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Tuesday, March 10, 2020

होली विशेषांक छंदबद्ध रचना-छंद के छ परिवार





होली विशेषांक छंदबद्ध रचना-छंद के छ परिवार

सार छंद - श्रीमती आशा आजाद

आगे हाँसत धरके ऐदे,रंग भरे जी होली।
रंग भरे पिचकारी लेलौ,आवव रे हमजोली।।

छेड़ौ सबझन साज नगाड़ा,गावौ मिल जुल गाना।
बिछे रहय रंगोली जइसन,मउसम लगय सुहाना।
गुत्तुर-गुत्तुर भाखा राखौ,बोलौ सुग्घर बोली।
रंग भरे पिचकारी लेलौ,आवव रे हमजोली।।

हरिहर हरिहर रंग रहय जी,नीला पीला डालौ।
ढोल नगाड़ा बाजा बाजै,गीत मया के गालौ।
तान लगाके सब झन बोलौ,होली हे जी होली।।
रंग भरे पिचकारी लेलौ,आवव रे हमजोली।।

होली हे भाई होली हे,तान लगाके घूमौ।
रंग बिरंगी ए भुइयाँ ला,माथ नवा के चूमौ।।
संगी साथी साथ रहय जी,होवै हँसी ठिठोली।
रंग भरे पिचकारी लेलव,आवौ रे हमजोली।।

छंदकार - श्रीमती आशा आजाद
पता - मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़

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 छप्पय छंद श्रीमती आशा आजाद

होली आगे देख,सबो संगी जुरियावौ।
छेड़ नगाड़ा साज,थिरक के गाना गावौ।।
अपने धुन के साज,तान ला छेड़ँव संगी।
भुइयाँ दिखही आज,बने जी रंग बिरंगी।।
बने मजा के खेल लौ,ठेनी झगड़ा छोड़ दौ।
मया पिरित के रंग ले,जम्मो नाता जोड़ दौ।।

सुमता के हो रंग,रंग अइसन बगरावौ।
मया पिरित के बोल,गीत ला जुरमिल गावौ।।
बैरी संगी होय,नेक व्यवहार ल रखहूँ।
नसा नास हे जान,मात के झन जी रहहूँ।।
जात पात ला भूलके,भाईचारा लाव जी।
संग मया ला बाट के,हिरदे ले मुस्काव जी।।

छंदकार - श्रीमती आशा आजाद
पता - मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
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सुखदेव: रिस्की हे रंगीन-मिजाजी- सरसी छंद

होली हे होली हे काहत,कर देही कंगाल।
रिस्की हे रंगीन-मिजाजी,दुरिहा जा तत्काल।

आड़ लगावत होली के बोली ये ऊटपटांग।
रंग-रसा के मतलब नइहे,दारू गाँजा भांग।

पहिदे पाबे नशानगर मा,फँस जाबे हर हाल।
रिस्की हे रंगीन-मिजाजी,दुरिहा जा तत्काल।

आँखी ला मूँदे मुस्का झन,समय बदलगे जाग।
समरसता के राग रंग मा,मिल के गा ले फाग।

सादा रहिले सादा चहिले,तैं आसो के साल।
रिस्की हे रंगीन-मिजाजी,दुरिहा जा तत्काल।

छोड़ हुँकारू भरना नोहय होली हर हुड़दंग।
दया मया धर आथे फागुन लाथे खुशी उमंग।

भभकउनी मा ये बिगड़उला,आदत ला झन पाल।
रिस्की हे रंगीन मिजाजी,दुरिहा जा तत्काल।

रचना-सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'
गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़

