कुंडलियाँ छंद-
डिजिटल डिजिटल बोल के, पीटे हन बड़ ढोल।
डिजिटल फोटो वीडियो, अब खोलत हे पोल।।
अब खोलत हे पोल, डहर बन जन सिस्टम के।
उठत देख आवाज, गजब नेता जन बमके।।
फोन कैमरा हाथ, धरे हावँय सब हरपल।
बनत जात हे आज, फाँस टोंटा के डिजिटल।।
खपही एथेनॉल बर, धान कार्न कुसियार।
कम होही खाद्यान हा, मचबे करही रार।।
मचबे करही रार, रोत दिखही घर हाँडी।
पहली हावय पेट, तेखरे पाछू गाड़ी।।
आलू बनही सोन, पेट का माला जपही।
नव जुग मा खाद्यान, कारखाना मा खपही।।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)
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