गुरु पूर्णिमा
मोरो कर दे गुरु उद्धार, आप ह सबके पालनहार।
तब चलथे जम्मो संसार, होथे जिनगी बेड़ा पार।।
बदले हस जीए के ढंग, सबला ले हस अपने संग।
तैही सब के प्राणाधार, तब ले होवत नैया पार।।
सजथे सुग्घर जिनगी साज, खुशी ल भर के लाथे राज।
सँग-सँगवारी करथे बात, हँसी-खुशी के इहि सौगात।।
जे हा जपथे गुरु के नाम, हर दिन होथे उँखरे काम।
वो भला-बुरा करथे भेद, काम-क्रोध के करथे छेद।।
विनती करबो गुरु के आज,खुलही भीतर दिल के राज।
आत्म ज्ञान के होही बोध, अड़बड़ करथे गुरुजी शोध।।
छंद-बंध के बहथे धार, अरुण निगम गुरुजी आधार।।
चेला मन ल बताथे सार, ओहा करत हमर उपकार।।
साधक मन बर मया दुलार, छंद सिखैय्या बर उपहार।
फूल हार पहिराबो साथ, चरणन धूल लगाबो माथ।
इही हमर बर खेती खार, बीज छंद ला बोअन सार।
एहा जही बीज भंडार, कंपनी ह करही उपचार।।
छंद छ के करथँव जोहार, सुग्घर रहे निगम परिवार।
मिले बधाई हा भरमार, सुग्घर देवत छंद संस्कार।।
सुधि बुधि गुणि मन गुरुवर खास, करथँव मैंहा सब विश्वास।
लिखथँव महुँ हा बनके दास, बीतत हाबे सावन मास।।
गुरु जी के मँय करँव बखान, सूझ - बूझ ले बढ़थे शान।
गुरतुर बोली के पहिचान, हाथ जोड़ करथँव गुणगान।।
धर्मेंद्र कुमार श्रवण शिक्षाश्री
बालोद
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गुरु
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शब्द-शब्द मा जेकर होथे,
सबो शास्त्र के सार।
तीन देव कस सँउहे गुरु के,
महिमा अगम अपार।।
जेहा चेला के हिरदे के,हर लेथे अज्ञान।
बरत रथे मन के मंदिर मा, जोत अखंड समान।।
मातु-पिता कस दया-मया के,जे छलकत भंडार।
तीन देव कस सँउहे गुरु के,महिमा अगम अपार।।
कइसे जीना हे दुनिया मा, जेन बताथे मर्म।
फोर-फोर समझाथे जे हा, का हे मानव धर्म।
अँगरी धर सद राह चलाथे, करथे बड़ उपकार।
तीन देव कस सँउहे गुरु के,महिमा अगम अपार।
मिलै नहीं सिरतो कोनो ला, कभू बिना गुरु ज्ञान।
गुरु के चरण वंदना करथें, संत सिद्ध भगवान।
गुरु के किरपा बिन साधक के, नइ होवय बढ़वार।
तीन देव कस सँउहे गुरु के,महिमा अगम अपार।।
टूटी-फूटी गुन गावत हँव, अड़हा चोवा राम।
पूज्यनीय गुरुदेव निगम के, सुमर-सुमर के नाम।
पाये हाववँ मैं जेकर ले, छंद- सुधा रसधार।
तीन देव कस सँउहे गुरु के,महिमा अगम अपार।।
चोवा राम वर्मा 'बादल '
हथबंद, छत्तीसगढ़
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छंद के छ महकत फुलवारी, फूल खिले सुख लाली।
अरुण निगम गुरु पेड़ बने हे, हम ओखर अन डाली।।
रंग बिरंगी छंद फूलवा, ये भुइँया के कोरा मा।
शब्द ज्ञान के भरय खजाना, छत्तीसगढ़ कटोरा मा।।
जतन करिन महतारी भाखा, बन के हम सब माली।
छंद के छ महकत फुलवारी, फूल खिले सुख लाली।।1
