वीर नारायेन के

दगा दिहिस बाढ़े विपत म, काम करिस कुकटायन के।


अँगरेजिया स्मिथ बड़ कपटी,उही गद्दार ल लिस मिलाय

बेलासपुर भटगांव बिलइगढ़, घलो के सेना संग लेवाय।


अनियायी के अनिया सहना, सबले बड़े होवै अनियाय

काट के पापी ल खुद कट जावै, धरम करम गीता गुन गाय।


बिना सुराजी के जिनगानी, मुरदा हे तन मरे समान

बिना मान सभिमान के मनखे, गाय गरु अउ कुकुर समान।


पाए बर अधिकार परन धर, एक बेर तो निकल परौ

टंगिया रापा गैंती धर के, एक बेर तो बिफर परौ।


एक गिरौ दस मार मरौ तुम, एक जुझौ सौ देवौ जुझाय

कफन बाँध रन कूद परौ तुम, भागे बइरी प्रान बचाय।


भुईं महतारी के रक्षा बर, असली मनखे प्रान गँवाय

कायर फँसथे सुख सुविधा बर, नकली चकली साज सजाय।


अन्यायी कट कचरा होथे, न्यायी खप के सोन समान

धरमी जागै अलख जगावै, पापी के मुँह कसे लगाम।


तप तप तन-मन बज्जुरा बनथे, खप खप देह भभूत समान

जनम जनम के जंग जुझारू, होथे वीर सपूत महान।


तप बिन तन-मन तलमलतइया, प्रन बिन प्रानी पसु पछार।

त्याग बिना जीव तनानना के, दया धरम बिन गरु गँवार।


हर हर महादेव कहि कहि के, सरदारन के जोस बढ़ाय

मार मार के काट काट कहि, नारायेन गरजै गुर्राय।


चारों खूंट ले जंगल मंझ म, घिरगे वीर नारायेन फेर

सेना खपगै गोली खंगगै, घायल भइगे घायल सेर।


मनेमन गुनिस वीर नारायेन, अब तो लड़े अकारथ हे

बन-कांदी कस लोग कटत हें, मरना मोर सकारथ हे।


आ स्मिथ अब बाँध मोला, मत मार निहत्था रइयत ल

गरज के बोलिस बागी वीर ले, रोक ले सांग सिपहियन ल।


कबरा घोड़ा करेलिया म बइठे, बेधड़क चलिस नारायेन राय

पाछू पाछू अंगरेज स्मिथ, आजू बाजू सेना सजाय।


सरेआम चौरास्ता मंझ म, सभा भरे डंका बजवाय

सावधान नारायेन सिंग ल, तोप दाग देहैं उड़वाय।


जै सुराज जै जनम भूमि के, गरजिस वीर उठाके हाथ

सुरुज देव के नमन करिस अउ, धुर्रा उठा चढ़ा लिस माथ।


तान के छाती खड़े वीरसिंग, बेधड़क देख रहे मुस्काय

आर्डर होत भये सन्नाटा, छूटिस तोप गरज गर्राय।


चंदन बनगे तन बागी के, माटी लहू मिले ललियाय

धर धर आँसू धरती रोइस, चहुंदिस अँधियारी घिर आय।


हाय रे माटी तोरो करम ल, ठाढ़ दरक गे तोरो भाग

सोन गँवा गे सोनाखान के, कायर कपटी मन के राज।


मनखे संग गद्दारी करके, माफी पा जाही बेईमान

माटी संग गद्दारी करही, वोला नइ बकसै भगवान।


असने कतको वीर खपे हें, छत्तीसगढ़ के माटी म

काँध ले काँध मिलाके रेंगैं, देस के सुख दुख पाती म।


कोन कथे माटी के मनखे, जागे नइये सूते हे

जब जब जुलमी मूड़ उठाथें, तब तब बारूद फूटे हे।


वीर नारायेन के सपना ह, टूटत हवै अधूरा हे

धधके छाती छत्तीसगढ़ के, दुख के बढ़ती पूरा हे। 


अरे नाग तैं काट नहीं त, जी भर के फुंफकार तो रे

अरे बाघ तैं मार नहीं त, गरज गरज धुत्तकार तो रे।


एक न एक दिन ए माटी के, पीरा रार मचाही रे

नरी कटाही बइरी मन के, नवा सुरुज फेर आही रे।


रचनाकार - लक्ष्मण मस्तुरिया

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कवि हरि ठाकुर जी के खंडकाव्य "अमर शहीद वीर नारायणसिंह" पढ़े के सौभाग्य नइ मिलिस फेर एक लेख म दू पंक्ति मिलिस जेला खंडकाव्य के अंश के रूप म प्रस्तुत करत हँव -  


कोनहा म खड़े हनुमान सिंह देखत हे ये कुरबानी ला

परतिज्ञा आज करत हौं मैं, बदला एकर ले के रइहौं

जब हो जाही प्रण पूरा तब, तलवार म्यान म धरिहौं।


रचनाकार - कवि हरि ठाकुर 

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वीर नारायण सिंह के बलिदान गाथा कवि केयूर भूषण अउ निरुपमा शर्मा जी अपन अपन कविता म करिन हें। इन मन के कविता पढ़े के भी सौभाग्य मोला नइ मिल पाइस। 

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अमर शहीद वीर नारायण सिंह ला छन्द के छ परिवार के श्रद्धा - सुमन


(1) आल्हा छन्द - कमलेश वर्मा

"सोनाखान के वीर"


सत्रह सौ पंचनबे सन मा, झूम उठिस बड़ सोनाखान।

रामराय घर जनम धरिन जी, हमर राज के बड़का शान।1।


मातु पिता मन खुशी मनावत, नारायण सिंह धर लिन नाम।

निडर साहसी बचपन ले वो, पूजय देवता बिहना शाम।2।


जमींदार बन वो हा आघू, बिकट करिस जी जनकल्यान।

पूरा कोशिश सदा करिस वो, झन राहय कोनो परशान ।3।


जब अकाल अउ सूखा पड़ गिस,सन छप्पन के घटना जान।

तब जनता मा  बँटवा दिस वो, अपन सबो कोठी के धान।4।


तभो बहुत झन भूख-प्यास ले, करत रिहिन हे चीख-पुकार।

लोगन संगे नारायण तब, गिस व्यापारी माखन- द्वार।5।

 

फेर सेठ के दिल नइ पिघलिस, नइ दिस वोहर धान उधार।

तब नारायण सिंह हा बोलिस, सबो लूट लेवव भंडार।6।


घटना पाछू माखन पहुँचिस, अंगरेज इलियट के तीर।

मोर लूट लिन कोठी साहब, मनखे अउ नारायण वीर।7।


फेर पकड़ के नारायण ला, अंगरेज मन भेजिन जेल।

तोड़ जेल ला वोहर निकलिस, करके बड़का सुग्घर खेल।8।


वापिस सोनाखान पहुँच के, कर लिस वो सेना तैयार।

अंगरेज मन संग युद्ध मा, सेना भारी करिस प्रहार।9।


चलिस सरासर बान धनुष ले, अउ होइस भाला ले वार।

कैप्टन स्मिथ के दल कोती जी, मच गिस बिक्कट हाहाकार।10।


फेर अंत मा घमासान के, बंदी बनगे वीर महान।

चलिस मुकदमा झूठ-कपट ले, देशद्रोह ला कारन मान।11।


नारायण ला सजा सुना दिस, फाँसी दे के ले बर जान।

रइपुर के जय स्तंभ चौक मा, दे दिस योद्धा हा बलिदान।12।


अपन प्रान ला देके वोहर, रख लिस बड़ माटी के मान।

जुग-जुग बर अम्मर होगे जी, लाँघन-भूखन के भगवान।13।


सन संतावन के ये घटना, छागे पूरा हिन्दुस्तान।

जनता मन हा जागिन भारी, आजादी बर दिन सब ध्यान।14।


नारायण सिंह के भुइँया ला, सरग सँही देवव सम्मान।

बार-बार मैं मूड़ नवावँव,पावन माटी सोनाखान।15।


रचना - कमलेश कुमार वर्मा

व्याख्याता, भिम्भौरी

बेरला,बेमेतरा (छत्तीसगढ़)

मो.-9009110792

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(2) आल्हा छन्द - नमेंद्र कुमार गजेंद्र

      "वीर नारायण सिंह"


रामराय के घर मा जन्मे , बालक संतावन मा एक।

नारायण बिंझवार नाम के , सुन लव सुग्घर गाथा नेक ।।


अंग्रेजन सन लोहा लेवत , मन मा राखिस भारी धीर।

माटी के नारायण बेटा , माटी बर लड़ बनगे वीर ।।


वो सिंघगढ़ के राजा बेटा , जेखर नाम रहिस बिंझवार।

परजा बर बघवा सन लड़गे, हाथ बनिस वोकर तलवार ।।


बहादुरी के सुन के गाथा , अंग्रेजन दे नामे वीर।

वीर लगे जे नारायण तब , फैले गाथा जमुना तीर ।।


जमाखोर के अन्न लूट के, जनता ला दे दिस वो बाँट।

लोगन कोनो भूख मरे झन, बइठे सोचे घर के आँट ।।


बस्तर के जब नरनारी ला , नारायण दे रहिस सकेल।

अंग्रेजन मन के माथा ले , रहिस बोहाये भारी तेल ।।


हँसिया साबर धर के परजा , नारायण सँग हो तैयार।

माटी के खातिर सब लड़गें , भेजिन सब गोरा यम द्वार ।।


बना आदिवासी के सेना , खड़े रहिस बघवा कस वीर।

एक झपट्टा भर वो मारे , छाती सबके देवय चीर ।।


आजादी के बन वो नायक , भरे रहिस भारी हुंकार।

कुकुर बिलइ कस अंग्रेजन मन , भागन लागिन सुन चित्कार ।।


शेर गोंडवाना बस्तर के , आजादी के योद्धा आय।

काँट भोंग के अंग्रेजन ला , अपन राज ले हवय भगाय ।।


बघवा ला पहिना के बेंड़ी ,  अंग्रेजन चौड़ा कर माथ।

रइपुर के जय स्तंभ चौक मा , फाँसी दे दिस बाँधे हाथ ।।


रचनाकार-नेमेन्द्र कुमार गजेन्द्र

ग्राम-हल्दी(गुंडरदेही) जिला-बालोद

मोबा.8225912350

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(3) आल्हा छन्द -  विरेन्द्र कुमार साहू


     "वीर नारायण सिंह"


नारायण सिंह धाकड़ चेलिक , बइरी बर सँउहे यमदूत।

लड़िस लड़ाई स्वतंत्रता के , माटी हितवा वीर सपूत।1।


जब जब बइरी मन आ-आके , करे रहिन भारी अतलंग।

पानी पसिया देके भिड़गे , रन मा वोहर बइरी संग।2।


रामसाय के बघवा बेटा , लइका रहय घात के ऊँच।

पोटा काँपय बइरी मनके , रेंगय बीस हाथ ले घूँच।3।


बाँधे पागा लाली फेंटा , सादा धोती उनकर शान।

हाथ म पहिरे चाँदी चूरा , सोना-बारी सोहे कान।4।


रहय रोठ बंदूक पीठ मा , कनिहा मा धरहा तलवार।

बउरे इनला सदा वीर हा ,केवल खातिर पर उपकार।5।


छंदकार : विरेन्द्र कुमार साहू , ग्राम -.बोड़राबाँधा (राजिम), जिला - गरियाबंद (छ.ग.) 9993690899

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(4) आल्हा छंद - श्लेष चन्द्राकर


     "वीर नारायण सिंह"


महावीर नारायण सिंह ला, रिहिस देश ले अब्बड़ प्यार।

लड़िस लड़ाई आजादी के, आँखी मा भरके अंगार।।


जन के हक मारय अँगरेजन, अपन भरयँ जी उन गोदाम।

काम करावँय घात रात दिन, अउ देवँय गा कमती दाम।


दिन-दिन जब अँगरेजन मन के, बढ़त रिहिस हे अत्याचार।

तब विरोध मा आघू आइस, नारायण हा धर तलवार।।


कभू गुलामी के जिनगी हा, उन ला गा नइ आइस रास।

सबो आदिवासी ल सकेलिन, अपन बनाइन सेना खास।।


नारायण हुंकार भरिस हे, सबो उठाइस तब हथियार।

लड़िस हवँय गोरा मन सन जी, ओमन माँगे बर अधिकार।।


जुलुम देख के मनखे ऊपर, अब्बड़ खउलय सिंह के खून।

देख वीर ला गोरा मन के, गिल्ला हो जावँय पतलून।।


रिहिस हवय नारायण सिंह हा, ऊँचा-पूरा धाकड़ वीर।

उठा-उठा के ठाढ़ पटक के, बैरी मन ला देवय चीर।।


जब दहाड़ बघवा कस मारय, बने-बने के जी थर्राय।

प्रान बचाये बर बैरी मन, रुखराई के बीच लुकाय।।


खच खच खच तलवार चलावय, मारय सर सर गा ओ तीर।

अँगरेजन के सैनिक मन हा, उनकर आघू माँगय नीर।।


रिहिन वीर नारायण सच्चा, भारत माता के जी लाल।

करे रिहिन सन संतावन मा, अँगरेजन के बाराहाल।।


छंदकार - श्लेष चन्द्राकर,

पता - खैरा बाड़ा, गुड़रु पारा, महासमुन्द (छत्तीसगढ़)

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(5) आल्हा छंद  - महेन्द्र देवांगन माटी


           "वीर नारायण सिंह"