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दोहा - राज कुमार बघेल

काम धाम ला छोड़के,छोड़ शरम अउ  लाज ।
बूड़ जा पिरित रंग मा,हितवा बइरी आज ।।1।।

फागुन होली  संग मा,बइरी  बने मितान ।
हरियर पीयॅऺंर रंग मा,सुग्घर फभत जहान ।।2।।

फागुन महिना आय हे, होली कहॅऺंय तिहार ।
जुर मिल सबो मनाव जी,राखव नेक विचार ।।3।।

मनखे मनखे होत हे,झन थोरिक दुरिहाव ।
भेदभाव ला भूलके हिरदे संग लगाव ।।4।।

पीयॅऺंर लाली रंग मा,अइसन रंग जमाय ।
नोनी बाबू संग मा,कोनो नइ चिन्हाय ।।5।।

होरी खेलत बिरज मा, भाई करिया ताय ।
भर पिचकारी मारथें,संगी सब जुरियाय ।।6।।

राधा के मन आध हे,मन मा किसन बसाय ।
खेलॅऺंव होली साध हे,कोन जघा तिरियाय ।।7।।

ढोल नगाड़ा हे बजत,सबके अंतस भाय ।
राधा किसना हे फभत,आॅऺंखी बड़ सुख पाय ।।8।।

परसा लाली फूल मा, कान्हा ला परघाय ।
डारा डारा झूल गा, गीत बसंती गाय ।।9।।

लाली लुगरा हे फभत,राधा तन मा तोर ।
देख सुहावन हे लगत,मोहे मन चितचोर ।।10।।

 छंदकार -राज कुमार बघेल
             सेन्दरी, बिलासपुर

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रोला छंद- राज कुमार बघेल

मन मा भरे उछाह,चले सब चिल्ला चिल्ला ।
रॅऺंगत हवॅऺंय परिवार,संग मा माई पिल्ला ।।
ताकत हावॅऺंय आज,पाॅऺंय जब कोई  मउका ।
डारे मा का लाज,रंग दे तॅऺंय हा ठउका ।।1।।

घड़कत हावय ढोल,भाय जब बजे नगाड़ा ।
गुरतुर लागत बोल,भाग गय अब तो जाड़ा ।।
जिनगी हे दिन चार, रंग ले तॅऺंय हा तन ला ।
इरखा देव बिसार,बना ले  फरियर मन ला ।।2।।

 छंदकार-राज कुमार बघेल
             सेन्दरी , बिलासपुर

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 कुण्डलिया छंद- राज कुमार बघेल

होली महिना लाय हे,आनी बानी रंग ।
जग मा मस्ती छाय ये,मन मा भरे उमंग ।।
मन मा भरे उमंग,रार झन तॅऺंय हा करबे ।
रहिबे जुर मिल संग,मीत बन दुख ला हरबे ।।
देख किसन के संग,करॅऺंय जी हॅऺंसी ठिठोली ।
बिन कान्हा के होय, नहीं जी फागुन होली ।।

 छंदकार-राज कुमार बघेल
              सेन्दरी, बिलासपुर

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 छप्पय छंद- राज कुमार बघेल

होली के दिन आज,चलव गा सब जुरियावव ।
सुमता मा बड़ राज, सबो ला गले लगा लव ।।
हावय मउका घात, निभाई भाई चारा ।
मानवता के बात,मीत जस हे जग सारा ।।
खुशी मनाबो आज जी, करबो जुर मिल काम जी ।
कहे सियानी मान जी, होवय जग मा नाम जी ।।

छंदकार-राज कुमार बघेल
             सेन्दरी, बिलासपुर
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ताटंक छंद-

फागुन महिना सबले बढ़िया,कहिथें जी दुनिया वाले ।
अपन पिरित के रंग बुड़ोथे,गोरिया हो  चाहे काले ।।
नीला पीला लाली पीयॅऺंर,सबके मन ला ये भाथे ।
हिरदे भीतर घोर मया ला, भाई चारा सिरजाथे ।।1।।

धरे हवॅऺंय पिचकारी जम्मों,चाल हवय ये मतवाली ।
हवय नहाये गली खोर हा,जइसे हे कोयल काली ।।
भौजी भइया खेलॅऺंय होली,खेलॅऺंय साला अउ साली ।
फाग गीत के सुग्घर बोली, बन के गावत हमजोली ।।2।।

परसा फूले लाली लाली, गीत बसंती ये गाथे ।
रस्ता देखत तोर अगोरा,पाना मूड़ी डोलाथे ।।
देख हवा पी मउहा झोरे,हावय अब्बड़ बौराये ।
अमुवा रानी चढ़े जवानी,राहय सिरतो मौराये ।।

 राज कुमार बघेल
 सेन्दरी, बिलासपुर
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मनहरण घनाक्षरी छंद- राज कुमार बघेल

