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Sunday, March 8, 2020

महिला दिवस विशेषांक-छंदबध्द गीत कविता-छंद के छ परिवार

महिला दिवस विशेषांक-छंदबध्द गीत कविता-छंद के छ परिवार


                            1
(रोला छंद)-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

महिला मनके मान,सबो बर बरकत लाही।
बनही बिगड़े काम,सरग धरती  मा  आही।
दया मया के खान, हरे   बेटी   महतारी।
घर बन खेती खार,सिधोये सबला नारी।

जनम  जनम  रथ  हाँक,बढ़ाये  आघू जग ला।
महिनत कर दिन रात,होय अबला सब सबला।
जग  के  बोहै  भार,अधर हे हँसी ठिठोली।
काटे दुक्ख हजार,मीठ मधुरस कस बोली।

दुख  पीरा  के नाम,जुड़े  हे  नारी  सँग  मा।
गहना गुठिया राज,करे नित आठो अँग मा।
गहना जेखर लाज,हरे कहि जग भरमाये।
वो नारी अब जाग,भेस ला असल बनाये।

सुघराई  के   देख, लगे  परि-भाषा  नारी।
मिट जाये सब आस,उहाँ बर आशा नारी।
सींच  दूध  के  धार,बढ़ाये बेटा बेटी।
नारी ममता रूप,मया के उघरा पेटी।

कदम मिलाके आज,चले सब सँग मा नारी।
जल थल का आगास,गढ़े बन महल अटारी।
देखव  सब्बे  छोर, शोर हे नारी मनके।
देवय सुख के दान,शारदे लक्ष्मी बनके।

बइरी  मनके  नास,करे  दुर्गा  काली कस।
घर बन के रखवार,बगइचा के माली कस।
होवय जग मा नाम,सदा हे तोरे मइयाँ।
तैं  देवी अवतार,परौं नित मैहर पइयाँ।

                     (2)
महतारी(चौपई छंद)-खैरझिटिया

दाई ले बढ़के हे कोन।दाई बिन नइ जग सिरतोन।
जतने घर बन लइका लोग।दुख पीरा ला चुप्पे भोग।

बिहना रोजे पहिली जाग।गढ़थे  दाई   सबके  भाग।
सबले  आखिर  दाई सोय।नींद घलो पूरा  नइ  होय।

चूल्हा चौका चमकय खोर।राखे दाई ममता  घोर।
चिक्कन चाँदुर चारो ओर।महके अँगना अउ घर खोर।

सबले  बड़े   हवै  बरदान।लइका बर गा गोरस पान।
चुपरे काजर पउडर तेल।तब लइका खेले बड़ खेल।

कुरथा कपड़ा राखे कॉच।ताहन पहिरे सबझन हाँस।
चंदा   मामा   दाई   तीर।रांधे   रोटी   रांधे   खीर।

लोरी  कोरी   कोरी  गाय।दूध दहीं अउ मही जमाय।
अँचरा भर भर बाँटे प्यार।छाती  बहै  दूध  के  धार।

लकड़ी  फाटा  छेना थोप।झेले घाम जाड़ के कोप।
बाती  बरके  भरके तेल।तुलसी संग करे नित मेल।

काँटा भले गड़े हे पाँव।माँगे नहीं धूप मा छाँव।
बाँचे खोंचे दाई खाय।सेज सजा खोर्रा सो जाय।

दुख ला झेले दाई हाँस।चाहे छुरी गड़े या फाँस।
करजा छूट सके गा कोन।दाई देबी  ए सिरतोन।

बंदव  तोला  बारम्बार।कर्जा  दाई  रही  उधार।
कोन सहे तोरे कस भार।बादर सागर सहीं अपार।

               (3)
शंकर छंद-खैरझिटिया

महतारी कोरा मा लइका,खेल खेले  नाच।
माँ के राहत ले लइका ला,आय नइ कुछु आँच।
दाई दाई काहत लइका,दूध पीये हाँस।
महतारी हा लइका मनके,हरे सच मा साँस।

करिया टीका माथ गाल मा,कमर करिया डोर।
पैजन चूड़ा खनखन खनके,सुनाये घर खोर।
लइका के किलकारी गूँजै,रोज बिहना साँझ।
महतारी के लोरी सँग मा,बजै बाजा झाँझ।