रामराय के घर मा आइस , भारत माता के वो लाल।

ढोल नँगाड़ा ताँसा बाजे , अँगरेजन के बनगे काल।।


लइका मन सँग खेलय कूदे , कभू नहीं  मानिस वो हार।

भाला बरछी तीर चलावै , कोनों नइ पावय गा पार।।


जंगल झाड़ी पर्वत घाटी  , घोड़ा चढ़ के वोहर जाय।

वोकर रहय अचूक निशाना , बैरी मन ला मार गिराय।।


नारायण सिंह नाम ल सुन के , अँगरेजन मन बड़ थर्रांय।

पोटा काँपय गोरा मन के , जंगल झाड़ी भाग लुकाँय।।


जब जब अत्याचार बढ़य जी , निकल जाय ले के तलवार ।

गाजर मूली जइसे काटे , मच जाये गा हाहाकार ।।


खटखट खट तलवार चलाये , सर सर सर सर तीर कमान ।

लाश उपर गा लाश गिराये , बैरी के नइ बाँचे जान ।।


सन छप्पन अंकाल परिस तब , जनता बर माँगीस अनाज ।

जमाखोर माखन बैपारी  , नइ राखिस गा वोकर लाज ।।


आगी कस बरगे नारायण , लूट डरिस जम्मो गोदाम ।

सब जनता मा बाँटिस वोहर , कर दिस ओकर काम तमाम।।


चालाकी ले अँगरेजन मन , नारायण ला डारिस जेल।

देश द्रोह आरोप लगा के , खेलिस हावय घातक खेल।।


दस दिसम्बर संतावन मा , बीच रायपुर चौंरा तीर।

हाँसत हाँसत फँदा चूम के , झुलगे फाँसी माटी वीर ।।


छंदकार - महेन्द्र देवांगन "माटी"

पंडरिया  (कबीरधाम) छत्तीसगढ़

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(6) कुकुभ छंद गीत-श्रीमती आशा आजाद


छत्तीसगढ़ म जनमिस हीरा, वीर नरायण कहलावै।

सच्चा सेनानी ओ राहिन,भारत मा गुन ला गावै।।


अंग्रेज़ी सासन ले जूझिन,अबड़ रहिन जी ओ दानी।

कुर्रूपाट मा जनम लिहिन जी,करिन देश बर अगवानी।

बिंझवार परिवार के बेटा,आज माथ ला चमकावै।

छत्तीसगढ़ म जनमिस हीरा,वीर नरायण कहलावै।।


नरभक्षी ओ शेर ल मारिन,ओखर पढ़लौ सब गाथा ।

अमर वीर के कुर्बानी ले,भारत के चमकिस माथा।

डरिस नही अंतस मन ले ओ,साहस सबके मन भावै।

छत्तीसगढ़ म जनमिस हीरा,वीर नरायण कहलावै।।


बहादुरी के अब्बड़ किस्सा,देश प्रेम अउ कुर्बानी।

ब्रिटिश राज हा मान बढ़ाइस,पदवी दिन आनी बानी।

जयस्तंभ के चौक म फाँसी,तोप तान के उड़वावै।

छत्तीसगढ़ म जनमिस हीरा,वीर नरायण कहलावै।।


बनिन स्वतंत्रता संग्रामी,याद रही ये बलिदानी।

छत्तीसगढ़ म अमर नाव हे,आज दिवस ला सब मानी।

हिरदे ले परनाम करौ जी,अइसन हीरा नइ आवै।

छत्तीसगढ़ म जनमिस हीरा,वीर नरायण कहलावै।।


छंदकार-श्रीमती आशा आजाद

पता-मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़

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(7) सरसी छंद - बोधन राम निषाद


वीर नरायन जनम धरिन हे, माटी सोना खान।

जंगल झाड़ी लड़िन लड़ाई, होके बड़े सुजान।।


जमीदारी के बोझा बोहे, जनता ला सुख देय।

ओखर हक बर काम करे वो, बैरी लोहा लेय।।


अठरा सौ सन् सन्तावन मा, लड़े शहीद कहाय।

वीर नरायन बेटा माँ के, छत्तीसगढ़ ल भाय।।


छंदकार-बोधन राम निषादराज

सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम (छत्तीसगढ़)

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(8) आत्मा वीर नारायण के (लावणी छंद)


दुख पीरा हा हमर राज मा,जस के तस हे जन जन के।

देख कचोटत होही आत्मा,शूरवीर नारायन के।


जे मन के खातिर लड़ मरगे,ते मन बुड़गे स्वारथ मा।

तोर मोर कहि लड़त मरत हे, काँटा बोवत हे पथ मा।

कोन करे अब सेवा पर के,माटी के खाँटी बनके।

देख कचोटत होही आत्मा,शूरवीर नारायन के।


अधमी सँग मा अधमी बनके,माई पिला सिरावत हे।

पइसा आघू घुटना टेकत,गरब गुमान गिरावत हे।

परदेशी के पाँव पखारय,अपने बर ठाढ़े तन के।

देख कचोटत होही आत्मा,शूरवीर नारायन के।


बाप नाँव ला बेटा बोरे, महतारी तक ला छोड़े।

राज धरम बर का लड़ही जे,भाई बर खँचका कोड़े।

गुन गियान के अता पता नइ, गरब करत हे वो धन के।

देख कचोटत होही आत्मा,शूरवीर नारायन के।


लाँघन ला लोटा भर पानी,लटपट मा मिल पावत हे।

कइसे जिनगी जिये बिचारा,रो रो पेट ठठावत हे।

अपने होगे अत्याचारी,मुटका मारत हे हनके।

देख कचोटत होही आत्मा,शूरवीर नारायन के।


नेता बयपारी मन गरजे,अँगरेजन जइसन भारी।

कोन बने बेटा बलिदानी,दुख के बोहय अब धारी।

गद्दी ला गद्दार पोटारे, करत हवय कारज मनके।

देख कचोटत होही आत्मा,शूरवीर नारायन के।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

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(9) लावणी छन्द - सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'*


''बीर नरायण सोनाखनिहा''


सुरता आ गे तोर ग मोला,आँखी मा आ गे पानी।

बीर नरायण सोनाखनिहा,हीरा बेटा बलिदानी।


बछर सत्तरह सौ पन्चनवे,जनम भइस मुँधराहा के।

छत्तीसगढ़ भुँइया खुश होइस,हीरा बेटा ला पा के।


नारायण आँखी के तारा,रामकुँवर महतारी के।

रामसाय के राज दुलरुवा,दीया डीह दुवारी के।


सत रद्दा मा रेंगस धर के,संत गुरू मनके बानी।

बीर नरायण सोनाखनिहा,हीरा बेटा बलिदानी।


सन अठ्ठारह सौ छप्पन मा,घोर अकाल परे राहय।

जनता के दुख भूख प्यास ला,तोर प्रयास हरे राहय।


विनत निवेदन नइ समझिस ता,बँटवा देये राशन ला।

अपरिद्धा माखन ब्यापारी,लिगरी करदिस शासन ला।


झूठा केस चलावन लागिस,ओ अँगरेजी अहमानी।

बीर नरायण सोनाखनिहा,हीरा बेटा बलिदानी।


माह दिसम्बर तारिक दस के,अठ्ठारह सौ सन्तावन।

फाँसी दे दिन तोला हीरा,गला भरत हे का गावन?


छत्तीसगढ़ के गाँव गली मा,तुरत पसरगे सन्नाटा।

जनता के हिस्सा मा जइसे,अँधियारी आ गे बाँटा।


तोर शहादत आँखी देखिस,रोइस रयपुर रजधानी।

बीर नरायण सोनाखनिहा,हीरा बेटा बलिदानी।


छन्दकार - सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'

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(10) छन्द के छ परिवार के कवि मनीराम साहू मितान जी के वीर काव्य के किताब "हीरा सोनाखान के" 3 बछर पहिली प्रकाशित होइस। 


ये किताब मा आल्हा छन्द के 251 पद हें। शुरू के 28 पद मा वंदना हे। आल्हा के 29  ले  65 पद मा गुलामी के पहिली के भारत के वैभव,  कोन-कोन विदेशी मन कब अउ कइसे आइन अउ हमर देश कइसे गुलाम होगे तेखर छन्दमय इतिहास बताये गेहे। आल्हा के पद संख्या 66 ले 75 तक देश मा कहाँ कहाँ अउ कोन कोन क्रांतिकारी मन आजादी बर आंदोलन चलाइन एखर बरनन हे। आल्हा के पद संख्या 76  ले 251 तक वीर नारायण सिंह के छन्दमय कथानक चले हे। बीच बीच मा उल्लाला, हरिगीतिका, बरवै, सरसी, शक्ति, चौपाई, मनहरण घनाक्षरी, शंकर, सार छन्द के प्रयोग एकरसता के दोष ले ये किताब ला मुक्त करत हे। मनहरण घनाक्षरी मा युद्धभूमि के वर्णन मा मनीराम साहू जी के काव्य कौशल देखते बनत हे। शब्द चुने के क्षमता कोनो कवि के श्रेष्ठता के पैमाना होथे। मनीराम साहू जी के शब्द चयन देखव - रिबी रिबी, घोंटो दर्रा, टकोली, अलथी कलथी,केलवली, तालाबेली, कुलकुला अइसन-अइसन ठेठ अउ दुर्लभ शब्द के प्रयोग उही कर सकथे जउन कवि हर नान्हेंपन ले  भुइयाँ  संग जुड़े रहिथे। ये किताब मा हाना के सुग्घर प्रयोग देखे बर मिलही। अलंकार प्रयोग के बात करे जाय त आल्हा छन्द, बिना अतिश्योक्ति अलंकार के नइ लिखे जाय। अतिश्योक्ति अलंकार के प्रयोग मनीराम साहू जी के विलक्षण काव्य क्षमता के गवाही देवत हे। 


आग बरन गा ओकर आँखी, टक्क लगा के देखय घूर।

बइरी तुरते भँग ले बर जय, हाड़ा गोड़ा जावय चूर।।


सिंह के खाँडा लहरत देखयँ, बइरी सिर मन कट जयँ आप।

लादा पोटा बाहिर आ जयँ, लहू निथर जय गा चुपचाप।।


हीरा सोनाखान के, ये किताब मा 21 प्रकार के छन्द के प्रयोग होय हे। मुख्य छन्द आल्हा आय जेखर 251 पद इहाँ पढ़े बर मिलही। इतिहास आधारित ये किताब मा तारीख अउ सन् के उल्लेख घलो करे गेहे।


सन् अट्ठारह सौ छप्पन मा, परय राज मा घोर दुकाल ।

बादर देवय धोखा संगी, मनखे मन के निछदिस खाल ।।


रहिस नवंबर सन्तावन मा, परे रहिस गा तारिक बीस 

सैनिक धरे चलिस इसमिथ हा, तइयारी कर दिन इक्कीस ।।


किताब के आखिर मा मनीराम साहू जी विष्णुपद अउ छप्पय छन्द मा कथानक के सीख अउ संदेश ला पाठक तक पहुँचावत,सोरठा छन्द ले समापन करिन हें।


पढ़े अउ जाने बिना चिंतन नइ हो सके। बिना चिंतन के कविता नइ हो सके अउ कविता ला छन्द मा बाँधे बर अभ्यास अउ साधना जरूरी होथे। हीरा सोनाखान के, एमा कवि के ज्ञान, चिंतन अउ साधना के दर्शन होवत हे। वइसे त ये कृति हर मनीराम साहू जी के आय फेर अब छत्तीसगढ़ी साहित्य के धरोहर बन जाही। जउन मन आजादी के इतिहास नइ जानत हें वहू मन ये किताब ला पढ़ के आजादी के इतिहास अउ वीर नारायण के त्याग ला जान जाहीं। ये किताब नवा कवि  मन ला नवा रद्दा देखाही कि छत्तीसगढ़ी मा सुग्घर कविता कइसे लिखे जाथे।

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प्रस्तुतकर्ता - अरुण कुमार निगम

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Friday, November 1, 2024

मनखे तोरो मेल नहीं

 मनखे तोरो मेल नहीं


दीया हे ता बाती नइये, बाती हे ता तेल नही।

धन हस तैं धन तोर दिवारी, मनखे तोरो मेल नही।


आज निवाई के थोरे हे, निशि-दिन आरी-पारी हे।

बारह घण्टा दिन उजियारा, वतके निशि अँधियारी हे।


पन्द्रह दिन के पाख अँजोरी, पन्द्रह के अँधियारी हे।

एक दिवस पुन्नी हे वोमा, एक अमावस कारी हे।


कण्डिल छोड़े टार्च बिसाये, उहू टार्च मा सेल नहीं।

धन हस तैं धन तोर दिवारी, मनखे तोरो मेल नही।


बाती के बलिदान न जाने, दीया बारत जुग भइगे।

सुरुज नरायण ला ऊ-ऊ के, आँख उघारत जुग भइगे।


आने तैं उजियार डहर हस, आने तैं अँधियार डहर।

काम परे मा लोटा धरके, टरक जथस तैं खार डहर।


जतका कन मन तोर दउँड़थे, दउँड़य बस अउ रेल नहीं।

धन हस तैं धन तोर दिवारी, मनखे तोरो मेल नहीं।


रथे जरूरत महिनत के तब, मन हर जाथे ढेर डहर।

घर-अँगना मा दिवा जला के, होथस खड़ा गरेर डहर।


सउँहे श्रम के सोन चमकही, देख खेत खलिहान डहर।

आन डहर झन देख निटोरे, देख सोनहा धान डहर।


पोथी-पत्र घलो हा कहिथे, मनखे अम्मरबेल नहीं।

धन हस तैं धन तोर दिवारी, मनखे तोरो मेल नही।


कातिक के अँधियार अमावस, सीमा ए अँधियारी के।

ओधे सकय नहीं दीया तिर, मर्म इही देवारी के।


माटी के दीया सन बरथे, आँटा के दीया जगमग।

देवारी मा होथे सबके, बाँटा के दीया जगमग।


दीया बार मढ़ा ड्यौढ़ी मा, अब तैं हाथ सकेल नहीं।

धन हस तैं धन तोर दिवारी, मनखे तोरो मेल नही।


-सुखदेव सिंह अहिलेश्वर 'सौमित्र'

गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़

Tuesday, October 15, 2024

संशो परे सुजान ला*

 *संशो परे सुजान ला*


बन बूटा हर चगल डरिस जी,हाँ सबो खेत के धान ला।

सुख सुविधा गरियार बना दिस,लइका के संग जवान ला।।

बुचवा सोंच परे मनखे के,कइसे कर डरबे ज्ञान ला।

सुरसा कस बाढ़े महँगाई, लगथे हर लिही परान ला।।


लालच हा लुलवा कर डारिस,राजा परजा दीवान ला।

नेता घलो बिजार ढिलागे,दुच्छा चर दिस ईमान ला।।

भाई-भाई लड़त मरत हें,घर डोर सउँप के आन ला।

जे नइ जानय दुनियादारी, तब संशो परे सुजान ला।।


अपन बिरान सबो ला लूटे,छल डारे हें भगवान ला।

शांति कहाँ मिलही सकेल के,हिंसा के सरी समान ला।

लाख विकास करव का हे जब,नइ जोंड़ सके इंसान ला।

बिख उछरत हर जिनिस जगत के,तुम मीठा रखव जुबान ला।।



     🙏🙏🙏🙏

नारायण प्रसाद वर्मा *चंदन*

ढ़ाबा-भिंभौरी बेमेतरा(छ.ग.)