गाँठ बाँध के छंद लिखत हन, हम तो गोठ सियानी।
गाँव-गाँव अउ ठाँव-ठाँव मा, गूँजय छंद जुबानी।।
पुरखा सपना पूरा करबो, आज नही तो काली।
छंद के छ महकत फुलवारी, फूल खिले सुख लाली।।2
जोड़ रखे हे छोट बड़े ला, छंद मया के बानी।
सुमता समता के बिरवा ला, सींचत हन दे पानी।।
छत्तीसगढ़ के छंद छाँव ले, आवय जग खुशहाली।
छंद के छ महकत फुलवारी, फूल खिले सुख लाली।।3
छंद के छ परिवार बने हे, छत्तीसगढ़ के माटी।
दया मया सुख दुख मिल बाँटय, सुग्घर हे परिपाटी।।
सकलाये हन साधक गुरु जन, मिलन परब दीवाली।
छंद के छ महकत फुलवारी, फूल खिले सुख लाली।।4
छंदकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
साधक: सत्र 2
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हावय गुरु के जन्मदिन, का देवँव उपहार।
देने वाला हा दिये, मया भरे संसार।।
मया भरे संसार, करत अरजी हम हावन।
गुरुवर ले आशीष, सदा दिन हम सब पावन।।
सुवासिता गुरु चाँद, गगन ला छूते जावय।
हर पल रहँय निरोग, कामना प्रभु से हावय।।
सुवासिता
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[7/29, 6:34 AM] नारायण वर्मा बेमेतरा: *दोहा-गुरू वंदना*
करँव वंदना आरती, मन के दियना बार।
हरव मोर अज्ञानता, देवव ज्ञान फुहार।।
शरण परे हँव तोर मँय, हाबँव निचट गँवार।
हाथ मूड़ मा राख दे, भव ले पार उतार।।
बानी ले अमरित झरै, करथे बहुत दुलार।
दिल के सरल उदार बड़, हाबय गुरू हमार।।
दूधारी तलवार कस, लगथे ये संसार।
ज्ञान रतन हा सार हे, बाकी माया झार।।
मोर बुद्धि हे नानकुन, महिमा तोर अपार।
टूटी फूटी गात हँव, दुरगुन सबो बिसार।।
हाड़ माँस के देह मा, अइसन दिव्य विचार।
गुरू तोर पइँया परँव, कर मोरो उद्धार।।
🙏🙏🙏🙏
नारायण प्रसाद वर्मा *चंदन*
ढ़ाबा-भिंभौरी, बेमेतरा छग
7354958844
[7/29, 8:00 AM] अमृतदास साहू 12: सार छंद *गुरू महिमा*
गुरु के महिमा अड़बड़ भारी,होथें अवघड़ दानी।
शक्ति अतक के करयँ हंस जस,विरल दूध ले पानी।
कठिन तपस्या करके अड़बड़,शक्तिवान बन जाथें।
अपन तेज अउ तपो शक्ति ले, उजियारा बगराथें।
कहलाथें जग मा येमन हा,ऋषि मुनि ध्यानी ज्ञानी।
शक्ति अतक के करयँ हंस जस,विरल दूध ले पानी।
रहिथें गुरु मन सहनशील अउ,दृढ़ निश्चय विश्वासी।
दुख पीरा चिंता हर लेथें,दूर भगाय उदासी।
सूरज कस चमके सूरत हा,अद्भुत अनुपम बानी।
शक्ति अतक के करयँ हंस जस,विरल दूध ले पानी।
विनम्रता के आवँय मूरत,सत के हरयँ पुजारी।
सादा जीवन जीथें सुग्घर,होथें गुरु बलिहारी।
करव सदा सदगुरु के संगत,होथें बड़ वरदानी।
शक्ति अतक के करयँ हंस जस, विरल दूध ले पानी।
अमृत दास साहू
ग्राम कलकसा, डोंगरगढ़
[7/29, 8:12 AM] आशा देशमुख: गुरुपूर्णिमा के पावन अवसर मा मोर काव्य गुरु मन ला समर्पित काव्य पुष्प
