कज्जल छंद- परब कमरछठ
परब कमरछठ हवय खास।
महतारी रहिथें उपास।
कोरा सुख के रखे आस।
सब संकट के हो विनाश।।
भादो के छठ हरय माह।
सुख सम्मत के हवय चाह।
रखव बनाये प्रभु निगाह।
रहय बिराजे घर उछाह।।
अँगना मा सगरी खुदाय।
कथा पुजारी हा सुनाय।
पान प्रसाद तहाँ बटाय।
ये प्रकार ले व्रत मनाय।।
बिन नाँगर के अन्न भोज।
पसहर चाउँर लाँय खोज।
भैंस दूध घी एक रोज।
खाथें भाजी बोज-बोज।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/09/2026
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