संगी साथी साथ मा जी, पिचकारी हाथ मा जी,
होली के ये बात मा जी, उधम मचात हें ।
मन मा उछाह भरे, रंग ये गुलाल धरे,
बात नइ माने कोनो, अंग मा लगात हें ।
कोनो दिखे गोरी नारी ,कोनो दिखे कारी कारी,
रंग मा बुड़ोय बर, सब ला बलात हें ।
संगी  ये जहुरिया जी ,संग मा बहुरिया जी
खेले बर होली तभो, मन मा लजात  हें ।

 राज कुमार बघेल
 सेन्दरी, बिलासपुर

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 घनाक्षरी छंद :- जगदीश "हीरा" साहू

होली हे....

हाथ मा गुलाल धरे, कोनो पिचकारी भरे, कोनो हा लुका के खड़े, आगू पाछू जात हे।
लईका सियान संग, बुढ़वा जवान घलो, रंगगे होली मा गली गली इतरात हे।।
गली मा नगाड़ा बाजे, मूड़ पर टोपी साजे, बड़े बड़े मेंछा मुँह ऊपर नचात हे।
गावत हावय फ़ाग, लमावत हावै राग, सबो संगवारी मिल, मजा बड़ पात हे।।

बाहिर के छोड़ हाल, भीतर बड़ा बेहाल, भौजी धर के गुलाल काकी ला लगात हे।
हरियर लाली नीला, बैगनी नारंगी पीला, आनी बानी रंग डारे, सब रंग जात हे।।
माते हावै हुड़दंग, भीगे सब अंग अंग, अँगना परछी सबो रंग मा नहात हे।
बइठे बाबू के दाई, सब के होली मनाई, अपन समय के आज सुर ला लमात हे।।

जगदीश "हीरा" साहू
कड़ार (भाटापारा)
छत्तीसगढ़

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चौपाई छंद - (फागुन)


फागुन आगे रॅग बरसत हे। नर नारी जम्मो हरषत हे।।
लाली पिवरी हरियर भावय। होरी होरी कहि कहि गावय।।

महर महर अमरैया महकय। दह दह परसा फूले दहकय।।
नशा भाॅग मा गदगद हे मन। इन्द्रधनुष अस दिखथें जन-जन।।

गाॅव गली मा बजै नगारा। ठुमुक ठुमुक नाचॅय सब पारा।।
तरी उपर मा रॅग बोथागे। सबौ बेंदरा भलुवा लागे।।

रंग रॅगीला मौसम होगे। कौन कहाॅ हे गा सब खोगे।।
पुन्नी के चन्दा जस गोरी। सखियन सॅग करथे बरजोरी।।

छंदकार - रामकली कारे
बालको नगर कोरबा

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 अजय अमृतांसु: होली के दोहा।   ////

तन ला रंगे तैं हवस,मन ला नइ रंगाय।
पक्का लगही रंग हा,जभे रंग मन जाय।। 1।।

छोड़व झगरा ला तुमन,गावव मिलके फाग।
आपस में जुरमिल रहव,खूब लगावव राग।।2।।

आँसों होरी मा सबो,धरव शांति के भेष।
मेल जोल जब बाढही,मिट जाही सब द्वेष।।3।।

कबरा कबरा मुँह दिखय,किसम किसम के गोठ।
मगन हावय सब भाँग मा,दूबर पातर रोठ।।4।।

मिर्ची भजिया देख के,जी अड़बड़ ललचाय।
छान छान के तेल मा, नवा बहुरिया लाय।।5।।

भँगहा भकवा गे हवय ,मंद मंद मुस्काय।
सूझत नइ हे का करय,कोन डहर वो जाय।।6

खसुवा के मरना हवय,खसर खसर खजुवाय।
होली के हुड़दंग मा,  मजा कहाँ ले पाय।।7

दरुहा मन ढरकत हवय , पीके सब चितयाय।
बस्सावत हे जोर के, देख कुकुर सुँघियाय ।।8

लबरा मन के हे चलत,चोट्टा मन के राज।
नँगरा खावत खीर हे,सिधवा तरसत आज।।9

 अजय अमृतांशु,
भाटापारा, 9926160451

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रंग तिहार(सरसी छंद)-जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

