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Tuesday, September 8, 2026

गंगोदक सवैया राम ही कृष्ण हे

  कमलेश प्रसाद 20 शरमाबाबू: गंगोदक सवैया 

राम ही कृष्ण हे  

राम ही कृष्ण हे कृष्ण ही राम हे, तैं इहाँ देख ले जी सबो रूप मा। 

हे विधाता उही प्रान दाता उही, वो बसे देख छाया घलो धूप मा । 

वो भिखारी अनाड़ी सबो के पिया, रौशनी डार देथे घलो कूप मा । 

हे बड़े कोन छोटे ल देखै नही, भक्त "बाबू" बना देथे वो भूप ला ।

कमलेश प्रसाद शर्माबाबू

[9/4, 2:10 PM] कमलेश प्रसाद 20 शरमाबाबू: मंदार माला सवैया 

कान्हा 

कान्हा बजावै चढ़े पेड़ बंशी रिझावै सबो गोप ग्वाला उहाँ ।

भागै सबो काम कौड़ी उहाँ छोड़ बैठे हवै जी कन्हैया जहाँ | 

गैया भुलावै चरे घास नाही लुकागे हवै मोर कान्हा कहाँ । 

"बाबू" बिराजे मुड़ी मोरपंखा खड़े साँवरा गोप नाचै तहाँ ।

कमलेश प्रसाद शर्माबाबू कटंगी-गंडई

[9/4, 2:10 PM] कमलेश प्रसाद 20 शरमाबाबू: मदिरा सवैया

मोहन के मुरली

मोहन के मुरली यमुना तट बाजय ग्वालिन दौड़ पड़े।

गोकुल के गलियाँ मनभावन देखत लोगन रोज खड़े।

माणिक काँचन हीर जवाहर नंद बबा घर खंब जड़े । 

नाचत कूदत हें ‘शरमा’ सब बाल सखा मन रोज अड़े ॥

कमलेश प्रसाद शर्माबाबू

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