Followers

Monday, October 28, 2019

रूपमाला छंद - श्री सुखदेव सिंह''अहिलेश्वर''


रूपमाला छंद - श्री सुखदेव सिंह''अहिलेश्वर''

एक दीया बार

नइ रहिस हे पाप कोनो नइ रहिस हे श्राप।
पर रहिस आजा बबा सिरतो अँगूठा छाप।
तोर गुरु-आशीष अक्षर-ज्ञान के उपहार।
पाठशाला म घलो तँय एक दीया बार।

आज सुख मा हे ग भैया तोर घर परिवार।
मान धन हे पद प्रतिष्ठा हे खुशी उजियार।
आज हे जनतंत्र अवसर एक सम अधिकार।
देश के कानून बर तँय एक दीया बार।

भेद भ्रम के जंक जाला छाय होही झार।
साल भर अच्छा बुरा का कर्म हे निरवार?
मन बचन हे कर्म आदत आचरण व्यवहार।
तोर मन अंतस घलो मा एक दीया बार।

मौसमी फल साग-भाजी दाल-रोटी भात।
खात हस तँय पेट भर के रोज ताते-तात।
पालथे सगरो जगत ला खेत पालनहार।
चल सखा खेती घलो बर एक दीया बार।

रोज जग के जीव नेमत देत हे परकाश।
एक दिन अड़चन घलो मा लै नही अवकाश।
भेद भ्रम "मँय" "मोर" नइहे देख ले संसार।
सीख देवइया सुरुज बर एक दीया बार।

मेहनत मा थक जथे जब मूड़ माथा पाँव।
देत हे आराम खातिर ठाँव छानी छाँव।
जे पता मा तोर वोटर कार्ड अउ आधार।
द्वार मा कुरिया घलो के एक दीया बार।

तोर भर बर घोर देइस जेन हा अँधियार।
दुख धराइस जेन तोला छीन के अधिकार।
ओ परानी के चतुर्री जान चिन्ह धिक्कार।
आखरी मा ओखरो बर एक दीया बार।

 छन्दकार - श्री सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'
               ग्राम - गोरखपुर, जिला - कबीरधाम, छत्तीसगढ़

10 comments:

  1. उत्कृष्ठ रचना सर

    ReplyDelete
  2. एक दीया बार बहुत सुन्दर सर

    ReplyDelete
  3. वाहह बहुत जोर दार रोशनी वाले दीया ये रचना लिख के माध्पम ले आप मन बारे हव येखर ज्योति कभू नइ बुझाय न तेल सिराय

    ReplyDelete
  4. बहुत सुघ्घर सृजन भाई सुखदेव एक दीया बार रूपमाला छंद बहुत बढ़ियाँ बधाई हो भाई जी

    ReplyDelete
  5. बड़ सुग्घर रचना

    ReplyDelete
  6. अड़बड़ सुग्ग्घर रचना सर जी

    ReplyDelete