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Saturday, December 21, 2019

सार छंद - श्लेष चन्द्राकर

सार छंद - श्लेष चन्द्राकर
विषय - रोजगार

रोजगार मिलना मुसकुल हे, नव पीढ़ी ला भइया।
इहाँ ठेलहा घूमत रहिथें, कतको पढ़े लिखइया।।

डिगरी धर के बइठे रहिथें, कहाँ नौकरी पाथें।
टूट जथे जब उनकर सपना, काम ठियाँ मा जाथें।।

उनकर सुनवाई होथे गा, जेमन पइसा ढिलथें।
इहाँ सिफारिश वाला मन ला, आज नौकरी मिलथें।।

रोजगार गा मिले सबो ला, ये उदीम कब होथे।
खुद सन ये अन्याव देख के, नव पीढ़ी हा रोथे।।

सबो हाथ ला काम मिले अब, अइसे होना चाही।
बइठे हन उम्मीद लगा के, नवा बिहिनिया आही।।

विषय - जनसंख्या

जनसंख्या बड़ बाढ़त हावय, कमती हे संसाधन।
अलकरहा उपयोग करत हे, बिन सोचे मनखेमन।।

बेटा के चाहत मा मनखे, जब परिवार बढ़ाथे।
बाढ़ जथे जब घर के खर्चा, तब अब्बड़ पछताथे।।

बेटी ला बेटा कस मानयँ, झन परिवार बढ़ावयँ।
पढ़ा लिखा के सुग्घर उनकर, जिनगी घला बनावयँ।।

कहाँ मिलत हे रोजगार गा, जनसंख्या के सेती।
बेचावत घर-द्वार सबो के, कम होगे हे खेती।।

काबू मा रइही जनसंख्या, जाग जही तब सबझन।
अउ अपनाही मनखे मन हा, जब परिवार नियोजन।।

छंदकार - श्लेष चन्द्राकर,
पता - खैरा बाड़ा, गुड़रु पारा,
महासमुन्द (छत्तीसगढ़)

33 comments:

  1. बहुत सुग्घर सर

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  2. बहुत ही सुंदर रचना

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  3. वाह अति सुन्दर सर जी । बधाई हो

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  4. बहुत सुघ्घर हे भाई
    सार छंद

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  5. बहुत सुंदर रचना भाई
    बधाई

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  6. बहुत बढ़िया रचना सर जी
    बधाई हो

    महेन्द्र देवांगन माटी

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  7. बड़ सुग्घर सृजन सर जी
    बधाई हो.....

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  8. वाह-वाह
    शानदार भाई

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  9. बहुतेच सुग्घर सार छंद हे।हार्दिक बधाई

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  10. बहुत सुंदर रचना

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  11. सिरतोन कहत हव चन्द्राकर भइया अब्बड़ सुग्घर सन्देश देवत सार छंद भइया बधाई

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  12. बढिया रचना के लिए बधाई अच्छा संदेश

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