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Saturday, February 3, 2018

रोला छंद - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

रितु बसंत -

गावय  गीत बसंत,हवा मा नाचे डारा।
फगुवा राग सुनाय,मगन हे पारा पारा।
करे  पपीहा  शोर,कोयली  कुहकी पारे।
रितु बसंत जब आय,मया के दीया बारे।

बखरी  बारी   ओढ़,खड़े  हे  लुगरा  हरियर।
नँदिया नरवा नीर,दिखत हे फरियर फरियर।
बिहना जाड़ जनाय,बियापे मँझनी बेरा।
अमली बोइर  जाम,तीर लइका के डेरा।

रंग  रंग  के साग,कढ़ाई  मा ममहाये।
दार भात हे तात,बने उपरहा खवाये।
धनिया  मिरी पताल,नून बासी मिल जाये।
खावय अँगरी चाँट,जिया जाँ घलो अघाये।

हाँस हाँस के खेल,लोग लइका सब खेले।
मटर  चिरौंजी  चार,टोर  के मनभर झेले।
आमा  बिरवा   डार, बाँध  के  झूला  झूलय।
किसम किसम के फूल,बाग बारी मा फूलय।

धनिया चना मसूर,देख के मन भर जावय।
खन खन करे रहेर,हवा सँग नाचय गावय।
हवे  उतेरा  खार, लाखड़ी  सरसो अरसी।
घाम घरी बर देख,बने कुम्हरा घर करसी।

मुसुर मुसुर मुस्काय,लाल परसा हा फुलके।
सेम्हर हाथ हलाय,मगन हो मन भर झुलके।
पीयँर पीयँर  पात,झरे पुरवा जब आये।
तन मन बड़ हर्षाय,गीत पंछी जब गाये।


रचनाकार - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा) छत्तीसगढ़ 

27 comments:

  1. रोला सुग्हर छंद, गोप - गोपी मन गाथें
    आथे बड आनंद, लेवना - मन भर खाथें।
    मुरली बाजय रोज, जमो झन सकला जाथें
    नवा राग के खोज, सबो झन खुशी मनाथें।

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  2. बहुत बढ़िया रोला भईया जी

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  3. बहुत बढ़िया रोला भईया जी

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  4. वाहःहः भाई जितेंन्द्र सुघ्घर रोला छंद

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  5. वाह वाह अति सुंदर।जितेंद्र जी के मनभावन रोला।हार्दिकबधाई।

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  6. सुघ्घर रोला छंद लिखे हव जितेन्द्र भाई अइसे लागत हावय बसंत हवा मा डारा पाना नाचत हावय बहुत बढ़ियाँ

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  7. आप सबो के पँउरी म बारम्बार प्रणाम

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  8. शानदार ऋतु वर्णन जितेंद्र भाई लाजवाब

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  9. शानदार ऋतु वर्णन जितेंद्र भाई लाजवाब

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  10. बहुत बढ़िया जितेंद्र भाई

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  11. बहुत सुग्घर रचना सर।सादर बधाई

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  12. बहुत सुग्घर,रोला छंद हे,भैया जी।बधाई अउ शुभकामनाएं।

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  13. शानदार सृजन सर।सादर बधाई

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  14. शानदार सृजन सर।सादर बधाई

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  15. लाजवाब सृजन सर जी।

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