      7354958844

कुण्डलिया छंद

 कुण्डलिया छंद 


जरही भारत देश मा, रावन के प्रतिरूप। 

असली रावन घूमथे, बदल-बदल के रूप।। 

बदल-बदल के रूप, हरन करथे नारी के। 

मूड़ मुड़ाही कोन , उही अत्याचारी के।। 

कहत शिशिर सच बात, दाग मा अचरा भरही।

जनम धरत हर साल , फेर का रावन जरही।। 


ज्ञानी हे लंकेश हा , गुण अवगुण भरपूर। 

अभिमानी के छाँव मा, मानवता हे दूर।। 

मानवता हे दूर, काम करथे मनमानी। 

अंतस कपटी चाल,  चलत हे भीतर घानी ।। 

कहत शिशिर सच बात, लोग बइठे अग्यानी। 

कहिथे सब बइमान, भले हो कतको ज्ञानी।। 


सुमित्रा शिशिर

दोहा - "स्कूल चलव सब पढ़व सब बढ़व"

 दोहा - "स्कूल चलव सब पढ़व सब बढ़व"

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सबो पढ़व आगू बढ़व, बनव सुजानिक लोग।

पल्ला   छाँड़े   भागही, अपढ़ अशिक्षा रोग।।


पढ़व लिखव सीखव सबो, आखर दीया बार।

अपढ़ अज्ञानी  झन रहव, मेटावव  अंँधियार।।


खोले स्कूल जगह जगह, संसोहिल  सरकार।

आखर अलख जगाय बर, हो जावव तइयार।।


पढ़ लिख बनव सुजान जी, जागव करव विचार।

झाँसा काकरो आव झन, जानव खुद अधिकार।।


करिया  आखर  ए  गड़ी,  भैंस  बराबर  आय।

पढ़े  लिखे  बर जान लव, गाय  सहीं उजराय।।


पढ़े  लिखे  के  गुण गजब, पढ़े ते  परछो पाय।

पढ़े  लिखे  गुनमान  हा, नइ  तो  कभू  ठगाय।।


पढ़ना लिखना सब करव, लइका रहे सियान।

पढ़े लिखे बर हर उमर, निक हे रखव धियान।।

                         *******

द्रोपती साहू "सरसिज"

महासमुंद छत्तीसगढ़ 

पिन  493445

घरेलू नुस्खा-दोहा छंद

 घरेलू नुस्खा-दोहा छंद 


मेथी बीजा ला भिगो, बड़े बिहनिया खाव।

रामबाण हे पेट बर, दुरिहा कब्ज भगाव।।


हरड़ बहेड़ा आँवला, तीनों पीस मिलाव।

सर्दी खाँसी जब लगे, चम्मच भरके खाव।।


सर्दी धर ले हे कहूँ, नाक बंद हो जाय।

अजवाइन ला सेंक के, सूँघव तो खुल आय।।


फोड़ा फुंसी होय तब, संगी झन डर्राव।

अजवाइन ला पीस के, नींबू संग लगाव।।


अलकर लागय पेट तब, जीरा फाँका मार।

गुनगुन पानी पी तभे, भागय गैस विकार।।


अदरक मा मधुरस मिला, खाँसी जब हो जाय।

कफ नाशक हे जान लव, श्वास फाँश दुरिहाय।।


दही दूध अउ घीव हा, तन बर हे वरदान।

भोजन मा शामिल करव, अमरित येला जान।।


दतवन करलव नीम के, कहिथे हमर सियान।

भागय दंत विकार हा, सार बात लव जान।।


दतवन चाब बबूल के, छाला दूर भगाय।

दरद मसूड़ा के घलो, जड़ ले तको मिटाय।।


गाजर रस मा आँवला, ढक्कन एक मिलाव।

खून बने भरपूर अउ, आँखी ला उजराव।।


काफी डोडा चाय हा, तन बर हे नुकसान।

झन पीयव गा जान के, पाचन बर हैवान।।


गुणकारी तुलसी हरे, सेवन जे कर जाय।

वात पित्त कफ दूर कर, सेहत स्वस्थ बनाय।।


जूस करेला के जउँन, पीथे बारह मास।

दूर भगे मधुमेह हा, दवई येहर खास।।


दो फोरी लहसुन भला, जेहर खावय रोज।

बी पी हा तन ले भगे, सादा लेवय भोज।।


खाके भोजन बाद मा, गुड़ के डल्ली खाय।

पाचन बर हे काम के, कभू डकार न आय।।


कैंसर रोधी प्याज हे, पोषक तत्व समाय।

भरे फाइबर खूब हे, लू ले तको बचाय।।


हल्दी गुण के खान हे, हवै फायदेमंद।

बूटी येला जान लव, एंटी कैंसर कंद।।


शक्कर जादा खाय ले,बीमारी घर आय।

जमे लिवर मा फेट हा, लेवल शुगर बढ़ाय।।


शहद मिला के दूध पी, होबे तहूँ निरोग।

बढ़ही ताकत अउ उमर, जीवन मा सुखभोग।।


मैदा सेहत बर इहाँ, सिरतोन खतरनाक।

गैस कब्ज के रोग हा, तन ला धरे लपाक।।


कमी नमक के होय ले, बढ़थे कोलेस्ट्रॉल।

जादा खाबे ते कहूँ, बी पी तन मा पाल।।


हरियर -हरियर दूब ला, महाऔषधी मान।

लिवर कब्ज उपचार मा, करथे संत सुजान।।


पीस दालचीनी बने, आधा चम्मच खाव।

शहद मिला सेवन करव, खाँसी दस्त भगाव।।


सौंफ हींग के फायदा, कतका हावय जान।

येकर सेवन ले घलो, वजन होय कम मान।।


मालिश सरसों तेल ले, जोड़ दरद आराम।

खुजली फुंसी के घलो, करथे काम तमाम।।


रूसी मुड़ मा होय जब, नरियर तेल लगाव।

कील मुहांसा हा भगे, त्वचा घलो उजराव।।


बेसन नींबू अउ शहद, पानी संग मिलाव।

सुग्घर पाहू रूप ला, मुख मा लेप लगाव।।

विजेन्द्र कुमार वर्मा 

नगरगाँव (धरसीवाँ)

Wednesday, September 18, 2024

त्रिभंगी छंद स्तुति-हर-हर महादेव

 त्रिभंगी छंद

स्तुति-हर-हर महादेव 


हे महादेव शिव,शंकर भोले,घट-घट वासी,देव तहीं।

सुशरण अविनाशी,नीलकंठ तँय,देव दनुज के,नेंव तहीं। 

हे मन बलिहारी,महाकाल तँय,सबके दुख के,काट तहीं। 

वय गुणग्राही अणु,आदि अनंता,भूप उमापति,भाट तहीं।। 


हे तांडव रनता,मुक्तिमाल प्रभु,अंग लपेटे,खाल पटा। 

विश्वेश्वर गिरिवर,डमरू धारी,तोर मूड़ भर,जाल जटा।

हे देवेश्वर प्रभु,जय हो जय हो,अजर-अटल तँय,कल्प महा। 

औघड़ अवदूता,सर्वेश्वर तँय,तोर कृपा ले,दुष्ट ढहा। 


हे धुनी रमइया,ज्ञान गम्य निधि,चन्द्र भाल मा,गजब फभे। 

मिलथे वरदानी,करंताल के,हर-हर के कर,जाप तभे। 

हे भुजंग भूषण,हिरण्यरेता,हवि गिरिश्वर,महाबला। 

अज सोम सदाशिव,तोर कृपा ले,कतको संकट,जाय टला।। 


हे व्योमकेश मृड,खण्डपरशु हवि,त्रयीमूर्ति प्रभु,नाथ तहीं। 

शाश्वत सात्विक तँय,पशुपति देवा,देथस सब ला,साथ तहीं। 

हे अनंत तारक,परमेश्वर भव,मृत्युंजय के,जाप तहीं। 

जग शंभु जगत गुरु,हे शशि शेखर,दुष्टन मन बर,श्राप तहीं।। 


हे शर्व दिगंबर,महासेन तँय,दया-मया के,छाँव तहीं। 

कवची मृगपाणी,ललाटाक्ष अउ,पाशविमोचन,नाँव तहीं। 

हे त्रिलोकेश तँय,भक्तवत्सला,उग्र शिवा प्रिय,रूप धरे। 

सुरसूदन गृहपति,सहस्रपाद तँय,अंतस के दुख,ताप हरे।। 


हे वीरभद्र प्रभु,सुभग अनीश्वर,कष्ट भक्त के,खुदे सहे

जे दक्षाध्वरहर, सहस्रसाक्ष हरि,परमात्मा के,नाम कहे। 

हे भीम कृपा निधि,दक्ष महेश्वर,शेषनाग गर,धार करे। 

गिरिप्रिय गिरिधन्वा,पुराराति नित,जीव जगत के,ध्यान धरे।।


हे विरूपाक्ष सम,हे कामारी,सबके सुनथस,इहाँ व्यथा। 

तँय नाथ अंबिका,स्वामी बनके,सुघर सुनाये,राम कथा। 

हे गंगाधर गिरि,गोचराय पटु,भूत प्रेत सब,तोर बला। 

भोले खटवांगी,जग के हितवा,बड़ निरमोही,आय भला।। 


हे श्मशान वासी,तँय समदर्शी,साथ शक्ति हे,पारबती। 

तँय पुष्कर लोचन,गौरीभर्ता,ईश पिनाकी,मदन मती। 

हे विमल निरंजन,हे दुख भंजन,सबके पालन,हार हरौ। 

हे विश्वरूप रवि,विषवाहन धव,अचल विरोचन,सार हरौ।। 


हे नन्दीश्वर शुचि,सुखी सोमरत,गति ज्योतिर्मय,हाथ तहीं। 

जय सुरेश भूशय,एक बंधु ध्वनि,महाकोश ध्वनि,नाथ तहीं। 

हे महेश भूपति,भूतपाल विभु,महाचाप खग,शान्त तहीं। 

वरगुण सहयोगी,नित्य सुलोचन,महाकोप अउ,कान्त तहीं।। 

विजेंद्र कुमार वर्मा

नगरगाँव (धरसीवाँ)

छत्तीसगढ़ के छत्तीस ले जादा गारी मिलही ये रचना मा। *विधा -जयकारी छंद* *गारी*

 छत्तीसगढ़ के छत्तीस ले जादा गारी मिलही ये रचना मा।

*विधा -जयकारी छंद*

*गारी*

पउवा बोतल आवय रास।घर ले निकलय ले सन्यास।।

बइहा भुतहा कस भकवाय।मद मउँहा मा रहै सनाय।।


निच्चट सिधवा हे माँ बाप। पुत बनगे हे अउ अभिशाप।।

हरहा कस घूमे दिन रात। लागय नइ गा बानी बात।।


नकटा कुटहा सुटहा चोर। झाँकत रहिथे अँगना खोर।।

हवय बेशरम निचट अलाल।घर के कर दिस बारा हाल।।


झूठ-लबारी दिन भर मार। ननजतिया के संगत झार।।

छल परपंची येकर चाल। लंपट ले भकला बेहाल।।


खोरगिंजरा नाँव धराय। भड़वा कतका गारी खाय।।

लोभी लुच्चा तको कहाय। भइसा जइसे गा पगुराय।।


गड़ऊना के सत्यानाश।किरहा गर मा लेलय फाँश।।

महतारी के गारी मार। चुतिया के नइ जाय विकार।।


जकला बेर्रा मुँह ला फार। खाये बोजे बर तैयार।।

जुटहा पर के पतरी चाट। कुकुर बने हे चारण भाट।।


दुब्बर बर दू हवय असाढ़। जीव रखे बर पींयत माढ़।।

सुसवा अनसुरहा चंडाल।काय फरक हे पड़े अकाल।।


महतारी के मरना ताय। लाज शरम पुत बेचे खाय।।

अड़हा अड़हिन खुदे कहाय। गदहा ला तो रिहिस पढ़ाय।।


बबा कहै गा हरामखोर।अरे भोकवा साले चोर।।

धरे मंदहा मन के संग।मरहा के रंगत मा रंग।।


हिजड़ा तँय हर चाल सुधार।जकला बन झन समे गुजार।।

मानुष तन के महिमा जान।लबरा कर सबके सम्मान।।


हवस करमछड़हा बइमान।जग जाहिर हे तँय अब जान।।

उल्लू कस गा जागे रात।लतखोर रोज खाथस लात।।


धुर्त रोगहा कर कुछ काज। लगे थोरको नइ गा लाज।।

छोड़ दोगला मन के साथ। काम-बुता मा दे अब हाथ।।

विजेन्द्र कुमार वर्मा 

नगरगाँव (धरसीवाँ)

