विष्णुपद छंद
बिन स्वारथ के ज्ञान जगत मा, वो बगरावत हे।
रोज छात्र मन ला शिक्षक हा, खूब पढ़ावत हे।।
पढ़ा रोज लइका ला शिक्षक, देवय ज्ञान इहाँ।
परमारथ बर जिनगी अर्पित, काम महान इहाँ।।
जइसे बरसा ये भुइँया के, प्यास बुझावत हे।
जइसे रद्दा मनखे मन ला, घर पहुँचावत हे।।
नदी कुआँ अउ रुखराई, पर सेवा करथे।
जंगल पर्वत खेतीबारी, सबके दुख हरथे।।
माटी के लोंदा ला सुग्घर, दे आकार इहाँ।
आनी बानी जिनिस बनाथे, रोज कुम्हार इहाँ।।
शिक्षक हा शिक्षक के शिक्षक, लइका मास्टर हे।
नेता अधिकारी वकील अउ, कोनो डॉक्टर हे।।
ज्ञानुदास मानिकपुरी
चंदेनी- कवर्धा
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