गुरु चालीसा
दोहा
करत हवँव गुरु वंदना, चरणन माथ नँवाय ।।
भाव भक्ति मन मा धरे , श्रद्धा फूल चढ़ाय।।
सदा रहय गुरु के कृपा,अतकी विनती मोर।
अंतस रहय अँजोर अउ,भागे अवगुण चोर।।
चौपाई
गुरु ब्रह्मा अउ विष्णु महेशा। गुरु हे पहिली पूर्ण अशेषा।।
बरन बरन हे गुरु के वंदन।आखर आखर बनथे चंदन।।
गुरु ला जानव सुरुज समाना। गुरु आवय जी ज्ञान खजाना।।
गुरु जइसे नइहे उपकारी।गुरु के महिमा सब ले भारी।।
गुरु सउँहत भगवान कहाये। गुण अवगुण के भेद बताये।।
सात समुंदर बनही स्याही।गुरु गुण बर कमती पड़ जाही।।
गुरु के बल ला ईश्वर जाने। तीन लोक महिमा पहिचाने।।
गुरुवर सुरुज तमस हर लेथे। उजियारा जग मा भर देथे।।
जब जब छायअमावस कारी। गुरु पूनम लावय उजियारी।।
गुरु पूनम के अबड़ बधाई।माथ नँवा लव बहिनी भाई।।
शिष्य विवेकानंद कहाये।परमहंस के मान बढ़ाये।।
द्रोण शिष्य हें पांडव कौरव ।अर्जुन बनगे गुरु के गौरव।।
त्याग तपस्या मिहनत पूजा।गुरु ले बढ़के नइहे दूजा।।
वेद ग्रंथ हे गुरु के बानी।पंडित मुल्ला ग्रंथी ज्ञानी।।
ज्ञान खजाना जेन लुटाए।जतका बाँटय बाढ़त जाए।।
गुरु के वचन परम हितकारी।मिट जाथे मन के बीमारी।।
जेखर बल मा हे इंद्रासन।बलि प्रहलाद करे हें शासन।।
ये जग गुरु बिन ज्ञान न पाये।गुरु गाथा हर युग हे गाये।।
सत्य पुरुष गुरु घासी बाबा। गुरु हे काशी गुरु हे काबा।।
देवै ताल कबीरा साखी।
उड़ जावय मन भ्रम के पाखी।।
गुरु के जेन कृपा ला पाथे। पथरा तक पारस बन जाथे।।
माटी हा बन जावय गगरी। बूँद घलो हा लहुटय सगरी।।
महतारी पहली गुरु होथे । लइका ला संस्कार सिखोथे।।
देवय जे अँचरा के छइयाँ।दूसर हावय धरती मइयाँ।।
जाति धरम से ऊपर हावय।डूबत ला गुरु पार लगावय।।
आदि अनादिक अगम अनन्ता।जाप करयँ ऋषि मुनि अउ संता।।
गुरु के महिमा कतिक बखानौं। ज्योति रूप के काया जानौं।।
बम्हरी तक बन जाथे चंदन। घेरी बेरी पउँरी वंदन।।
हाड़ माँस माटी के लोंदी।बानी पाके बोले कोंदी।।
पथरा के बदले हे सूरत। गढ़थे छिनी हथौड़ी मूरत।।
भुइयाँ पानी पवन अकाशा।कण कण में विज्ञान प्रकाशा।।
समय घलो बड़ देथे शिक्षा।रतन मुकुट तक माँगे भिक्षा।।
अमर हवैं रैदास कबीरा। निर्गुण सगुण बसावय मीरा।।
सातों सुर मन कंठ बिराजे। तानसेन के सुर धुन बाजे।।
कण कण मा गुरु तत्व समाये।सबो जिनिस कुछु बात सिखाये।।
गोठ करत हे सूपा चन्नी।कचरा ला छाने हे छन्नी।।
गुरु के दर हा सच्चा दर हे। मुड़ी कटाये नाम अमर हे।।
एकलव्य के दान अँगूठा। अइसन हे गुरु भक्ति अनूठा।।
श्रद्धा से गुरु पूजा करलव। ज्ञान बुद्धि से झोली भरलव।
जे निश्छल गुरु शरण म जावै।।अष्ट सिद्धि नवनिधि जस पावै।।
गुरु चालीसा जे पढ़े,ओखर जागे भाग।