जय श्री गणेश -जयकारी

 जय श्री गणेश -जयकारी 

हे गणनायक हे गणराज।मोर बना दव बिगड़े काज।।

हाथ जोर के करँव गुहार। भवसागर ले तहीं उबार।।


मंगलकारी पालनहार।तोरे जय हो जय-जय कार।।

जेन शरण मा आवय तोर।उँकर भाग हा होय अँजोर।।


ज्ञान बुद्धि बल जन के देव।तोरे ले जिंनगी के नेंव।।

हरहू मोरो मन के क्लेश।शिव गौरी के पुत्र गणेश।।


प्रथम पुज्य बड़का तँय देव।मोरो अरजी ला सुन लेव।।

अइसे मोला दव वरदान। दुनिया मा बाढ़य गा शान।।


सुखी रहय सब घर परिवार।इही अरज गा हवय हमार।।

भक्ति भाव ले करँव पुकार।कभू फसँव झन मँय मझधार।।

विजेन्द्र कुमार वर्मा 

नगरगाँव (धरसीवाँ)

फूल के नाम -जयकारी छंद

 फूल के नाम -जयकारी छंद 

चंपा गुड़हल सदाबहार।गेंदा के बनथे गा हार।।

नर्गिस नारंगी मन भाय।लिली माधवी बड़ मुसकाय।।


अगस्त्य अर्जुन फूल गुलाब।नीलकमल खिलथे तालाब।।

कामलता बनफूल कनेर। सूर्यमुखी हा आँख तरेर।।


राई मुनिया हरसिंगार।सुघर कामिनी मन मतवार।।

रजनी गंधा अउ कचनार।देवकली के रूप निहार।।


फूल सावनी मुच-मुच हाँस।तारक बचनाग अमलतास।।

रक्त केतकी जूही फूल। सत्यानाशी शूल अकूल।।


ब्रम्ह कमल अउ बूगनबेल।माथ चमेली के मल तेल।।

असोनिया अउ सफेद आक। चन्द्र मोगरा शोबी ढाक।।


नील गुलैंची मुसली फूल।खिल-खिल हाँसत हावय झूल।।

छुईमुई हर लाज लजाय।मूंग मालती मया जगाय।।


हे गुलमोहर के बड़ नाम।फूल चाँदनी नोहय आम।।

गुलेतुरा लेवेंडर कोन।कुकरोधा केसर हे सोन।।


चील आँकुरी द्रोप सिरोय।झुमका मौली मा मन खोय।।

अपराजिता बसंती कुंद।मून महकनी अउ मुचकुंद।।


गुलखैरा होथे गा खास।फूल केवड़ा बाँधय आस।।

डहेलिया बागों मा शान।कौआ कानी ला पहचान।।


सेवंती हे रंग बिरंग।महिमा मन मा भरे उमंग।।

सीता अशोक मुर्गा लाल।जुनबेरी ला देख निहार।।


आर्किड अमला कुकु ब्लूस्टार।सुघर अबोली के परिवार।।

फूल धतूरा शिव ला भाय।सुघर रातरानी ममहाय।।


ऐस बकाइन घंटी फूल।बजय नहीं झन देवव तूल।।

तितली कोरल क्रोकस कान।सिला केरिया खसखस जान।।


मंकी फ्लावर गार्डन गेट।बर- बिहाव मा होथे भेंट।।

गुब्बारा बाटल ब्रस जान।नाव तको अइसन हे मान।।

विजेन्द्र कुमार वर्मा 

नगरगाँव (धरसीवाँ)

Saturday, July 27, 2024

गुरुपूर्णिमा विशेष छंदबद्ध कविता


 गुरुपूर्णिमा विशेष छंदबद्ध कविता


[7/21, 7:15 AM] सूर्यकांत गुप्ता सर: 


पा के गुरुवर के कृपा, लिख  लेथौं   कुछ   छंद।

आँव   नहीं   विद्वान  जी,   बुद्धि   दुआरी   बंद।।

बुद्धि   दुआरी  बंद,  सूत्र   नइ   आवय  सुरता।

लिखथौं  लय आधार, सीख  अतके  के पुरता।।

नंगत   मिहनत  'कांत',  करे कर गुरुकुल जाके।

धन्य   छंद  परिवार,  निगम   गुरुवर   ला  पा के।।

सूर्यकान्त गुप्ता, जुनवानी भिलाई(छ.ग.)

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[7/21, 7:43 AM] आशा देशमुख: गुरु चालीसा


दोहा


करत हवँव गुरु वंदना, चरणन माथ नँवाय ।।

भाव भक्ति मन मा धरे , श्रद्धा फूल चढ़ाय।।


सदा रहय गुरु के कृपा,अतकी विनती मोर।

अंतस रहय अँजोर अउ,भागे अवगुण चोर।।


चौपाई 


गुरु ब्रह्मा अउ विष्णु महेशा। गुरु हे पहिली पूर्ण अशेषा।।

बरन बरन हे गुरु के वंदन।आखर आखर बनथे चंदन।।


 गुरु ला जानव सुरुज समाना।  गुरु आवय जी ज्ञान खजाना।।

गुरु जइसे नइहे उपकारी।गुरु के महिमा सब ले भारी।।



गुरु सउँहत भगवान कहाये। गुण अवगुण के भेद बताये।।

सात समुंदर बनही स्याही।गुरु गुण बर कमती पड़ जाही।।


गुरु के बल ला ईश्वर  जाने। तीन लोक  महिमा पहिचाने।।

गुरुवर सुरुज तमस हर लेथे। उजियारा जग मा भर देथे।।


जब जब छायअमावस कारी। गुरु पूनम  लावय उजियारी।।

गुरु पूनम के अबड़ बधाई।माथ नँवा लव बहिनी भाई।।



शिष्य विवेकानंद कहाये।परमहंस के मान बढ़ाये।।

द्रोण शिष्य हें पांडव कौरव ।अर्जुन बनगे गुरु के गौरव।।


त्याग तपस्या मिहनत पूजा।गुरु ले बढ़के नइहे दूजा।।

वेद ग्रंथ हे गुरु के बानी।पंडित मुल्ला ग्रंथी ज्ञानी।।


ज्ञान खजाना जेन लुटाए।जतका बाँटय बाढ़त जाए।।

गुरु के वचन परम हितकारी।मिट जाथे मन के बीमारी।।


जेखर बल मा हे इंद्रासन।बलि प्रहलाद करे हें शासन।।

ये जग गुरु बिन ज्ञान न पाये।गुरु गाथा हर युग हे गाये।।


सत्य पुरुष गुरु घासी बाबा। गुरु हे काशी गुरु हे काबा।।

 देवै ताल कबीरा साखी।

 उड़ जावय  मन भ्रम के पाखी।।


गुरु के जेन कृपा ला पाथे। पथरा तक पारस बन जाथे।।

माटी हा बन जावय गगरी। बूँद घलो हा लहुटय सगरी।।


महतारी पहली गुरु होथे । लइका ला संस्कार सिखोथे।।

देवय जे अँचरा के छइयाँ।दूसर हावय धरती मइयाँ।।



जाति धरम से ऊपर हावय।डूबत ला गुरु पार लगावय।।

आदि अनादिक अगम अनन्ता।जाप करयँ ऋषि मुनि अउ संता।।


गुरु के महिमा कतिक बखानौं।    ज्योति रूप के काया जानौं।।

बम्हरी तक बन जाथे चंदन। घेरी बेरी पउँरी वंदन।।


हाड़ माँस माटी के लोंदी।बानी पाके बोले कोंदी।।

पथरा के बदले हे सूरत। गढ़थे छिनी हथौड़ी  मूरत।।


भुइयाँ पानी पवन अकाशा।कण कण में विज्ञान प्रकाशा।।

समय घलो बड़ देथे शिक्षा।रतन मुकुट तक माँगे भिक्षा।।



अमर हवैं रैदास कबीरा। निर्गुण सगुण  बसावय मीरा।।

सातों सुर मन कंठ बिराजे। तानसेन के सुर धुन बाजे।।



कण कण मा गुरु तत्व समाये।सबो जिनिस कुछु बात सिखाये।।

गोठ करत हे सूपा चन्नी।कचरा ला छाने हे छन्नी।।



गुरु के दर हा सच्चा दर हे। मुड़ी कटाये नाम अमर हे।।

एकलव्य के दान अँगूठा। अइसन हे गुरु भक्ति अनूठा।।


श्रद्धा से गुरु पूजा करलव। ज्ञान बुद्धि से झोली भरलव।

जे निश्छल गुरु शरण म जावै।।अष्ट सिद्धि नवनिधि जस पावै।।



गुरु चालीसा जे पढ़े,ओखर जागे भाग।

दुख दारिद अज्ञानता ,ले लेथे बैराग।।



आशा देशमुख

एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा

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[7/


 छंद के छ परिवार के जम्मो गुरु अउ साधक मन ला गुरु पुर्णिमा के शुभ अवसर मा हार्दिक शुभकामना- 


गुरु-


गुरू अँधियार मिटाथय देथय ज्ञान करे मन मा उजियार।

गुरू बल बुद्धि विवेक भरे नहकाथय ये भवसागर पार।

गुरू गुण गाथँय देव घलोक गुरू घर सींखँय जीवन सार।

गुरू बिधुना जग पालनहार नवावँव माँथ करे उपकार।।


सवैया :मुक्ताहरा

बलराम चंद्राकर भिलाई

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[7/21, 8:35 AM] अमृतदास साहू 12: *अमृत के दोहे*

अरझे माया मोह मा,जिनगी के सब तार।

गुरू तोर आशीष बिन,फँसे नाव मझधार।१।


जनम मरण के पार ला,कोनो हा नइ पाय।

जिनगी के उद्धार बर, रद्दा गुरू बताय।२।


प्रथम गुरु माँ-बाप हे,दूसर शिक्षक होय।

शिक्षा अउ संस्कार के,सदा बीज ये बोय।३।


मनखे जनम अमोल हे,बिरथा ये झन जाय।

गुरू तोर उपकार ले, मनुज मुक्ति ला पाय।४।


गुरू समर्पण भाव ले ,देवय हमला ज्ञान।

ऊँखर जम्मो सीख हा,लागय जस वरदान।५।


गुरू ज्ञान परताप ले,अइसे होय अँजोर ।

अँधियारी ला चीर के,जइसे निकलय भोर।६।


अहंकार ला त्याग के,कर सबके उपकार।

बात गुरु के मान ले,हो जाही उद्धार।७।

    रचनाकार 

अमृत दास साहू 

ग्राम+ पोस्ट - कलकसा, डोंगरगढ़

जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)

मो.नं-9399725588

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*दोहा-गुरु महीमा*


जने   हवय   दाई   ददा,  गुरुवर   देहे   ज्ञान।

नमन करँव कर जोर के, गुरुजन आप महान।।


हर आखर के ज्ञान गुरु, दोहा घलो समास।

अलंकार रस छंद मा, गुरुवर सब मा वास।।


कतका करँव बखान मँय, गुरु महिमन के खान।

हाथ  रखय जो  शीश मा, बाढ़य अड़बड़ ज्ञान।।


सबले  उप्पर  मान दय,  गुरु  ला  ये  संसार।

जेखर उज्जर ज्ञान ले, मिटय सबो अँधियार।।


गुरुवर सरलग ज्ञान के, बिजहा ला जब बोय।

फरय फुलय चतुरा  बनय, अढ़हा ज्ञानी होय।।


✍️✍️नागेश कश्यप.

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[7/21, 9:18 AM] पात्रे जी: 


नवाँवत माथ हवौं गुरु जी पग ज्ञान सुधा करहू बरसात।

बने पतवार दिखा गुरु राह करौं शुभ काम सदा शुरुआत।।

बिना गुरु के जिनगी बिरथा सुख छाँव दिनोंदिन हे दुरिहात।

गजानन मातु पिता गुरु ले बड़का भगवान नहीं सुन बात।।


::::::::::::::::::::मुक्ताहरा सवैया::::::::::::::::

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/07/2024

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[7/21, 9:21 AM] बोधन जी: मत्तगयंद सवैया - गुरुदेव


सादर पाँव पखारत हावँव डारत नैनन के निज पानी।

हे गुरुदेव दया बरसावव देवव मीठ मया शुभ बानी।।

नेक सदा इंसान बनौं मँय छोड़ प्रपंच सबो अभिमानी।

ज्ञान पियास रहै मन मा गुरु सीखँव छंद बनौं नर ज्ञानी।।


रचना:-

बोधन राम निषादराज

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[7/21, 9:29 AM] Sumitra कामड़िया 15: 

गुरुवर के वंदन करव, हे गुरु गुन के खान। 

अग्यानी ला ज्ञान दे, गुरुवर हवे  महान।। 


मिलथे गुरुवर भाग ले, खोजत फिरथे लोग। 

सँउहत मिलगे गुरु दरस, बने रहिस सँजोग।। 


भीतर मधुरस मीठ हे, ऊपर हवय कठोर। 

कोवँर मन भीतर रखय, अउ देवय बड़ जोर।। 


देवय दीक्षा ज्ञान के, गरब गुमान ल छोड़। 

रद्दा सहीं दिखाय के,  टूटे मन दे जोड़।। 


ज्ञान उजाला बाँट के, हृदय रखय पट खोल। 

भीतर उपजे आस ला, लेवत रहय टटोल।। 


कण-कण गुरु के बास हे, गुरुवर हे भगवान। 

पीरा हर हीरा करय, गुरुवर हे धनवान।। 


मात पिता हे गुरु हमर, येला नवाँव शीश। 

इँकर चरण मा हे सदा, अबड़ अकन आशीष।। 


सुमित्रा कामड़िया शिशिर "

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[7/21, 9:37 AM] +91 99265 58239: "" कुन्डलियॉं""


आओ सब वंदन करें , लेकर गुरु का नाम ।

गुरु जागृत ईश्वर यही , कर लो सभी प्रणाम ।।

कर लो सभी प्रणाम , चरण में सिर को रखकर ।

है यह पवित्र धाम , याद सब करना जपकर ।।

गुरु है गुण की खान , भाव से महिमा गाओ ।

सभी करें सम्मान, जगत में मिलकर आओ ।


संजय देवांगन सिमगा रायपुर छत्तीसगढ़

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[7/21, 10:13 AM] केंवरायदु2: चौपइ छंद