धरे रथे लइका ला दाई,बाँह मा पोटार।
अबड़ मया महतारी के हे,कोन पाही पार।
बिन दाई के लइका के गा,दुक्ख जाने कोन।
दाई हे तब लइका मनबर,हवे सुख सिरतोन।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)
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                    1
गंगोदक सवैया-श्रीमती आशा आजाद

माँ ले बड़ा नाव कोनो नही हे महामाय दानी कहाये सुनौ।
कोख म नौ माह राखै तभे जीव नावा मुस्कात आये सुनौ।
मान सम्मान देवै मया मीठ भाखा सदा माँ सिखाये सुनौ।
प्रेम शिक्षा ल देवै सदा माँ इही ज्ञान गंगा बहाये सुनौ।।

                     2
 गीतिका छंद-श्रीमती आशा आजाद

माँ कहत हे जग हा जेला,लाय ये संसार मा,
देत हमला नांव सुग्घर,प्रेम नाता प्यार मा।
माँ दरद ला देख सहिथे,ज्ञान के अवतार हे,
मान सबला पोस लेथे,देख हिरदे प्यार हे।

पेट रहिथे देख खाली,रोज भोजन देत हे,
माँ करत हे नेक सेवा,दरद सबके लेत हे।
देत हावै ज्ञान सुग्घर,माँ हवय आधार जी,
दे जनम पालन करे हे,डाल अबड़ दुलार जी।।

छंदकार-श्रीमती आशा आजाद
पता-मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
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मनहरण घनाक्षरी-राम कुमार चन्द्रवंशी

हारे अब नारी नही

हारे अब नारी नहीं,अबला बिचारी नहीं,
करत हे काम संगी,नर के समान गा।
ज्ञान अउ विज्ञान मा,देश अउ जहान मा,
जिहाँ देखो उहाँ अब,नारी के हे सान गा।
खेल के मइदान मा,धरती आसमान मा,
रचत हे नारी मन,अब कीर्तिमान गा।
घर-परिवार,टी वी,रेडियो,अख़बार मा
बनावत हावे नारी,नवा पहिचान गा।।

छुवत अगास देखो,नारी के विकास देखो,
दवाखाना म रोगी के बचावत प्रान गा।
संग-संग चलत हे नारी हर नर के जी,
होवत हे नारी के जी,बड़ गुनगान गा।
देस के सिपाही बन लड़त हे नारी मन,
दुश्मन के टोरत हे,देखो अभिमान गा।
करव झन तुलना,नारी संग मा नर के,
नारी आघू झुके हावे,सदा भगवान गा।।

रचनाकार-राम कुमार चन्द्रवंशी
  बेलरगोंदी(छुरिया)
   जिला-राजनांदगाँव
    छत्तीसगढ़
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कुण्डलिया छंद- इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

नारी नर अर्धांगनी, एक अंग दू प्रान।
नारी हे नारायनी, कहिथे बेद पुरान।।
कहिथे बेद पुरान, बात हे पर ये झूठा।
युग युग तक अपमान, देख लौ इतिहास उठा।।
कह गय तुलसीदास, सदा इन ताड़नहारी।
जले होलिका आग, परीक्षा सीता नारी।।

महिमा मंडन झन करव, नोहय सच इंसाफ।
लिखना हे सच लेखनी, अत्याचार खिलाफ।।
अत्याचार खिलाफ, सिखावव हक बर लड़ना।
उच्च बुलन्दी राह, नित्य ही आगू बढ़ना।।
अबला नारी जात, बात करथँव मँय खण्डन।
सहीं दिशा दौ राह, करव ना महिमा मंडन।।

छंदकार- इंजी.गजानन्द पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
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4 comments:

  1. अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के गाड़ा गाड़ा बधाई,जम्मो साहित्यकार मन ला अनंत नमन🙏🙏🙏💐💐💐

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  2. अति सुन्दर छंद। रोला अउ शंकर छंद। वर्मा जी के।

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  3. आप सबो के छंदबद्ध रचना शानदार हे, बधाई

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  4. बहुत सुग्घर नारी शक्ति के महिमा

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