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Saturday, September 19, 2026

आनलेन पेमेंट-रोला छंद

 आनलेन पेमेंट-रोला छंद


आनलेन के दौर, हवै सब झन हा कहिथन।

फेर बखत ला देख, जुगत मा सबझन रहिथन।।

आनलेन पेमेंट, लेत हें पसरा ठेला।

फेर आँख देखाय, जेन ला चाही लेना।।


अफसर बाबू सेठ, पुलिस नेता वैपारी।

माँगे नकदी नोट, कहत झन करबे चारी।।

भरे जेन के जेब, उही हा जेब टटोले।

उँखरे ले हे काम, कोन फोकट मुँह खोले।।


लुका लुका के नोट, धरत हावैं गट्ठी मा।

आनलेन पेमेंट, कहाँ चलथे भठ्ठी मा।।

मांगै नगदी नोट, बार भठ्ठी मुँह मंगा।

सरकारी हे छूट, लूट हौवै बड़ चंगा।।


सट्टा पट्टी खेल, चलत हे चारो कोती।

विज्ञापन के धूम, होत हे जस सुरहोती।

मिले हवै सरकार, खिलाड़ी अउ अभिनेता।

जनता ला बहकाँय, बताके विश्व विजेता।।


मुँहफारे घुसघोर, माँगथे नकदी रुपिया।

आनलेन पेमेंट, लेय ये कइसे खुफिया?

देखे जभ्भे नोट, तभे कारज निपटाये।

आनलेन के नाम, सुनत आँखी देखाये।।


आनलेन पेपेंट, देन कइसे छट्ठी मा।

आनलेन पेपेंट, देन कइसे भट्ठी मा।।

आनलेन मा बोल, देन कइसे नजराना।

आनलेन मा काज, करे नइ  कोरट थाना।।


रोवत लइका लोग, मानही का बिन पइसा।

कइसे करहीं काम, जौन बर आखर भइसा।।

छोड़वाय बर संग, काय अब करना पड़ही।

आनलेन पेमेंट, बता का आघू बढ़ही।।


उद्योगी के हाथ, हवै पावर अउ टॉवर।

रोवय धोवय नेट, इहाँ चौबीसों ऑवर।।

निच्चट हें इस्पीड, फोर जी फाइभ जी के।

सब झन हवन गुलाम, नेट के नौटंकी के।


डिजिटल होही देश, बता कइसे गा भइया।

पर के कुकरी गार, संग दूसर सेवइया।।

नेटजाल सरकार, बुने अउ देवैं सुविधा।

सोसल सेवा होय, तभे दुरिहाही दुविधा।।


आनलेन पेमेंट, कहाँ देथें लेथें सब।

तोर मोर बड़ छोट, यहू मा मिलथे देखब।।

ठगजग तक हें खूब, देख के काँपे चोला।

बढ़िया हो हर काम, तभे तो भाही मोला।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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डिजिटल इंडिया-कुंडलियाँ छंद


डिजिटल इंडिया के अभी, आवत हवे रुझान।

यूपीआई बउरबे, ता अब देबे दान।।

ता अब देबे दान, गए अब फ्री के सेवा।

आदत बनवा दीस, सबे ला खवा कलेवा।।

आघू होही काय, कहे नइ जाये कल।

रिकिम रिकिम के चार्ज, लगत हे लुटही डिजिटल।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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कुंडलियाँ छंद-डिजिटल दौर मा


डिजिटल इंडिया हा गजब, मारत हावै जोर।

तुरते होवय काम सब, हाँसे रोवँय चोर।।

हाँसे रोवँय चोर, खबर फइले आगी कस।

पाय बने मन मान, डरे मनखें दागी कस।।

बड़े होय या छोट, मिलत हावँय सबला बल।

सबके मन के बात, बतावय बेरा डिजिटल।।


हावी डिजिटल दौर हे, चारो कोती देख।

कई ऊँचाई ले गिरे, फिरे कई के लेख।।

फिरे कई के लेख, कई पछ्तावत तक हें।

घर लागे ना रोड, सबे कोती बकबक हें।।

करनी करही काय, कोन जन बेरा भावी।

सोच समझ बतियाव, हवै डिजिटल युग हावी।।


राखत हवै रिकार्ड ला, डिजिटल अपन मेर।

गुररावत हे साथ पा,  बकरी तक बन शेर।।

बकरी तक बन शेर, आज नाचत हे बन ठन।

चारी चुगली झूठ, आय आघू मन दनदन।।

सबके खोले पोल, देख कतको हें काँखत।

डिजिटल बेर रिकार्ड, सबे के हावय राखत।।


दिखगिस डिजिटल मा चरित, कइसन हावय कोन।

लोहा आये कोन हा, आय कोन हा सोन।।

आय कोन हा सोन, जान जावत हें दुनिया।

झूठ मूठ हे शोर, असल मा काँपे मुनिया।।

देखावा अउ झूठ, इही मा सबझन टिकगिस।

राजा प्रजा समेत, सबें के नीयत दिखगिस।।


सबझन इस्टाग्राम मा, करत हवँय बकलोल।

दुनिया ला बतलात हे, अपन जिया के बोल।।

अपन जिया के बोल, सबें झन हावैं बोलत।

कई नाच देखाय, कई झन हें विष घोलत।।

होही कलो हिसाब, बने आजे भर झन बन।

काखर का हे काम, गड़ाये आँखी सबझन।।


डिजिटल के बाजा बजिस, होगिस बत्ती गोल।

छोट लगत हे अउ ना बड़े, सबें कहें दिल खोल।।

सबें कहें दिल खोल, जिया मा जउने हावँय।

मन मुताबित गीत, सबें झन कइसे गावँय।।

पके झूठ सुन कान, करे जिवरा बड़ तलमल।

बनगे हे हथियार, आज ये बेरा डिजिटल।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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