दुख दारिद अज्ञानता ,ले लेथे बैराग।।
आशा देशमुख
एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा
[7/29, 8:29 AM] भागवत प्रसाद, डमरू बलौदा बाजार 15: अरुण निगम गुरुदेव हमर हें, खूब छंद विद्वान।
साधक मन ला देवत हावँय, जम्मो छंद विधान।।
सहज-सरल व्यक्तित्व धनी हें,उत्तम हे व्यवहार।
मिलनसार अरु मृदुभाषी हें, सुंदर शील विचार।।
जन -मानस के हावँय प्रेमी, मनखे हवँय सुजान।
अरुण निगम गुरुदेव हमर हें,खूब छंद विद्वान।।
करौं कामना शुभ भविष्य के, बाढ़य साल हजार।
हाँसत- मुस्कावत दिन गुजरे, सुख के हो गुलजार।।
उर विराट धर बनथें छोटे, ये ऊँखर पहिचान।
अरुण निगम गुरुदेव हमर हें, खूब छंद विद्वान।।
भागवत प्रसाद चन्द्राकर🙏🙏🙏🙏🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹
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गुरु चरणन मा जेहर रहिथे, वो खुशहाल हवै |
ओखर जिनगी ले दुरिहा गा, सब जंजाल हवै ||
कतको घपटे अँधियारी हा, ज्ञान अँजोर करै ||
दिव्य ज्ञान ले पुंज प्रकाशित, सुग्घर भोर करै ||
सही गलत पहिचान करावय, शिक्षा दान करै |
तीनों लोक भुवन चौदा मा, थाथी ज्ञान भरै ||
गुरु के महिमा के दुनिया मा, अगम अनन्त हवै |
गुरु चरणन मा तन - मन अर्पित, मूड़ी रोज नवै ||
भाई कोनो कभू कपट छल, गुरु ले झन करहू |
ज्ञान बताये अमरित बानी, हिरदै मा धरहू ||
काम अबड़ आथे जिनगी मा, गुरु के ज्ञान दिए |
नाम तोर होवत दुनिया मा, वो पहिचान दिए ||
ज्ञानु
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[जग के खेवनहार गुरुजी ।
सबके पालनहार गुरुजी ।
जनम जनम के कालिख धोकर
ऐसे करे निखार गुरुजी ।
माया बीज सदा को नाशै
है मेरे करतार गुरुजी ।
करुणा कृपा सदा बरसाते
प्रेम भरे पुचकार गुरुजी ।
सत अरु असत दिखाएं हंसा
हर जीवन का सार गुरुजी ।
[7/29, 11:06 AM] गुमान साहू: जलहरण घनाक्षरी
।। गुरू महिमा।।
गुरू गुण के खदान, गुरू देथे ज्ञान दान, पाके ज्ञान सब झन, जिनगी सँवार लव।
अज्ञान के अंधियार, देथे गुरू हर टार, ज्ञान के प्रकाश गुरू, सब उजियार लव।
पथरा ला सोना करे,गुरू वो पारस हरे, आके शरण इँखर, जिनगी उबार लव।
सच-झूठ भला-बुरा, भेद बतावय पूरा, जीवन सफर बर, रस्ता(रद्दा) चतवार लव।।
-गुमान प्रसाद साहू
समोदा (महानदी)
साधक- सत्र-6
[7/29, 11:09 AM] Sumitra कामड़िया 15: दोहा-
गुरुवर संत सुजान है , गुरुवर ज्ञान प्रकाश।
गुरुवर ग्रंथ कुरान है, गुरुवर से आकाश। ।
सुमित्रा शिशिर
[7/29, 11:09 AM] Sumitra कामड़िया 15: दोह-
गुरुवर के वंदन करव, हे गुरु गुन के खान।
अग्यानी ला ज्ञान दे, गुरुवर हवे महान।।
मिलथे गुरुवर भाग ले, खोजत फिरथे लोग।
सँउहत मिलगे गुरु दरस, बने रहिस सँजोग।।
भीतर मधुरस मीठ हे, ऊपर हवय कठोर।