15-15


बिन गुरु मिलै नहीं जी ज्ञान ।

मन मा तँय हा अतका मान ।।

ब्रम्हा विष्णु उही ला जान।

उही  हरय हमरो  भगवान ।।


गुरु अउ गोविन्द सँघरा आय ।

काखर मँयहा लागवँ पाँय ।।

गुरु हा हरि ले आज मिलाय।

गुरु चरनन मा शीश नवाय ।।


चरन धरें हँव जब ले आय ।

दोहा चौपइ तब ले पाय ।।

गुरु के महिमा काय बताँव ।

संझा बिहना  लागँव पाँव ।।


गुरुवर ईमोरे छंद बताय ।

लिखथन हम हा खुशी मनाय।।

छन्न पकैया सरसी जान ।

नइ तो तँय रहिबे अज्ञान ।।


किसम किसम के छंद विधान ।

सिखबो भइया धरके ध्यान ।

गुरु चरनन मा मिलथे  झान 

आके अडहा  बनय सुजान ।।


ज्ञान मिले हे गीत सुनाँव ।

महिमा पार नहीं मँय पाँव ।।

सीखत रहिबो छंद विधान ।

मिलते रहिही गुरु ले ग्यान ।।


गुरुवर के रखबो जी  मान ।

तब होही हमरो कल्यान।।


केवरा यदु ॰मीरा "

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[7/21, 10:13 AM] अनुज छत्तीसगढ़ी 14: *अरविंद सवैया छंद*

*विषय-गुरुजी*


कतको पढ़लौ गुनलौ मन के, नइ पावव गा गुरु के बिन ज्ञान।

बिन स्वारथ के जिनगी गढ़थें, तब आज हवे गुरुजी भगवान।

बिन भेद करे गुरु देत रथें, सब ज्ञान बिशारद एक समान।

कतको अढ़हा अउ अप्पढ़ ला, गुरु देत बना गुनि संत सुजान।  


*अनुज छत्तीसगढ़िया*

*पाली जिला कोरबा*

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त्रिभंगी छंद


गुरु पइयाॅ लागव,माथ नवावॅव,

हाथ जोड़ परनाम करू।

सदा नाम लेवव,मन मा जपवव,

रोजे गुरु के, ध्यान धरू।

छंद ज्ञान पावव,महिमा गावव,

मोरे बर गुरु धाम शुरू।

गुरु नाम सुमरके, आस लगाके

करथवॅ मय हा ,काम शुरू।।


ॲधियार मिटा के,सुरुज बनके,मन मा गुरु तॅय,ज्ञान भरे।

गुरु हाथे धरके,भेद छोड़ के, 

गुरु वर शिक्षा,दान करे।।

गुरु देव छाँव मा,कमल पाँव मा ज्ञान भक्ति रसपान मिले।

गुरु दीक्षा पाके,मन हा चमके,ज्ञान ज्योति बन,फूल खिले।।


लिलेश्वर देवांगन

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[7/21, 1:32 PM] अश्वनी कोसरे 9: चौपाई छंद- अश्वनी कोसरे

गुरु पूर्णिमा 


गुरु महिमा जस अमृत धारा।पोहय तनमन ज्ञान सहारा।  

मन के दुर्गुण झार हँटावय। जिनगी जोनी सफल बनावय।।1


मातु  - पिता अउ गुरु के बानी।देवत रहिथें पीयुष पानी।

वंदन हे नित गुरु चरनन मा। हँसा दौड़ लगावय रन मा ।।2


गुरुगुढ़ ज्ञानी ध्यान लगावँय। गीता के सम ज्ञान लखावँय।

धर्म ज्ञान ले हे मर्यादा। वइसे ही गुरु करथें वादा।।3


निर्मल रहिथे गुरु के बानी। सदगुरु के सम चेला ज्ञानी। 

शरनागत हँव ध्यान लगावँव।गुरु पँउरी मा शीस झुकावँव।।4


गा ले मनुवा गुरु के महिमा।दूर करैं उन घपटे अणिमा।

जिनिगी भर तँय नाम सुमरले। जाके आसन दर्शन करले ।।5


अश्वनी कोसरे 

रहँगिया कवर्धा कबीरधाम

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[7/21, 4:05 PM] राजेश निषाद: ।।चौपई छंद।।

गुरु के कहना तैंहर मान, गुरु हा देथे सबला ज्ञान।

हवय दया के सागर जान,जग के हावय वो भगवान।।


अँधरा मन के आँखी आय,भटके ला वो राह बताय।

जउन शरण मा गुरु के जाय,वोहर कभू न धोखा खाय।।


गुरु सेवा मा लगा धियान, तब तो पाबे चोखा ज्ञान।

गुरु के महिमा भारी जान,देही तोला वो वरदान।।


गुरु के सेवा मा सब जाय, नइ तो छोटे बड़े कहाय।

सबला चोखा रहे बनाय,खोटा सिक्का तक चल जाय।।


मिले सहारा गुरु के तीर,रखले मनवा तैंहर धीर।

बदल जही तोरो तकदीर,हरथे गुरु हा सबके पीर।।


रचनाकार:- राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद रायपुर

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[7/21, 5:25 PM] मुकेश 16: मदिरा सवैया- गुरु महिमा


पाँव पखारँव तोर सदा मन के तँय मोर विकार हरे ।

जोत जलावँव ध्यान लगा गुरुजी तुरते भव पार करे ।।

माथ नवा गुरु के पद मा सत अंतस भीतर ज्ञान भरे ।

देव बरोबर हे गुरु हा भजले मनवा अँधियार टरे ।।



मुकेश उइके "मयारू"

ग्राम- चेपा, पाली, कोरबा(छ.ग.)

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[7/21, 7:11 PM] पात्रे जी: चौपाई छंद- *गुरु चालीसा*


दोहा- 

करत हवँव गुरु वंदना, हो करके मतिमंद।

गजानंद गुरु भावना, लिख चौपाई छंद।।


चौपाई- 

गुरु ही दीपक ज्ञान उजाला। गुरु ही मंदिर देव शिवाला।।

गुरु ही भक्ति भाव अउ पूजा। गुरु ले कोई बड़े न दूजा।।


तीन लोक गाये गुरु महिमा। गुरु ले ही हे शिक्षा गरिमा।।

गुरु ही इज्जत मान बढ़ाथे। सदा सफलता शिखर चढ़ाथे।।


चाक कुम्हार समान गढ़े मन। गुरु कहिलाथे पहिया जीवन।।

मूढ़ गूढ़ उद्धार करे हे। भवसागर ले पार करे हे।।


छाँव कृपा गुरु जे हा पाये। जिनगी वो हा सफल बनाये।।

धर्म कर्म गुरु मर्म बताथे। सदा सत्य के पाठ पढ़ाथे।।


गुरु ही असली देव सही हे। ब्रम्हा विष्णु महेश इही हे।।

रूप देव के कोन सरेखा, गुरु ही कर्म बनाथे लेखा।।


गुरु गुण सूर्य समान प्रखर हे। बसा रखव गुरु नाम अजर हे।।

गुरु जग मा पहचान दिलाथे। इही धरा मा स्वर्ग दिखाथे।।


गुरु के वचन न जाये खाली। जीवन बगिया के गुरु माली।।

फूल समान सुगन्धित करथे। ज्ञान सुधा रस मन मा भरथे।।


गुरु कबीर रैदास हुये हे। सच्चाई विश्वास दिये हे।।

गुरु नानक सत पंथ चलाये। सतगुरु घासीदास कहाये।।


गुरु ही मथुरा गुरु ही काशी। गुरु के ज्ञान हवै अविनाशी।।

रखव आत्म ला गुरु के दासी। बंधन छूटे लख चौरासी।।


गुरु ही प्रेम दया के सागर। गुरु ही ज्ञान भरे गुण गागर।।

गुरु ही पावन गंगा धारा। गुरु ही सब ला भव से तारा।।


गुरु वाणी रसपान करो सब। जीवन मा सुख शांति भरो सब।।

चरण कमल रज कर लौ सेवा। कहिथे ऋषि मुनि गुरु हे देवा।।


गुरु ही सत्य सनातन शोधक। अहंकार अज्ञान निरोधक।।

सत्य पुंज गुरु सूरज जइसे। गुरु उपकार चुकाबो कइसे।।


गुरु के कृपा स्वर्ग के सीढ़ी। तर जाथे पीढ़ी दर पीढ़ी।।

गुरु गुण गाथे कीट पतंगा। गुरुवर करथे तन मन चंगा।।


माता-पिता प्रथम गुरु मानौ। आदर गुरु के करना जानौ।।

गुरु ही सभ्य समाज बनाथे। नेक भलाई राह सुझाथे।।


कीचड़ मा गुरु फूल खिलाथे। सुखमय जिनगी सेज सजाथे।।

मर्यादा के सीख सिखाथे। गुरु अटूट रहि वचन निभाथे।।


गुरु ही जग के भाग्य विधाता। गुरु से कोई बड़े न दाता।।

गुरु शिक्षा संस्कार दिये हे। मानवता कल्याण किये हे।।


गुरु समाज के असली दर्पण। गुरु सेवा मा जीवन अर्पण।।

शिष्य सदा रहि गुरु बलिहारी। महकाये जीवन फुलवारी।।


वेद पुराण कहे गुरु ज्ञानी। रखव सुरक्षित कर्म निशानी।।

कर्म गढ़व गुरु ले पा शिक्षा। बदला मा देहू गुरु दीक्षा।।


सफल मनोरथ पूर्ण करे गुरु। जिनगी मा नित नेह भरे गुरु।।

जीव चराचर सुन लौ प्राणी। झइन भूलहू जी गुरु वाणी।।


लोहा ला करथे गुरु कुंदन, भरे विचार सदा ही कंचन।।

पेड़ बबूल बनाये चंदन। करे गजानन गुरु पग वंदन।।


दोहा- 

गुरुवर ज्ञान अथाह हे, कइसे करँव बखान।

शब्द स्याह भी कम पड़े, सुन लौ संत सुजान।।


---- *स्वरचित मौलिक अप्रकाशित*------

---✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/07/2024

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[7/21, 8:38 PM] +91 84358 44508: 

ब्रह्मा विष्णु- महेश हें,  गुरुवर जगत महान।

महतारी अउ बाप के,गनपति  करथें ध्यान।।


गुरुवर सत-सत वंदना,करथवँ बारंबार।

सनमति पावन ज्ञान के,कृपा मिलिस साकार


गुरुवर के आशीष पा,बंदन- चरन पखार।

मिट जाथे मन के भरम,मिल जाथे उजियार।।


भेदभाव ले दूर हे, गुरुवर अरुण बिहान।

 छंद ज्ञान दाता हमर, करत हवँय  उत्थान।।


*अमितारवि दुबे©®*

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[7/21, 9:04 PM] अशोक धीवर जल: दोहा छंद  - गुरु सब ले महान 


बिना गुरू संसार मा, कभू मिलय नइ ज्ञान।

मन के शंका छोड़ के, ब्रम्ह गुरू ला मान।।

शिक्षक गुरु मा भेद हे, अंतर समझ बिचार।

शिक्षा देवय एक हा, एक करे भवपार।।

कहां चले भगवान बर, गुरु ला अंतस जान।

शरणागत होके बने, देव उही ला मान।।

सुमिरन गुरु के कर बने, दूसर ला मत मान।

मन मा शंका झन करव, उही हरे भगवान।।

गुरू शरण मा जाय के, भक्ति करव सब पोठ।

ज्ञान मुक्ति देथे घलौ, सही बताथे गोठ।।

गुरू ज्ञान दाता हरे, सब ला राह दिखाय।

जिनगी मा ओकर बिना, कोनो पार न पाय।।


अशोक धीवर "जलक्षत्री"

ग्राम - तुलसी (तिल्दा- नेवरा) 

जिला- रायपुर (छत्तीसगढ़)

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Wednesday, May 1, 2024

मजदूर अउ बासी दिवस विशेष-छंदबद्ध सृजन

 मजदूर अउ बासी दिवस विशेष-छंदबद्ध सृजन


नारायण वर्मा बेमेतरा: *छंद कुंडलियाँ-बासी*


रथिया बाँचे भात ला,पानी संग मिलाय।

करके चानी गोंदली,माईपिल्ला खायँ।।

माईपिल्ला खायँ,नहा धो करै मुखारी।

होगे कहूँ अथान,मजा तब आथे भारी।।

पेट रहे दलगीर,ससन भर पीयव पसिया।

राखै देह निरोग, बिहनिया मँझनी रथिया।।01।।


खावौ बासी तान के,सुरपुट सैंया रोज।

ना चुटकी भर नून ला,साग पान झन खोज।।

साग पान झन खोज,आजकल बड़ महँगाई।

हे गरीब पकवान, मान तैं आय मिठाई।।

राँध एक घँव भात,मजा दू बेर उड़ावौ।

ईंधन घलो बचाव,तात अउ ठंडा खावौ।।02।।


बाढ़े भाव अनाज के,होय नहीं बरबाद।

अड़बड़ होथे पुष्टई,सेहत संग सुवाद।।

सेहत संग सुवाद,ताकथे दिन भर हड़िया।

खनिज तत्व भरपूर, देह ला राखे बढ़िया।।

गरमी नही जनाय,भागथे लू हर ठाढ़े।

काटै सबो बियाद, कब्ज हर जेखर बाढ़े।।03।।


छत्तीसगढ़ी शान हे,आय कलेवा जान।

राखै सदा जवान तन,बासी गुन के खान।।

बासी गुन के खान,खवैया खुश हो जाथे।

जानै जेन सुवाद,परोसा ले ले खाथे।।

बाढ़े आँखी जोत,खाय बासी संग कढ़ी।

रचे बसे मन प्राण, मयारू छत्तीसगढ़ी।।04।।


बासी खा पुरखा हमर,करिन सदा दिन काज।

परम्परा फैशन बने, लोगन मन बर आज।।

लोगन मन बर आज,लेत हें सेल्फी भारी।

छाये फोटूबाज,दिखावा हरै बिमारी।।

बात कोन पतियाय,केउ झन खाय तियासी।

*चंदन* बिना बताय,खात हे कतको बासी।।05।।

नारायण प्रसाद वर्मा *चंदन*

ढ़ाबा-भिंभौरी, बेमेतरा (छ.ग.)

