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Friday, September 11, 2026

सार छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 सार छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


छँइहा


किम्मत कतका हवै छाँव के,तभे समझ मा आथे।

घाम घरी जब सुरुज देव हा,आगी असन जनाथे।


गरम तवा कस धरती लगथे,सुरुज आग के गोला।

जीव जंतु अउ मनखे तनखे,जरथे सबके चोला।।


तरतर तरतर चुँहे पछीना,रहिरहि गला सुखाथे।

घाम घरी जब सुरुज देव हा,आगी असन जनाथे।



गरमे गरम हवा हा चलथे,जलथे भुइयाँ भारी।

घाम घरी बड़ जरे चटाचट, टघले महल अटारी।


पेड़ तरी के जुड़ छँइहाँ मा,अंतस घलो हिताथे।

घाम घरी जब सुरुज देव हा,आगी असन जनाथे।



मनखे मन बर ठिहा ठउर हे,जीव जंतु बर का हे।

तरिया नदिया पेड़ पात हा,उँखर एक थेभा हे।


ठाढ़ घाम मा टघलत काया, छाँव देख हरियाथे।

घाम घरी जब सुरुज देव हा,आगी असन जनाथे।


पेड़ तरी के घर जुड़ रहिथे,पेड़ तरी सुरतालौ।

हरे पेड़ पवधा हा जिनगी,सबझन पेड़ लगालौ।


पानी पवन हवै पवधा ले,खुशी इही बरसाथे।

घाम घरी जब सुरुज देव हा,आगी असन जनाथे।



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा




जयकारी (चौपई) छंद - पेट


पेट देख के होवय गोठ,कखरो पातर कखरो मोठ।

देख पेट ला जाबे जान,कोन सेठ मजदूर किसान।1।


पेट करावय करम हजार,कोनो खावय दर-दर मार।

नाचा गम्मत होय व्यपार,सजे पेट बर हाट बाजार।2।


पेट पालथे कोनो हाँस,कोनो ला गड़ जाथे फाँस।

धरे पेट बर कोनो तीर,ता कोनो बन जावय वीर।3।


मचे पेट बर कतको रार,कोनो बेंचें खेती खार।

पेट पलायन कभू कराय,गाँव ठाँव सबला छोड़ाय।4।


नाप नाप के कोनो पेट,खान पान ला करे ग सेट।

कोनो भूख मा पेट ठठाय,कोनो खा पी के अँटियाय।5।


कखरो पेट ल भाये नून,कोनो पी जावय गा खून।

कोनो खोजे मँदिरा माँस,पेट फुलावय कोनो हाँस।6।


पेट भरे तब लालच आय,धन दौलत मनखे सिरजाय।

पेट जानवर के दमदार,तभो धरे नइ चाँउर यार।7।


बित्ता भर वाले ला देख,रटे पेट ताकय कर रेख।

रखे पेट खातिर धन जोर,कतको मन बन जावय चोर।8।


ऊँच नीच जब खाना होय,पचे नहीं बीमारी बोय।

पेट पीरा हर लेवय चैन,पेट कभू बरसावय नैन।9।


लाँघन ला दौ दाना दान,पेट हरे सबझन के जान।

दाना चाही दूनो जून,पेट भरे ता मिले सुकून।10।


ढोंगी अधमी पावै दुःख, मरे पेट ओ मन के भूख।

करे जउन मन हा सतकाम,पेट भरे वो सबके राम।11।


छन्दकार - श्री जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

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