सरसी छंद- *नमन- नमन सौ बार*
हे! महेंद्र देवांगन 'माटी', नमन -नमन सौ बार।
कलम सिपाही सुरता तोरे, करय छंद परिवार।।
छंदकार कवि लेखक उम्दा, साहित के मर्मज्ञ।
लिखे कहानी गोठ सियानी, करे कर्म के यज्ञ।।
बोली राहय मृदुभाषी अउ, सरल सहज व्यवहार।
हे! महेंद्र देवांगन 'माटी', नमन -नमन सौ बार।।
सब बर दया मया हिरदे मा, मुख मा नित मुस्कान।
शिक्षा के तँय जोत जलाये, गुरु बन बाँटे ज्ञान।
'पुरखा के इज्जत' बर देये, गहना 'तीज तिहार'।
हे! महेंद्र देवांगन 'माटी', नमन -नमन सौ बार।।
'माटी के काया' माटी मा, मिलगे संगी तोर।
बोल बिधाता काबर हम ला, दुख मा दिये चिभोर।।
सुन्ना हे साहित के अँगना, सुन्ना हे घर द्वार।
कलम सिपाही सुरता तोरे, करय छंद परिवार।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 16/08/2026
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