7354958844

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ज्ञानू  मजदूर


भूख प्यास मजदूर, करथे बूता रातदिन। 

जीये बर मजबूर, तंगहाल मा देखलौ।।


स्वारथ मा हे लोग, कोन समझथे दुख इँखर।

लगे हवै का रोग, चूसत दुनिया खून हे।।


सपना लगे अँजोर, अँधियारी घपटे हवै।

नवा सुरुज सुख भोर, कब उगही जिनगी इँखर ।।


सिर मा नइये छाँव, हाल बुरा मजदूर के। 

उँखरा हावय पाँव, कपड़ा तन मा हे कहाँ।।


काम इँमन चुपचाप, भूख प्यास रहिथे करत।

जिनगी ले संताप, कइसे होही दूर अब।।


ज्ञानु

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 *त्रिभंगी छंद - मजदूर*


हो हलाकान ये,दे परान ये,अपने दम मा,काम करै।

भोजन पाये बर,सुख लाये बर,जिनगी दुख के,नाम करै।।

दुनिया सिरजइया,इही कमइया,गाँव शहर मा,शोर हवै।

करथे मजदूरी,हो मजबूरी,महिनत इँखरे,जोर हवै।।


रचना-

बोधन राम निषादराज

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ज्ञानू : बासी


का गुण गावँव बासी के

टॉनिक हमर थकासी के


दूर करै ताप बदन के

दुश्मन आय उँघासी के


बीपी सुगर करै कंट्रोल

का मालिक का दासी के


हम गरीब के भोजन ए

रोये के नइ हाँसी के


दर्शन एमा हो जाथे

मथुरा, काबा, काशी के


चटनी बासी खाऔ रोज

नाम जपौ अविनाशी के


मान हमर पहिचान हमर

छत्तीसगढ़ के वासी के


ज्ञानु

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 राज निषाद: *छप्पय छंद-बासी*


खावौ बासी रोज, दूर होही बिमारी।

पोषक हे प्रोटीन, देत हे ताकत भारी।।

बोरे बासी आज, पेट भर तँय हा खा ले।

आमा चटनी संग, स्वाद जी मन भर पा ले।।

नून बने जी डार के, दही संग मा खाव गा।

लान गोंदली चान के, सुग्घर मजा उड़ाव गा।।


*राज*

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विजेन्द्र: मजदूर दिवस पर दुर्मिल सवैया। 


मजदूर


सरदी गरमी बरसात रहै,सबके अउ काम उही करथे। 

नद नाल सरोवर बाँध बना,सबके दुख पीर उही हरथे। 

मजदूर कहावय गा जग मा,श्रम के बलिदान करे मरथे। 

निरमान करे नव भारत के,तब पेट घलो उकरे जरथे।


कतका बलवान हवै भइया,सबके अउ बोझ उठाय चले। 

अबड़े उपकार करे उन हा,जिनगी अँधियार बिताय चले। 

सुविधा सुख ले अउ दूर रहै,पर के सुख ला सिरजाय चले। 

मरहा जरहा कचरू बुधिया,जकला अउ नाँव धराय चले। 


खुद के दुख हा खुद ला दिखथे,पर के दुख ला अब कोन सुने। 

पहिरे फटहा चिथरा कुरता, इकरे कुरता अब कोन तुने।

अउ घाव दिखे कतका गहरा,पर पीर कहाँ अब कोन गुने। 

दुख सौंप इहाँ तँय हा प्रभु ला,तकलीफ उहीच निमार फुने। 

विजेंद्र कुमार वर्मा 

नगरगाँव (धरसीवाँ)

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बासी दिवस अउ मजदूर दिवस के सादर बधाई


बासी खावै रोज के, दँदर दँदर ते रोय।

फोटू खिंचवा एक दिन, खरतरिहा हे होय।।


गीत--बासी बासी बासी के हल्ला


साग दार कमती पड़ जाथे, पुरे न राशन राशि।

तब खाथौं मैं चटनी सँग मा, नून डार के बासी।।


काम बूता बर होत बिहनया, पड़थे जल्दी जाना।

जुड़े जुड़ मा काम सिधोथँव, खाके बासी खाना।

बिन गुण जाने पेट भरे बर, खाथँव बारा मासी।

साग दार कमती पड़ जाथे, पुरे न राशन राशि।

तब खाथौं मैं चटनी सँग मा, नून डार के बासी।।


बड़ही कहिके बँचे भात ला, बोर देथौं मैं रतिहा।

सीथा खाथौं चारेच कौंरा, पेट भर पीथौं पसिया।

पर के हाड़ी के गंध सुंघ के, लगथे गजब ललासी।

साग दार कमती पड़ जाथे, पुरे न राशन राशि।

तब खाथौं मैं चटनी सँग मा, नून डार के बासी।।


छोट कुड़ेड़ा के बासी तक, घर भर ला पुर जाथे।

सीथा अउ पसिया हा मिलके, भूख पियास दुरिहाथे।

महल अटारी बाँध बाँधथँव, करथौं बाँवत बियासी।

साग दार कमती पड़ जाथे, पुरे न राशन राशि।

तब खाथौं मैं चटनी सँग मा, नून डार के बासी।।


बासी खावत उमर गुजरगे, होगे जर्जर काया।

नाँगर पुरतिन जाँगर मिलथे, राम मिले ना माया।

बासी खवइया बासी होगे, हो गे जग मा हाँसी।

साग दार कमती पड़ जाथे, पुरे न राशन राशि।

तब खाथौं मैं चटनी सँग मा, नून डार के बासी।।


मोर दरद देखिस नइ कोनो, देख डरिस बासी ला।

महल भीतरी बासी खाइस, बूता जोंग दासी ला।

भूख बैरी ला बासी चढ़ाथौं, मान के मथुरा काँसी।

साग दार कमती पड़ जाथे, पुरे न राशन राशि।

तब खाथौं मैं चटनी सँग मा, नून डार के बासी।।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


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रोला छंद


मजबूर मैं मजदूर


करहूँ का धन जोड़, मोर तो धन जाँगर ए।

रापा गैंती संग, मोर साथी नाँगर ए।

मोर गढ़े मीनार, देख लौ अमरे बादर।

मोर धरे ए नेंव, पूछ लौ जाके घर घर।


भुँइया ला मैं कोड़, ओगराथौं नित पानी।

जाँगर रोजे पेर, धरा ला करथौं धानी।

बाँधे हवौं समुंद, कुँआ नदिया अउ नाला।

बूता ले दिन रात, हाथ मा उबके छाला।


घाम जाड़ आषाढ़, कभू नइ सुरतावौं मैं।

करथौं अड़बड़ काम, तभो फल नइ पावौं मैं।

हावय तन मा जान, छोड़ दौं महिनत कइसे।

धरम करम ए काम, पूजथौं देवी जइसे।


चिरहा ओन्हा ओढ़, ढाँकथौं करिया तन ला।

कभू जागही भाग, मनावत रहिथौं मन ला।

रिहिस कटोरा हाथ, देख वोमा सोना हे।

भूख मरौं दिन रात, भाग मोरे रोना हे।


आँखी सागर मोर, पछीना यमुना गंगा।

झरथे झरझर रोज, तभे रहिथौं मैं चंगा।

मोर पार परिवार, तिरिथ जइसन सुख देथे।

फेर जमाना कार, अबड़ मोला दुख देथे।


थोर थोर मा रोष, करैं मालिक मुंसी मन।

काटत रहिथौं रोज, दरद दुख डर मा जीवन।

मिहीं बढ़ाथौं भीड़, मिहीं चपकाथौं पग मा।

अपने घर ला बार, उजाला करथौं जग मा।


पाले बर परिवार, नाँचथौं बने बेंदरा।

मोला दे अलगाय, बदन के फटे चेंदरा।

कहौं मनुष ला काय, हवा पानी नइ छोड़े।

ताप बाढ़ भूकंप, हौसला निसदिन तोड़े।।


सच मा हौं मजबूर, रोज महिनत कर करके।

बिगड़े हे तकदीर, ठिकाना नइहे घर के।

थोरिक सुख आ जाय, विधाता मोरो आँगन।

महूँ पेट भर खाँव, रहौं झन सबदिन लाँघन।।


मोर मिटाथे भूख, रात के बोरे बासी।

करत रथौं नित काम, जाँव नइ मथुरा कासी।

देखावा ले दूर, बिताथौं जिनगी सादा।

चीज चाहथौं थोर,  मेहनत करथौं जादा।


आँधी कहुँती आय, उड़ावै घर हा मोरे।

छीने सुख अउ चैन, बढ़े डर जर हा मोरे।

बइठ कभू नइ खाँव, काम मैं मांगौं सबदिन।

करके बूता काम, घलो काँटौं दिन गिनगिन।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

9981441795

मजदूर दिवस अमर रहे,,,,


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गीतिका छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


हे गजब मजबूर ये,मजदूर मन हर आज रे।

पेट बर दाना नहीं,गिरगे मुड़ी मा गाज रे।।

रोज रहि रहि के जले,पर के लगाये आग मा।

देख लौ इतिहास इंखर,सुख कहाँ हे भाग मा।।


खोद के पाताल ला,पानी निकालिस जौन हा।

प्यास मा छाती ठठावत,आज तड़पे तौन हा।

चार आना पाय बर, जाँगर खपावय रोज के।

सुख अपन बर ला सकिस नइ,आज तक वो खोज के।


खुद बढ़े कइसे भला,अउ का बढ़े परिवार हा।

सुख बहा ले जाय छिन मा,दुःख के बौछार हा।

नेंव मा पथरा दबे,तेखर कहाँ होथे जिकर।

सब मगन अपनेच मा हे,का करे कोनो फिकर।


नइ चले ये जग सहीं,महिनत बिना मजदूर के।

जाड़ बरसा हा डराये, घाम देखे घूर के।

हाथ फोड़ा चाम चेम्मर,पीठ उबके लोर हे।

आज तो मजदूर के,बूता रहत बस शोर हे।।


ताज के मीनार के,मंदिर महल घर बाँध के।

जे बनैया तौन हा,कुछु खा सके नइ राँध के।

भाग फुटहा हे तभो,भागे कभू नइ काम ले।

भाग परके हे बने,मजदूर मनके नाम ले।।


दू बिता के पेट बर,दिन भर पछीना गारथे।

काम करथे रात दिन,तभ्भो कहाँ वो हारथे।

जान के बाजी लगा के,पालथे परिवार ला।

पर ठिहा उजियार करथे,छोड़ के घर द्वार ला।


आस आफत मा जरे,रेती असन सुख धन झरे।

साँस रहिथे धन बने बस,तन तिजोरी मा भरे।

काठ कस होगे हवै अब,देंह हाड़ा माँस के।

जर जखम ला धाँस के,जिनगी जिये नित हाँस के।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


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आल्हा छन्द - जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया


गरमी घरी मजदूर किसान


सिर मा ललहूँ पागा बाँधे,करे  काम मजदूर किसान।

हाथ मले बैसाख जेठ हा,कोन रतन के ओखर जान।


जरे घाम आगी कस तबले,करे काम नइ माने हार।

भले  पछीना  तरतर चूँहय,तन ले बनके गंगा धार।


करिया काया कठवा कस हे,खपे खूब जी कहाँ खियाय।

धन  धन  हे  वो महतारी ला,जेन  कमइया  पूत  बियाय।


धूका  गर्रा  डर  के  भागे , का  आगी  पानी  का  घाम।

जब्बर छाती रहै जोश मा,कवच करण कस हावै चाम।


का मँझनी का बिहना रतिहा,एके सुर मा बाजय काम।

नेंव   तरी   के  पथरा  जइसे, माँगे  मान  न माँगे नाम।


धरे  कुदारी  रापा  गैतीं, चले  काम  बर  सीना तान।

गढ़े महल पुल नँदिया नरवा,खेती कर उपजाये धान।


हाथ  परे  हे  फोरा  भारी,तन  मा  उबके हावय लोर।

जाँगर कभू खियाय नही जी,मारे कोनो कतको जोर।


देव  दनुज  जेखर  ले  हारे,हारे  धरती  अउ  आकास।

कमर कँसे हे करम करे बर,महिनत हावै ओखर आस।


उड़े बँरोड़ा जरे भोंभरा,भागे तब मनखे सुखियार।

तौन  बेर  मा  छाती  ताने,करे काम बूता बनिहार।


माटी  महतारी  के खातिर,खड़े पूत मजदूर किसान।

महल अटारी दुनिया दारी,सबे चीज मा फूँकय जान।


मरे रूख राई अइलाके,मरे घाम मा कतको जान।

तभो  करे माटी के सेवा,माटी  ला  महतारी मान।


जगत चले जाँगर ले जेखर,जले सेठ अउ साहूकार।

बनके  बइरी  चले पैतरा,मानिस नहीं तभो वो हार।


धरती मा जीवन जबतक हे,तबतक चलही ओखर नाँव।

अइसन  कमियाँ  बेटा  मनके, परे  खैरझिटिया हा पाँव।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