फागुन पुन्नी जरय होलिका,होय   बुराई  नास।
सत के जोती जग मा बगरे,मन भाये मधुमास।

चढ़े मया के रँग दूसर दिन,होवय सुघ्घर फाग।
होरी   होरी  चारो   कोती, गूँजय  एक्के  राग।
ढोल नँगाड़ा बजे ढमाढम,बजे  मँजीरा  झाँझ।
रंग गुलाल उड़ावय भारी,का बिहना का साँझ।
करिया पिवँरा लाली हरियर,चढ़े रंग बड़ खास।
फागुन पुन्नी जरय होलिका,होय बुराई नास....।

डूमर  गूलय  परसा फूलय, सेम्हर होगे लाल।
सरसो चना गहूँ बड़ नाचय,नाचे मउहा डाल।
गरती  तेंदू  चार  चिरौंजी,गावय  पीपर  पात।
अमली झूलय आमा मउरे,गीत कोयली गात।
घाम हवे ना जाड़ हवे जी,हवे मया के वास।
फागुन पुन्नी जरय होलिका,होय बुराई नास।

होली  मा  हुड़दंग  मचावय,पीयय  गाँजा  भांग।
इती उती चिल्लावत घूमय,तिरिया असन सवांग।
तास जुआ अउ  दारू पानी,झगरा झंझट ताय।
अइसन मनखे गारी खावय,कोनो हा नइ भाय।
रंग मया के अंग लगाके,जगा जिया मा आस।
फागुन पुन्नी जरय होलिका,होय बुराई नास..।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)
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घनाक्षरी-जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

नइ घेपे कोनो ला वो,रँगे गाल दोनो ला वो।
भिरभिर भिरभिर,भागे गली खोर मा।
भूत कस दिखत हे,गला फाड़ चीखत हे।
नाक कान गली खोर,भरगेहे शोर मा।
रहिरहि नाचत हे, हिहिहिहि हाँसत हे।
मगन फिरत हवै,बंधे मया डोर मा।
नँगाड़ा मँजीरा धरे,पिचका मा रँग भरे।
होरी होरी रटत हे,फगुवा हे जोर मा।

दोहा-जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

जिनगी मा उल्लास के,बरसे सातो रंग।
फागुन रंग फुहार में,भीगें आठो अंग।1

वो जिनगी बेरंग हे,जेमा नइहे आस।
दया मया ममता बिना,मनखे जिंदा लास।2

आये रंग तिहार हे, जुरमिल गावव फाग।
रँग दव गाल कपार ला,दया मया रँग पाग।3

परसा सेम्हर फूल हा, अँगरा कस हे लाल।
आमा बाँधे मौर ला,माते मउहा डाल।।4

नीला पीला लाल हा, दू दिन के बस ताय।
मया रंग चोक्खा चढ़े,धोये नइ धोवाय।।5

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को कोरबा
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छंदकार - बोधन राम निषादराज

(1)किरीट सवैया

 (फाग मनावत)

ढोल बजे बृज मा रधिया सँग मोहन रास रचावत हावय।
फागुन रंग उड़े फगुवा सब फाग सुनावत गावत हावय।।
माँदर बाजत देख गुवालन हाँसत भागत आवत हावय।
मातु जसोमति नंद बबा यह देखत फाग मनावत हावय।।

(2) महाभुजंग प्रयात सवैया
 (होली)

बजै ढोल बाजा नँगारा सुहावै,दिखै आज लाली गुलाली कन्हैया।
धरे रंग हाथे लगावै मुहूँ मा,इहाँ राधिका हा लुकावै ग भैया।।
भरे हे मया राग कान्हा बलावै,लजावै ग  गोपी कहै हाय दैया।
मया मा फँसा रंग डारै मया के,नचावै सँगे मा मया के रचैया।।

(3) महाभुजंग प्रयात सवैया
 (बसन्त)

झरै पान डारा उड़ावै हवा मा,नवा पान सोहै बसन्ती सुहावै।
दिखै फूल लाली ग टेसू खड़े हे,बरै देख आगी हिया ला जलावै।।
बढ़ावै मया ला चलै कामदेवा,धरे काम के बान मारै सतावै।
उड़ै रंग होली बसन्ती हवा मा,सबो आज  लाली गुलाली लगावै।।

