कुण्डलिया-रक्षाबंधन
बंधन बाँधय हाँस के, बहन निभावय रीत।
हिरदे मा भर प्रीत ला, मन भाई के जीत।
मन भाई के जीत, प्रीत के बाँधय धागा।
कुमकुम तिलक लगाय, सुघर पहिराये पागा।
भाई हे अनमोल, करे बहिनी आराधन।
हाँसत अउ हँसवात, प्रीत के बाँधत बंधन।।
रक्षाबंधन प्रीत के, सुग्घर आय तिहार।
डोरी रेशम के बने, राखी के ये तार।
राखी के ये तार, मया के भाव जगाथे।
हिय मा उठे उमंग, सदा खुशियाँ बरसाथे।
बहिनी मन के संग, मगन हे भाई के मन।
झूमय घर-परिवार, मना के रक्षाबंधन।।
विजेन्द्र कुमार वर्मा
नगरगाँव (धरसीवां)
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