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जयकारी छन्द- बासी


जरे घाम मा चटचट चाम, लगे थकासी रूकय काम।


खेवन खेवन गला सुखाय, बदन पछीना मा थर्राय।


चले हवा जब ताते तात, भाय नही मन ला जब भात।


चक्कर घेरी बेरी आय, तन के ताप घलो बढ़ जाय।


घाम झाँझ मा पेट पिराय, चैन चिटिक तन मन नइ पाय।


तब खा बासी दुनो जुवार, खाके दुरिहा जर बोखार।


बासी खाके बन जा वीर, खेत जोत अउ लकड़ी चीर।


हकन हकन के खंती कोड़, धार नदी नरवा के मोड़।


गार पछीना बिहना साँझ, सोन उगलही धरती बाँझ।


सड़क महल घर बाँध बना, ताकत तन के अपन जना।


खुद के अउ दुनिया के काम, अपन बाँह मा ले चल थाम।


करके बूता पाबे मान, बन जाबे भुइयाँ के शान।


सुनके बासी मूँदय कान, उहू खात हे लान अथान।


खावै बासी पेज गरीब, कहे तहू मन आय करीब।


खावत हें सब थारी चाँट, लइका लोग सबे सँग बाँट।


बासी कहिके हाँसे जौन, हाँस हाँस के खावै तौन।


बासी चटनी के गुण जान, खाय अमीर गरीब किसान।


पिज़्ज़ा बर्गर चउमिन छोड़, खावै सबझन माड़ी मोड़।


बदलत हे ये जुग हा फेर, लहुटत हे बासी के बेर।


बड़े लगे ना छोटे आज, बासी खाये नइहे लाज।


बासी बासी के हे शोर, खावै नून मही सब घोर।


भाजी चटनी आम अथान, कच्चा मिरी गोंदली चान।


बरी बिजौरी कड़ही साग, मिले संग मा जागे भाग।


बासी खाके पसिया ढोंक, जर कमजोरी के लू फोंक।


करे हकन के बूता काम, खा बासी मजदूर किसान।


गर्मी सर्दी अउ आसाढ़, एको दिन नइ होवै आड़।।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को,कोरबा(छग)

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शोभन छंद


चान चानी गोंदली के, नून संग अथान।


जुड़ हवै बासी झडक ले, भाग जाय थकान।


बड़ मिठाथे मन हिताथे, खाय तौन बताय।


झाँझ झोला नइ धरे गा, जर बुखार भगाय।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को,कोरबा(छग)


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दुर्मिल सवैया-मजदूर


मजदूर रथे मजबूर तभो दुख दर्द जिया के उभारय ना।

पर के अँगना उजियार करे खुद के घर दीपक बारय ना।

चटनी अउ नून म भूख मिटावय जाँगर के जर झारय ना।

सिधवा कमियाँ तनिया तनिया नित काज करे छिन हारय ना।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

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बासी(जयकारी छंद) 

सबो विटामिन हवय भराय। बासी सब ला गजब मिठाय।।

खाबे तब तन तको जुड़ाय। कतको बीमारी दुरियाय।। 


मही दही सन झोझो झोर। नून चिटिक गा देवव घोर।।

जरी अमारी के अउ साग।खाबे तब सँवरे गा भाग।। 


का मँझनी का बिहना रोज। बासी खावव रेंगव सोज।। 

कहाँ जनाथे कतको घाम।चमक जथे गा सुग्घर चाम।। 


बासी खाके सब मजदूर। काम बुता करथे भरपूर।। 

ठंडा रहिथे तभे शरीर। भगा जथे कतको गा पीर।। 


सेहत बर जानव वरदान। बासी दूर भगाय थकान।। 

गरमी झोला झक्कर घाम। इही लगाथे बने लगाम।। 

विजेंद्र कुमार वर्मा 

नगरगाँव (धरसीवाँ)

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बासी (मजदूर दिवस)


इॅंकर कमाई के परसादे, उनकर महल अटारी हे।

कहाॅं भाग मा घीव पराठा, बासी हा फरहारी हे।


बासी सुनके नाक सिकोड़े, वो चम्मच मा झड़कत हे।

बहिरुपिया के दिल हा कैसे, आज लफालफ धड़कत हे।

बोरे बासी मा कतको मन ,चमकावतहें ताज अपन।

एसी मा बैठे चतुरा मन, तोपत ढाकत राज अपन।।

बिलमें रहि जा भकुवाये कस, आगू के तैयारी हे।

इॅंकर भाग मा कहाॅं पराठा, बासी हा फरहारी हे।


दू रोटी बर गार-पसीना, सुबे-शाम जे टघलत हें।

इॅंकर भरोसा धनीमनी मन, चाब-चाब के चघलत हें।।

बइठाॅंगुर मन कहाॅं जानही, घाम-झाॅंझ के ऑंच कतिक।

गीत-गजल के टोर-भाॅंज मा,कलम हर्फ के साॅंच कतिक।।

जाॅंगर-टोरत खटथे तबले, ये उन्ना पेट उधारी हे।

इॅंकर भाग मा कहाॅं पराठा, बासी हा फरहारी हे।


घरवाले के सिधवापन मा ,बाहिर वाले जामत हें।

नगर-शहर पाई-परिया मा, अमरबेल कस लामत हें।

ठग्गू-जग्गू परदेशी मन,भोगत हाॅंवय राज इहाॅं।

लोटा वाले यायावर के, चउॅंक-चउॅंक मा लाज इहाॅं।।

पुरखा के छइहाॅं-भुइयाॅं मा,उनकर ठेकेदारी हे।

इॅंकर भाग म कहाॅं पराठा, बासी हा फरहारी हे।


महेंद्र बघेल

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कमिया,( मजदूर ) दिवस  एवम बासी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

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(जयकारी छन्द)

कमिया  जांगर टोर कमाय

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कमिया जांगर टोर कमाय।लेकिन बढ़िया दाम न पाय।

जावय बेरा उगते ख़ार।बाँधय ओहर मूँही पार।

चटनी बासी बिकट सुहाय।जेला धर बनिहारिन लाय।

दिनभर करथे अड़बड़ काम।जेखर पड़गे कमिया नाम।

करके मिहनत ओ दुख पाय।कइसे घर मे राशन लाय।

कइसे लइका अपन पढ़ाय ।ओ  पइसा मुसकिल म कमाय।

पेट बिकाली भटकत जाय।कोनो कोती ठउर न पाय।

लाँघन भूखन सूतत जाय।कइसे ओ  खुशहाली लाय।

कमिया जांगर टोर कमाय। लेकिन बढ़िया दाम न पाय।

जावय बेरा उगते ख़ार ।बाँधय ओहर मूँही पार।


रचनाकार-डॉ तुलेश्वरी धुरंधर अर्जुनी ,बलौदाबाजार,छत्तीसगढ़

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Tuesday, March 26, 2024

होली विशेषांक-छंदबद्ध कविता



 होली विशेषांक-छंदबद्ध कविता

 बरवै-छंद 🌹🌹


🙏गाँव-गाँव मा होली 🙏

 

गाँव-गाँव मा होली,गाथें फाग।

पावन फागुन महिना,छेंड़य राग।।


डहकी मांदर झुमका, बाजे झाँझ।

उड़त बुड़त ले खेलयँ, होगे साँझ।।


बने-बने मन दिखथें, कबरा चोर ।

गली सड़क सब भितिहा,रंगे खोर।।


देख बेवड़ा कतको, रेंगत झूम।

कइझन माते खुरचत,नइ दँय हूम।।


देखत लइका बाई, आँसू ढार।

जेन शराबी वो घर, बंठाधार।।


बरा सुहाँरी भजिया, कसके खाय।

कतको झन उछरत हें,जी पटियाय।।


धरे गुलाली पिंवरा, हरियर लाल।

नाक मुंँहू अउ मुन्डी, रचगे गाल।।


झूठ लबारी बारव, होले धाक।

पाप द्वेष अउ इरषा,होवय खाक।।


बढ़िया खावव गावव,सुघ्घर फाग।

छेड़ बसंती "बाबू", फगुवा राग ।।


कमलेश प्रसाद शर्माबाबू

 कटंगी गंडई

जिला केसीजी 

9977533375

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 कोन्हों पीये मंद हें, कोन्हों खाये भंग।

चाल ढाल मस्ती भरे, सम्हलत नइ हे अंग।।

 

दिखै चेहरा बेंदरा, पोताये हे रंग।

नाचत गावत फाग सब, माते हे हुड़दंग।।


हमर बुराई हा सबो ,जरै होलिका संग ।

ऊँच नीच के भेद बिन, लगै सबो ला रंग।।


जाति पाँति ला त्याग के, सुघ्घर परब मनाव।

बँधै प्रेम के डोर हा, अइसन रंग लगाव।।


 प्रेम रंग बरसै सदा,जिनगी रहै अँजोर।

देत बधाई भागवत, बिनती हे कर जोर।।


भागवत प्रसाद

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: कुण्डलिया छंद- 

होली खेलव मिल सबो


होली खेलव मिल सबो, रंग मया के घोर।

द्वेष भावना छोड़ दौ, बाँधव सुमता डोर।।

बाँधव सुमता डोर, रहव रख भाईचारा।

जाति-धर्म के नाम, करौ झन तुम बँटवारा।।

राहव मिल जुल मीत, कहौ नित मीठा बोली।

भरौ मया के रंग, सबो मिल खेलव होली।।


होवय झन बदनाम जी, दया मया के रीत।

होली के त्योहार मा, भर लौ मन मा मीत।।

भर लौ मन मा मीत, इही ये असल खजाना।

परंपरा के मान, सबो ला हवय निभाना।।

पुरखा के संस्कार, कभू झन संस्कृति खोवय।

गजानंद ये पर्व, हमर मनभावन होवय।।


इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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         (हाइकू घनाक्षरी)


पिंवरा फुले आरसी मुनगा ग  हय सफेद।

 होली ठिठोली म संगवारी संग   होंगे ग भेंट।।

डोंगरगढ़ म हो गे अइसे गजब   मयारू होली।

होंगे सफेद कमीज लाल जैसे चले ग गोली।।

कहत बीबी  निकलत न रंग  न छोड़ें लाली।

कोन अतका हिम्मत वाली दुहू  कस के गाली

                                       - बेदराम पटेल

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 शक्ति छंद------ फाग


मजा देख लेवत, हवै फाग के ।

जुड़े पोठ हमरो, मया ताग के ।।

लगे फूल मउहा, सबो डार मा ।

बने देख झूमत, हवय खार मा ।।


गली खोर माते, सबो के मजा ।

बने आज कसके, नँगारा बजा ।।

लगादे बने रंग,  ला गाल मा ।

चले फाग के गीत, अब ताल मा ।।


मुकेश उइके "मयारू"

ग्राम- चेपा, पाली कोरबा(छ.ग.)