छंदकार - बोधन राम निषाद राज "विनायक"
सहसपुर लोहारा,जिला - कबीरधाम(छत्तीसगढ़)

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चित्रा श्रीवास: कुंडलिया छंद - (होली)

होली फागुन लाय हे,खेलव संगी संग।
चारो कोती छाय हे,देखव आज उमंग।।
देखव आज उमंग, रंग हे पींयर नीला।
लाल हरा के संग, खेल लव माई पीला।।
भेदभाव ला छोड़, मया के बोलव बोली ।
रहे सदा सद्भभाव,,देश मा खेलव होली।।


2. होली हावय आज जी,खेलव मिलजुल संग।
बैर भाव ला भूल के,डार मया के रंग।।
डार मया के रंग, भरे पिचकारी लानव।
बने रहय सद्भाव, देश मा हरदम जानव।।
करव कभू ना क्लेश, बोल लव मीठी बोली
चढ़े प्रेम के रंग, साल मा आथे होली।।

छंदकार - चित्रा श्रीवास
बिलासपुर
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दोहा- मिलन मिलरिहा
गली गली रंगीन हे, होली मानत आज।
दिल्ली मा तो ख़ून के, रंग करत हे साज।।

दरुहा बर होली हवय, सिधवा पोठ डराय।
कोरोना हर दूर हे, गाँजा जेन चढ़ाय।।

दारु जेन हा पी डरे, कोरोना तिरयाय।
पेपर मिडिया हा घलो, राह नसा देखाय।।


नेता होली मा रमे, जनता पथरा खाय।
धधकत हे दिल्ली हमर, आगी कोन धराय।।

धो गुलाल के रंग ला, मुँह ले जल्दी तोर।
कोरोना हर चीन ले, आये जग मा सोर।।

मिलन मलरिहा
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 छंदकार-पोखन लाल जायसवाल

( १ ) दोहा-
रंग रंग के रंग हे,देवय  पानी रंग।
प्रेम रंग अइसन रँगव,मन हा जावय रंग।।

धर के रंग गुलाल ला,फगुआ बहुत उड़ाय।
नशा भाँग के जब चढ़य,फगुआ बने सुनाय।।

लाली लाली सेमरा,फूले परसा लाल।
किसिम किसिम के रंग ले,रँग दे चिक्कन गाल।।

प्रेम बिना संसार ए,लागय जी बदरंग।
होली मा नफरत जरय,रचय प्रेम के रंग।।

( २ ) मतगयंद

बाल सखा सब संग धरे अउ,हाँसत कूदत आवय टोली।
खोर गली घर ले निकले सब,घूमत घामत हे हमजोली।
मारय रंग भरे पिचका अउ,गाल मलै सब खेलय होली।
श्याम सखा सब आवत जानत,गोप गुवालन भागय खोली।

बाल सखा मन मोहन के सब,खेलय हाथ धरे पिचकारी।
गाल मलै अउ भाल मलै सब देखव,लेवत कोन उधारी।
गोप गुवालिन कूदत फाँदत भागत,देवत हे अउ गारी।
रास रचा सब नाच नचावत,देखन भावय कृष्ण मुरारी।

छंदकार- पोखन लाल जायसवाल पलारी; 
जिला- बलौदाबाजार भाटापारा छग

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 चौपई छंद (जयकारी छंद) - श्लेष चन्द्राकर

फागुन के बड़ नीक तिहार। होली देथे खुशी अपार।।
ये दिन खेलव रंग गुलाल। जुरिया के सब करव धमाल।।

गावव सुग्घर फागुन गीत। बाँटव सब मा मया पिरीत।।
ढोल नँगाड़ा बने बजाव। होली मा हुड़दंग मचाव।।

सबके मन मा भरव उमंग। पिचका भर-भर छींचव रंग।।
बैरी मन ला गला लगाव। भाईचारा आज दिखाव।।

सुग्घर होली परब रिवाज। जेकर ऊपर हम ला नाज।।
भारत के ये खास तिहार। आज मनावत हे संसार।।

