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Wednesday, September 30, 2026

बेटी के बिदा-लावणी छंद

 बेटी के बिदा-लावणी छंद


आँखी भर आथे जी सबके, बेटी करे बिदाई मा ।

फूटय जइसे बाँध नदी के, बरखा के बरसाई मा ।।


सोन चिरैया होथे बेटी, घर-अँगना कुरिया चहके।

बगिया के सुग्घर गोंदा कस, महर-महर जिनगी महके।

उजियार रहय चंदा जइसे, तोर हँसी के दियना ले।

सबके पीरा मा चुचुवावय, आँसू तोरे नयना ले।

जगमग राहय अँगना खोली, दिन भर तोर सफाई मा ।।

आँखी भर आथे जी सबके, बेटी करे बिदाई मा।।


शिक्षा सुसंस्कार के पहिरय, बेटी हर सुग्घर गहना।

सबो क्षेत्र मा आघू बढ़थे, मिहनत तप के का कहना ।

जिम्मेदारी सबो उठाथे, धार नदी कस बोहाए।

पिघले लोहा कस ढल जाथे, जइसन औजार बनाए ।

काया कंचन मन हे चंदन, उजरावय घिसाई मा ।।

आँखी भर आथे जी सबके, बेटी करे बिदाई मा।।


सास-ससुर के सेवा करके, दू कुल के मान बढ़ाबे।

मिठबोली व्यवहार सरल रख, माया ममता ला पाबे।

नेह नता ला जोरे रहिबे, परिवार मया के बाढ़य।

कलहा के उड़ जाय चिरैया,घर भर खुशहाली माढ़य।

सुग्घर महकय घर गिरहस्ती, सुनता के ममहाई मा ।।

आँखी भर आथे जी सबके, बेटी करे बिदाई मा।।


डॉ. दीक्षा चौबे,दुर्ग छत्तीसगढ़

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