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: होरी गीत

दुर्गा शंकर इजारदार के मनहरण घनाक्षरी छंद

शीर्षक 

(1) ब्रज म होरी

गोरी गोरी राधा रानी, रंग धरे आनी बानी ,

कन्हैया ला खोजत हे ,गोपी सखी संग हे ।

करिया ला करिया मा , अउ रंग फरिया मा ,

पोते बर करिया ला ,मन मा उमंग हे।

कदम के रुख तरी , खोजे गली खोल धरी ,

कन्हैया तो मिले नहीं ,राधा रानी तंग हे ।

कहत हे हाथ जोड़ ,आजा राधे जिद छोड़ ,

तोर बिना होरी के ये ,जीवन बेरंग हे ।।

(2)होरी के मउसम

परसा हा फूले हावै, आमा हर मौरे हावै ,

गुन गुन भौंरा करे, पीये जैसे भंग हे ।

कोयली हा गात हावै ,जिया हरसात हावै,

सरसों हा फूल के तो , झूमत मतंग हे ।

फागुन के रंग में तो ,सबो झन मात गे हे ,

सबो रंग मिल के तो ,होगे एक रंग हे ।

चार तेन्दू लोरी डारे ,मन ला तो मोही डारे,

मया अउ पिरित मा , भीगे अंग अंग हे ।


(3)अइसन होली खेलव

दया मया के तो डोरी ,बाँध खेलौ सब होरी ,

जात पाँत बैर भाव ,मन से निकालव गा ।

हरा पीला नीला लाल ,पोत डारौ मुँह गाल ,

छोटे बड़े सब संग ,मिल के मनालव गा ।

झन करौ हुड़दंग,छोड़ देवा दारू भंग ,

दूरिहा के काल झन, तीर मा बुलावव गा ।

कहत हँ हाथ जोड़ ,परत हँ पाँव तोर ,

सबो से तो नाता ला जी ,बने निभावव गा ।


(4) गजब होगे


गोरी के तो लाल गाल ,जब मैं रंगे गुलाल,

गुल गुल भजिया तो ,दिखत कमाल हे ,

गोरी के तो गाल देख ,सब होगे साव चेत ,

आरा पारा सबो अंग ,मचत बवाल हे ,

होली के बहाना कर ,गोरी के तो छूए गाल ,

पूछत हावय टूरा ,आगू का खयाल हे ,

गोरी मुसकात भारी ,मन मन देत गारी ,

मारे चटकन गोरी ,आगू टुरा गाल हे ।।

दुर्गाशंकर

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 होरी परब - लावणी छंद 


हवय आज जब फागुन महिना, खुशी मनावँन मन मा।

मया रंग ले रंगभरन जी, घोरन मदरस तन मा।।1


सबला मीत बनावन भइया, जीयन ए जिनगानी ला ।

बरजन उधम मचइया मनला, टारन दुख के घानी ला ।।2


भाँग खाय कस अब जिनगी हे, चस्का छोड़न गोली के|

मया दया ले सबला सींचन, रंग रचावत होली के  ।।3


दारू गाँजा मा फदके ले, सना जथे 

सुग्घर तन हा|

नशा पान मा अब का उलझन, पना जथे समरत मन हा ||4


चेतन मन ला काबर कोनो, अवचेतन कर डारत हन| 

अपने मद मा झुमरत काबर, कइसन फेशन पारत हन||5

छंदकार-

अश्वनी कोसरे रहँगिया

कवर्धा कबीरधाम

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: *होली रंग बहार*


पहिली रतिहा होलिका, पाथे जलके काल।

फिर फागुन के पूर्णिमा, होथे पर्व विशाल।।

दिखथें सबके चेहरा, रंगे रंग गुलाल।

मिलथें जम्मों रंग हा, हाथ माथ अउ गाल।1।


पीला नीला अउ हरा, किसिम किसिम के अंग।

रंगव फगुआ रंग मा, मनखे मनखे संग।।

होली के त्यौहार हा, सुग्घर संस्कृति अंग।

दुख पीरा ला टार के, मन मा भरय उमंग।2।


आनी बानी रंग के, सबो डहर भरमार।

गाँव शहर मा छाय हे, होली रंग बहार।।

बैर भाव बिसराय के, होली हरे तिहार।

दया मया के रंग ला, सबके उप्पर डार।3।


रचना :- कमलेश वर्मा

छंद के छ, सत्र -09

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: सरसी छंद


रंग धरे हे परसा लाली, जस मँदार के फूल|

दुलहिन लागत हावय फागुन, जिवँरा  मारत हूल||


गली गली मा रंग उड़त हे, मिलके गावँय फाग|

रंग भंग मा रंग नँदागे, साजँय सुग्घर राग||


मया पिरित के छुटगे बँधना, झिनियागे सुख डोर|

मँदरस बोली तरसय चोला, करुहा के हे सोर||


सरपटप चाल सड़क हर भागे, उसनिदहा हे खोर।

रास रचइया कहाँ रचावय, कहाँ हें माखन चोर।।


कोन करय जग के रखवारी, काखर होवय सोर।

पपिहा कोयल तोता मैना, उड़गें छइहाँ छोर।।


छंदकार-

अश्वनी कोसरे रहँगिया

पोंड़ी कवर्धा कबीरधाम

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: कुण्डलिया - छंद


धरती अंबर छा गइस, चारो ओर गुलाल। 

बैर भाव ला छोड़ के, रँगव सबो के गाल।। 

रँगव सबो के गाल, देख अब आगे होरी। 

रंग मया के डार, बधाई देवव कोरी।। 

कहे शिशिर सच बात, फाग हर नोहय सस्ती। 

महँगी रख मनुहार, रँगव जी अंबर धरती।। 


पावन भुइँया देश मा, होली रंग तिहार। 

भेद भाव हा दूर हो, नीक रखव व्यवहार।। 

नीक रखव व्यवहार, रहय मनखे के बँधना। 

डार मया के हार, महक ही सबके अँगना।। 

कहे शिशिर सच बात, सबो घर आवन जावन। 

उड़ही रंग गुलाल, तभे भुइँया हो पावन।। 


सुमित्रा शिशिर

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: *कुंडलिया छंद*

*विषय-होली*


होली मन भर खेल ले, मया रंग ला बाँट।

मन के खटखट छोड़के, मनखे ला    तँय साँट।।

मनखे ला तँय साँट, मया के बाँटा करले।

दया-मया के रंग, हाथ मा संगी धरले।।

जिनगी हे दिन चार, गोठिया हँसी-ठिठोली।

भर पिचकारी मार, खेल तँय मन भर होली।।


*अनुज छत्तीसगढ़िया*

*पाली जिला कोरबा*

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छन्न पकैया छंद- होरी


छन्न पकैया छन्न पकैया, मनभानव हे होली|

ड॓डा नाचँय माँदर बाजय, निकरे घर ले टोली||


छन्न पकैया छन्न पकैया, फागुन सोर उड़ागे|

गली खोर पुर चक चौंरा मा, मया रंग बरसागे||


छन्न पकैया छन्न पकैया, चुरगे डुबकी कड़ही|

छंद राग मनभावन लागे, दिनभर होरी उड़ही||


छन्न पकैया छन्न पकैया, गुझिया पाग धरागे |

छंद गीत ले होरी खेलत, आँसो फगुवा जागे ||


छन्न पकैया छन्न पकैया, बाजत हवय नँगारा|

गावत बैठे राग फगुनवा ,झोकँय झारा झारा||


छंदकार-

अश्वनी कोसरे रहँगिया

कवर्धा कबीरधाम

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: छन्न पकैया छन्द 

16-12


छन्न पकैया- छन्न पकैया,आजा राधा गोरी।

बृंदाबन में धूम मचे हे,सँगे खेलबो होरी।।


छन्न पकैया-छन्न पकैया,हरियर पिँवरा लाली।

रंग ल धरके आहूँ मँय हा,आ जाबे तँय काली।।


छन्न पकैया- छन्न पकैया,नइ आवँव मँय बिलवा।

रंग म मोला तँय नहवाबे,सँग हे ग्वाला मितवा।।


छन्न पकैया- छन्न पकैया,झन कर आना कानी।

आथे साल गये मा होली,आजा राधा रानी।।


छन्न पकैया- छन्न पकैया,करथस तँय बरजोरी।

भर पिचकारी मारत जाथस,कही सरारा होरी।।


छन्न पकैया- छन्न पकैया, ले आ सखियाँ टोली ।

मया रंग ला आज लगाके, करबो हॅंसी ठिठोली ।।


छन्न पकैया-छन्न पकैया,आगे सखियाँ सारी।

देखे मोहन खुश होके तब,मारत हे पिचकारी।।


छन्न पकैया- छन्न पकैया, देखत हे नर नारी ।

बरजोरी झन करबे कान्हा,खाबे नइतो गारी।।


छन्न पकैया- छन्न पकैया,  भींगे चुनरी चोली ।

नाचे राधा कान्हा के सँग,खूब मनावत होली ।।


छन्न पकैया-छन्न पकैया,बाजे ढोल नँगारा।

ग्वाल बाल मन नाचन लागे,बनके गा हुरियारा।।


केवरा यदु"मीरा"राजिम

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.     *वसन्ती वर्मा के सरसी छंद* 


                       *होरी* 

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लाली लाली परसा फूले,आगे फागुन मास।

धर पिचकारी होरी खेलें,देख बहुरिया सास।1।


मया पिरीत ला बाँटे होरी,मन मइलाये धोय।

जुन्ना झगरा अइसन टोरे,झगरा फेर न होय।2।


बाजे माँदर ढोल नंगाड़ा,गाँव म चौकी आँट।

गुजिहा भजिया बरा बनाबो,खाबो मिल सब बाँट।3।


रंग धरे हँव लाली पिंवरा,होरी- आज तिहार।

हाँसव खेलँव होरी मैं जी,जोही- संग हमार।4।



            *अमरइया के छाँव* 

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रंग धरे आइस वासन्ती,मउरे आमा फूल।

बइठे हावय कोयल कारी,गावय झुलना झूल।1।


आमा डारा मउरे घम- घम,हरियर- हरियर पान।

लागय लुगरा पिंवरा पहिरे,दुलहिन जइसन जान।2।


महर- महर महकय अमरइया,सुनें चिरइयाँ चाँव।

गीत सुनें कोयल कारी के,बइठे आमा छाँव।3।


आमा के डारा मा बइठे,देख सुवा इतराय।

हमर दुनों के जोड़ी संगी,सब्बो झन सहराँय।4।


देखें झट ले संझा होगे,संझा ले अब रात।

मन मा आशा धर के राखौं,भूलौं दुख के बात।5।


            *वसन्ती वर्मा* 

                बिलासपुर

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/फागुन के होरी/ सार छंद

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फागुन महिना सुग्घर होरी,

                        रंग गुलाल उड़ाबो।

भेद भाव ला छोड़ सबोझन,

                   मिलके खुशी मनाबो।।


आय बसन्ती पुरवाई मा,

                       डारा   पाना   झूले।

देख-देख मन भौंरा नाचे,

                        लाली परसा फूले।।

रास रंग मा डूब चलौ जी,

                       गीत फाग के गाबो।

फागुन महिना सुग्घर होरी...........


धर पिचकारी छरा ररा जी,

                        इक दूसर ला मारौ।

बैरी दुश्मन अपन बनाके,

                         रंग मया के डारौ।।

आवौ जम्मों मिल जुर संगी,

                        ढोल मृदंग बजाबो।

फागुन महिना सुग्घर होरी...........


कउनो लाली, पींयर, हरियर,

                         रंग गुलाल सनाये।

होरी खेलत दुःख भुलावत,

                         नर नारी बइहाये।।

नशा भाँग के चढ़गे भैया,

                      अब कइसे उतराबो।

फागुन महिना सुग्घर होरी............

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रचनाकार:-

बोधन राम निषादराज"विनायक"

सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)

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: बरवै छन्द-

होली


जलगे संगी होली, बइठव आव।

बाजत हवय नँगारा, फगुआ गाव।


मिल गाबो जी घर-घर, पीरित राग।

दया-मया के मन मा, बाँधन ताग।


इरखा, दोखी, छल अउ, तज अभिमान।

हवन बरोबर सब झन, एकै जान।


भेदभाव छोड़न हे, सबो समान।   

ऊँचा ना नीचा सब, मनखे आन।


चलही अब पिचकारी, भर-भर रंग।

लइका-पिचका गाहीं, संगी संग।


रंग-रंग मा भीजन, लगै गुलाल।

झूम नाचबो चल ना, दे दे ताल।


चोरो-बोरो होहीं, बारा हाल।

जमके खेलन होरी, ऐसो साल।


हेमलाल सहारे

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: छन्न पकैया छन्न पकैया, देखव फागुन आगे।

बाढ़े लागे दिन हा तिल तिल,जाडा़ कसके भागे।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, खेलव मिलजुल होली।

बाँधव बँधना मन ले मन के,बोलव सुग्घर बोली।।

छन्न पकैया छन्न पकैया,हरियर पींयर लाली।

चीन्हे  सकथे कोनो ना ही,दिखथे मुख हा काली।

छन्न पकैया छन्न पकैया, मारे हे  पिचकारी।

भीजें हावय तन मन देखव,अउ भींजे हे सारी।।

छन्न पकैया छन्न पकैया ,ढोल नगारा बाजे।

झूमत नाचत गावत हावय,नवा साज ला  साजे।



चित्रा श्रीवास

सीपत बिलासपुर

छत्तीसगढ़

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 *होली के हार्दिक बधाई एवं शुभकामना*

*मोद सवैया*


रंग लगा अउ अंग सजा मन मैल हटा जी ले सँगवारी |

पींवर लाल गुलाल धरे जन निच्चट कोनो हावय कारी ||

छोड़ गुमान सबो झन ले रख तीर   पटा ले जी तँय तारी |

भेद मिटा हिरदे भर रंग मया रस होली के पिचकारी ||


अशोक कुमार जायसवाल

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 *होली* (सार छंद)

नाचत गावत धूम मचावत,आवत हे हमजोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल ,खेलत हें सब होली।


कोनो पिंवरा कपड़ा पहिरे, कोनो पहिरे सादा।

कोनो मारे लिटिल पैक अउ, कोनो मारे जादा।

मजा उड़ावत हावय अड़बड़,देखव इंकर टोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल,खेलत हें सब होली।


फाग गीत के धुन मा सबझन,नाचत हावय भारी।

नन्द लाल के रूप धरे हे ,मारत हें पिचकारी।

लइका बुढ़वा जम्मो झन सब,अड़बड़ करत ठिठोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल,खेलत हें सब होली।


माते हावय सबझन संगी, पीके अड़बड़ दारू।

घर के आगू के नाली मा, गिरगे हवय समारू।

डगमग डगमग रेंगत हावय,खाय भांग के गोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल,खेलत हें सब होली। 


मन ले इर्ष्या द्वेष भुलाके, रंग लगावत लाली।

जात पात तज गला मिलत हे, मानवता के माली।

मीठ मीठ बोलत हावय सब,अड़बड़ गुरतुर बोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल, खेलत हें सब होली।


रचनाकार 

अमृत दास साहू 

ग्राम - कलकसा, डोंगरगढ़

जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)

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: उत्सव परब तिहार 


उत्सव परब तिहार जुरे हे, हम सबके जिनगानी ले।

जिनगानी के तार जुरे हे, खेत किसान किसानी ले।


मन के हे संबंध पेट ले, पेट भरत भर जाथे मन।

सुख के सोत अनाज अन्न ए, पुरुप गवाही हे जीवन।


मनखे ले मनखे के नाता, जुरे सुमत के डोरी मा।

सुख के रंग खुशी बड़ देथे, परगट दिखथे होरी मा।


भलमनशुभा असीस दुआ हर, मिलथे मीत-मितानी ले।

उत्सव परब तिहार जुरे हे, हम सबके जिनगानी ले।


पतझर देख लगाम लगाथे, जेहर तीन-परोसा मा।

ऋतु बसंत उल्होथे पाना, भरथे रंग भरोसा मा।


पाख अँजोरी फागुन पुन्नी, ओन्हारी के होरा हे।

रंग परब बर रंग-रंग के, तुक-तुक तोरा-जोरा हे। 


परय रंग मा भंग न कखरो, बिपदा बादर-पानी ले।

उत्सव परब तिहार जुरे हे, हम सबके जिनगानी ले।


रचना-सुखदेव सिंह 'अहिलेश्वर'

गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़

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दुर्मिल सवैया(पुरवा)


सररावत  हे  मन  भावत  हे  रँग फागुन राग धरे पुरवा।

घर खोर गली बन बाग कली म उछाह उमंग भरे पुरवा।

बिहना मन भावय साँझ सुहावय दोपहरी म जरे पुरवा।

हँसवाय कभू त रुलाय कभू सब जीव के जान हरे पुरवा।

खैरझिटिया

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झन बिगाड़ होली मा बोली- गीत(चौपाई छंद)


चिल्लाथस बड़ होली होली, लोक लाज के फाटक खोली।

झन बिगाड़ होली मा बोली, झन बिगाड़ होली मा बोली।।


मया पिरित के ये तिहार मा, द्वेष रहे झन तीर तार मा।

बार बुराई होली रचके, चल गिनहा रद्दा ले बचके।।

उठे कभू झन सत के डोली, पथ चतवार असत ला छोली।

झन बिगाड़ होली मा बोली, झन बिगाड़ होली मा बोली।।


बजा नँगाड़ा झाँझ मँजीरा, नाच नाच दुरिहा दुख पीरा।

समा जिया मा सब मनखे के, दया मया नित ले अउ दे के।

छीच मया के रँग ला घोली, बना बने मनखे के टोली।

झन बिगाड़ होली मा बोली, झन बिगाड़ होली मा बोली।।


एखर ओखर खाथस गारी, अबड़ मताथस मारा मारी।

भाय नही कोनो हर तोला, लानत हे अइसन रे चोला।।

दारू पानी गाँजा गोली, गटक कभू झन मिल हमजोली।।

झन बिगाड़ होली मा बोली, झन बिगाड़ होली मा बोली।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

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