पावन होली परब मनाव। छोटन ऊपर मया लुटाव।
बड़खा मन के लव आशीस। बैर भुलावव छोड़व रीस।।

होली मा ये रखहू याद। पानी झन होवय बर्बाद।।
तिलक लगाके परब मनाव। तन ले झटकुन रंग छुड़ाव।।

मर्यादा के रखहू ध्यान। ककरो झन करहू अपमान।।
झगरा के झन नौबत आय। ये सब कोनो ला नइ भाय।।

रंग खुशी के हरय प्रतीक। येकर टीका लगथे नीक।।
होली खेलव सबके संग। चुपरव सुग्घर हर्बल रंग।।

गोठ बताथे परब पुनीत। सत के होथे खच्चित जीत।।
जीतिस ये दिन हे प्रहलाद। हार होलिका गिस हे याद।।

जुरमिल खेलव रंग गुलाल। सबला राखव गा खुशहाल।।
कोनो ला झन देवव क्लेश । मानवता के दव संदेश।।

छंदकार - श्लेष चन्द्राकर,
पता - खैरा बाड़ा, गुड़रु पारा, महासमुन्द (छत्तीसगढ़)

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 छंद -मीता अग्रवाल 


होरी के तिहारे गोरी,हमरो  जब्बर टोली,
तंहूँ आजा मोर संग, नदियाँ के पार मा।
नैना तोरे हे कटारी ,संग तोरे संगवारी, 
संग संग  चले आबे, नीम तीर तार  मा।
फाग गाबो संग संग, उमड़े घन उमंग, 
पिरित के रंग चघे,तोरे फूले गार मा। 
रतिहा बारबो होरी,बजाबो नगाड़ा गोरी, 
रंग लाबे मया के वो, गली खोर खार मा।

जलहरण घनाक्षरी

पाहती मा जाड़ लागे, पुरवाई बहे लागे।
जुड़ जुड़ ताप सम,धरती झूमें मगन।
दिन बड़े रात छोटे ,मंझनिया ताप बढ़े,
बिकट मौसम मार,सुसतिहा होगें तन।
हुलसे नगारा सुन,फाग गाव झूम झूम,
नीक लागे पुरवाई, झूमत सनन सन।
बीत ये बरिस जाही, फागुन के अगड़ाई,
होरी संग बिदा होही,भरही उमंग मन।


छंदकार-डाॅ मीता अग्रवाल मधुर रायपुर छत्तीसगढ़

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जलहरण घनाक्षरी- महेंद्र कुमार बघेल
            (होली)
ठेठरी बरा चुरे हे,गजब मया घूरे हे।
बड़ नीक लगे हावै, तहूॅं खा ले नानकुन।
बने पाग धराय हे, ये अरसा रॅंधाय हे।
मुॅंहुॅं में जी पानी आगे,परस ले झटकुन।
सोहारी ल बेलत हे, तेल मा ढपेलत हे।
ये नवा खाई गहूं के, कान टेड़ तहूॅं सुन।
चिरहा सबो पड़े हे, फागुन बर अड़े हे।
खोज आज कुरता के, टोंड़का ला तुन तुन।

आनी बानी रूप साजे, तज के शरम लाजे।
टोली मन निकले हे ,नॅंगारा बजाय बर।
रंग मा बोथाॅंय हावे, सब भकवाॅंय हावे।
ओरी पारी जोहत हे,फाग गीत गाय बर।
बाजा बाजे ढम ढम, नाचें कूदें  छम छम ।
खोजत हे देवर ल,भौजी होलियाय बर।
ये भेद भाव भूल के,मितानी ल कबूल के।
गांव सकलाय हावे, तिहार मनाय बर।।

खेले बर होली संगी, तुकत हें हुड़दंगी।
अबीर गुलाल धर ,जावत हें घर घर।
परसा के फूल टोर, पानी मा उबाल घोर।
डारत हावय सब,पिचका मा भर भर।
किन किन जाड़ लागे,एती ओती घलो भागे।
पाछू पाछू कलेचुप, छिंचत सरर सर।
लइका ह जाने नहीं,बरज ल माने नहीं।
मजा लेत रंग डारे, फिलोत छरर छर।


