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Tuesday, September 8, 2026

कुकुभ छंद-माटी मोर महतारी*

 *कुकुभ छंद-माटी मोर महतारी*


माटी ला झन खाबे कान्हा, दाँत तोर सर जाही गा।

ग्वाल बाल गोकुल के तोला, सरहा कहि कुड़काही गा।।

देह करे बीमार बिहारी, अड़बड़ पेट पिराही गा।

नइ देवय का खाय पिये बर,अपजस लोग लगाही गा।।

माटी ला झन खाबे कान्हा.............



कहे यशोदा सुन तो लाला, श्रीखंड देत हँव आजा,

खीर पुड़ी अउ माखन मिश्री, खा पेट भरत ले राजा,

अरन-पपइ अंगूर बिही हे, अनानास आमा ताजा,

मोहनभोग जलेबी पेड़ा, मनभर तैं खाले खाजा,

नंदबबा के नव लख गइँया, काम कोन दिन आही गा।

माटी ला झन खाबे कान्हा......


दूध दही माढ़े सींका मा, छाँछ भरे हे गगरी मा,

काबर तैं छुछवाथस बेटा,पर के रोज डेहरी मा,

मटका टोर-फोर ले होवत, बदनामी बड़ नगरी मा,

लिगरी करथे ग्वालिन मिलके, बिहना साँझ दुपहरी मा,

लाज बहुत के आथे ललना, मिलय नही अउ काँही गा।

माटी ला झन खाबे कान्हा...........


कहे कन्हैया सुनले मइँया, माटी काबर खाथँव ओ,

खेलत हाबँव जे भुइँया मा, ओला माथ नवाँथँव ओ,

छप्पन भोग मिठावत नइहे, खाथँव कहाँ अघाथँव ओ,

माटी माखन मा महतारी, तोर मया ला पाथँव ओ,

चंदन जननी जनमभूमि हर, भव ले पार लगाही गा।

माटी ला झन खाबे कान्हा..........



🙏🙏🙏🙏

नारायण प्रसाद वर्मा *चंदन*

ढाबा-भिंभौरी, बेमेतरा छग

7354958844

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