कोवँर मन भीतर रखय, अउ देवय बड़ जोर।।
देवय दीक्षा ज्ञान के, गरब गुमान ल छोड़।
रद्दा सहीं दिखाय के, टूटे मन दे जोड़।।
ज्ञान उजाला बाँट के, हृदय रखय पट खोल।
भीतर उपजे आस ला, लेवत रहय टटोल।।
कण-कण गुरु के बास हे, गुरुवर हे भगवान।
पीरा हर हीरा करय, गुरुवर हे धनवान।।
मात पिता हे गुरु हमर, येला नवाँव शीश।
इँकर चरण मा हे सदा, अबड़ अकन आशीष।।
सुमित्रा कामड़िया शिशिर "
[7/29, 11:09 AM] Sumitra कामड़िया 15: चरण कमल वंदन करूं, गुरुवर आप महान।
मुझ अनगढ़ को गढ़ दिया, गुरुवर श्री भगवान। ।
भाव पुष्प अर्पित करूं, भरकर मन उल्लास।
दीजै आशीर्वाद मम, याद रखे इतिहास। ।
सादर प्रणाम गुरुवर सदा आशीर्वाद बनाए रखिएगा 🌹🌹🙏🙏
[7/29, 11:09 AM] विजेन्द्र: गुरु
करथे जिनगी ला उजियार I
माथ नवावँव बारंबार II
कतका हे गुरु के उपकार I
उही लगाथे भव के पार II
बाँटय चेला मन ला ज्ञान I
मूरख तको बनय विद्वान II
जिनगी सुग्घर वो सिरजाय I
नेक राह ला धरव बताय II
खुलय ज्ञान के सबो कपाट I
दमके सुग्घर उँकर ललाट II
गुरुवर के जे मानय बात I
बइरी मन खा जावय मात II
अड़चन अलहन देवय टार I
बोली-भाखा अमरित धार II
ज्ञान-दान के वोहर खान I
गुरु ला देवव गा सम्मान II
गुरु ले बड़का हावय कोन I
पथरा ला कर दय वो सोन II
हरथे मन के सबो विकार I
जिनगी सुग्घर देय सँवार II
विजेंद्र
[7/29, 11:57 AM] बोधन जी: गुरु वंदना - मत्तगयंद सवैया
श्री गुरु वंदन पाँव पखारत साँझ-बिहान सदा गुण गावौं।
हे गुरुदेव कृपा बरसादव ये जग मा मँय नाम कमावौं।।
ज्ञान बिना अँधियार सबो तुँहरे बिन थाह कहाँ मँय पावौं।
राह दिखा सद् मारग के मँय ज्ञान अँजोर हिया बगरावौं।।
मातु-पिता गुरुदेव तहीं अँगरी धरके लिखना सिखवाए।
आखर-आखर जोरत-जोरत छंद सुजान तहींच बनाए।।
सोझ चलौं सद् मारग मा अइसे बढ़िया गुरु ज्ञान बताए।
आज उतार सकौं करजा नइ, हे गुरुदेव कृपा बरसाए।।
पार करौं भवसागर ले पतवार धरौ गुरुदेव उबारौ।
ये जग भार सहौं कतका अब जीव बियाकुल आवव तारौ।।
कोन इहाँ रखवार हवै गुरुदेव सम्हालौ काज सँवारौ।
हे विनती गुरुजी सुनले गलती कछु होय हमार बिसारौ।।
रचना :-
बोधन राम निषाद
[7/29, 6:09 PM] +91 89639 56080: दोहे
गुरु महिमा
अड़बड़ मया दुलार दय, हिरदे मा रख लेव।
राखय सब ला बाँध के, अरुण निगम गुरुदेव।।
सुरुज देव के सारथी, बन उजियारा लाय।
वइसन ही गुरुदेव हा, दया-मया बगराय।।
बरगद के जस पेड़ जी, देथे सुग्घर छाँव।
गुरुवर के आशीष हा, हावय शीतल ठाँव।।
छंद के छ परिवार ला, सींचय पिता समान।
राखय सबके ध्यान जी, अइसन हे अवदान।।
अनुशासित संस्कार दय, जइसे छंद बँधाय।
अंतस करय उजार गा, अवगुण सब मिट जाय।।
उषाकिरण निर्मलकर
मगरलोड
धमतरी(छत्तीसगढ़)