छंदकार-महेंद्र कुमार बघेल डोंगरगांव,
जिला-राजनांदगांव

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छंद के छ के होली-दोहा गीत

"छंद के छ"के मंच मा, माते हावै फाग।
साधक सब जुरियाय हे,देवत हावै राग।

आज छंद परिवार मा,माते हवै धमाल।
सुधा सुनीता केंवरा,छीचत हवै गुलाल।
सुचि सुखमोती ज्योति शशि,चित्रा ला भुलवार।
आशा मीता मन लुका,करय रंग बौछार।
रामकली धानेश्वरी,भागे सबला फेक।
नीलम वासंती तिरत,लाने उनला छेक।
शोभा  संग तुलेश्वरी,गाये सुर ला पाग।
"छंद के छ"के मंच मा, माते हावै फाग----

बादल बरसत हे अबड़,धरे गीत अउ छंद।
ढोल बजाय दिलीप हा, मुस्की ढारे मंद।।
मोहन मनी मिनेश मिल,माटी मिलन महेंद्र।
गावत हे गाना गजब,मथुरा अनिल गजेंद्र।।
ईश्वर अजय अशोक सँग,हे ज्ञानू राजेश।
घोरे हावय रंग ला,भागय हेम सुरेश।।
मुचमुचाय जीतेन्द्र हा,भिनसरहा ले जाग।
"छंद के छ"के मंच मा, माते हावै फाग--------

दुर्गा दीपक दावना,सँग गजराज जुगेश।
श्लेष ललित सुखदेव ला,ताकय छुप कमलेश।
लीलेश्वर जगदीश सँग,बइहाये बलराम।
लहरे अउ कुलदीप के,करे चीट कस चाम।
पोखन तोरन मातगे,माते हे वीरेंद्र।
उमाकांत अउ अश्वनी,सँग माते वीजेंद्र।
सरा ररा सूर्या कहे,भिरभिर भिरभिर भाग।
"छंद के छ"के मंच मा,माते हावै फाग-----

पुरषोत्तम धनराज ला,खीचत हे संदीप।
कौशल रामकुमार मन,फुग्गा फेके छीप।
बोधन अउ चौहान के,रँगदिस गाल गुमान।
सत्यबोध राधे अतनु,भगवत हे परसान।।
राजकुमार मनोज हा,धिरही ला दौड़ाय।
अरुण निगम गुरुदेव हा,देखदेख मुस्काय।
सब साधक मा हे भरे,मया दया गुण त्याग।
"छंद के छ"के मंच मा,माते हावै फाग-----

#आगर कोरी पाँच हे,हमर छंद परिवार।
छूटे जिंखर नाम हे, उन सबला जोहार।#


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को कोरबा
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10 comments:

  1. बहुत सुग्घर होली ले सराबोर रचना । आप सबोझन ला होली के गाड़ा गाड़ा बधाई

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  2. गली गली रंगीन हे, होली मानत आज।
    दिल्ली मा तो ख़ून के, रंग करत हे साज।।

    दरुहा बर होली हवय, सिधवा पोठ डराय।
    कोरोना हर दूर हे, गाँजा जेन चढ़ाय।।

    दारु जेन हा पी डरे, कोरोना तिरयाय।
    पेपर मिडिया हा घलो, राह नसा देखाय।।


    नेता होली मा रमे, जनता पथरा खाय।
    धधकत हे दिल्ली हमर, आगी कोन धराय।।

    धो गुलाल के रंग ला, मुँह ले जल्दी तोर।
    कोरोना हर चीन ले, आये जग मा सोर।।

    मिलन मलरिहा

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  3. बड़ सुग्घर होली संकलन

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  4. सुग्घर विशेषांक

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  5. बहुत शानदार संकलन, सब ला होली के बहुत बधाई

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  6. शानदार छंदबद्ध रचना मन के संकलन हे।जम्मों छंदकार मन ला हार्दिक बधाई

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  7. जम्मो झन ला बहुत बहुत बधाई

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  8. जम्मो झन ला बहुत बहुत बधाई

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  9. अबड़ सुघ्घर संकलन ।सबो झन ला बहुत-बहुत बधाई

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