काँसी फूल-सरसी छंद
सादा सादा काँसी फुलवा, जिवरा ला हर्षाय।
छटा धरा के लगे सुहावना, जब काँसी मुस्काय।।
हरियर धरती सादा फूल मा, सज हो जाथे खास।
मनुष देव अउ पितर घलो ला, आये फुलवा रास।
देत बिदाई बरसा ऋतु ला, शरद मास परघाय।
सादा सादा काँसी फुलवा, जिवरा ला हर्षाय।।
चारो मूड़ा छाये दिखथे, स्वेत काँस के फूल।
हाथ हलाके नाचे लगथे, पुरवइया मा झूल।।
दिखे गगन कस दिन भर धरती, बिहना बरफ जनाय।
सादा सादा काँसी फुलवा, जिवरा ला हर्षाय।।
तना फूल जड़ सब काँसी के, आथे अड़बड़ काम।
माटी ला बोहान देय नइ, पके घास दै दाम।।
डोरी बहरी खटिया मचिया, जाने तौन बनाय।
सादा सादा काँसी फुलवा, जिवरा ला हर्षाय।।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)
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