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Saturday, September 19, 2026

किरदार-हरिगीतिका छंद

 किरदार-हरिगीतिका छंद


कखरो इशारा मा नहीं अउ ना कहूँ जंजाल मा।

जिनगी सदा नाँचत बिते कर्मा ददरिया ताल मा।।

टीका लगा कुंकुंम सही माटी ला सबदिन माथ मा।

कलगी लगा पागा चढ़ा थिरकँव सँगी मन साथ मा।।


बोझा मुड़ी मा बोह के संस्कृति परब संस्कार के।

सबके जिया मा घर बनावँव काम आवँव चार के।।

आँसू कभू डर दुक्ख मा कखरो नयन ले झन झरे।

विनती करँव कर जोर के सुख शांति सत सब घर फरे।।


पंथी सुआ कर्मा ददरिया पंडवानी भोजली।

भगवत रमायण रामधुनि गौरा गुँजय गाँवे गली।।

मनखे जुरें बिसराय बर दुख नाच गम्मत संग मा।

देखत हबर जायें खुशी सब जायँ रच सुख रंग मा।।



मधुरस झरे हर मंच मा जादू चले संगीत के।

गाना बजाना ले तको शिक्षा मिले नित नीत के।।

छोटे बने सीखत रहँव किरपा करे करतार हर।

जिनगी रहे या मंच कोई लौं निभा किरदार हर।।



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)




फेक अकड़ गुमान(किरदार)- कुंडलियाँ


धन दौलत मद जोर झन, हक ला कखरो मार।

बने काम करते रहा, निभा अपन किरदार।।

निभा अपन किरदार, जमाना जुगजुग जाने।

बाँचे रहे जमीर, मनुष कस सब झन माने।।

हरस मनुष के जात, मनुष बर झन गड्ढा खन।

फेक अकड़ गुमान, रहे नइ सबदिन तन धन।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


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