37, पद पादाकुलक छंद-
सेवा माटी के करहूँ
ऊँच अगास अमरना नइहे।
अउ पताल मा गड़ना नइहे।।
धरती मा सोना उपजाहूँ।
धरती दाई के गुण गाहूँ।।
आन ठिहा मा सीना जोरी।
अच्छा नोहे जिद अउ चोरी।।
अपन हवा पानी मतलाके।
दुसर तीर का फभहूँ जाके।।
माटी मा जीना मरना हे।
धरम करम इँहिचे करना हे।।
माटी छोड़ हवा मा उड़ना।
बीच भँवर मा जइसे बुड़ना।।
माटी मा हे घर बन मोरे।
दाना पानी माटी जोरे।।
माटी के महिमा बड़ भारी।
नइ भूलौं एला सँगवारी।।
आवँव मैं माटी के बेटा।
खेलँव धुर्रा माटी लेटा।।
पावन पबरित माटी कोरा।
नइ भूँजँव माटी मा होरा।।
महिनत कर माटी हरियाहूँ।
माटी के मैं मान बढ़ाहूँ।।
माथ मलौं मैं माटी धुर्रा।
रहौं सदा माटी में गुर्रा।
माटी मा यमुना गंगा हे।
माटी ले मनखे चंगा हे।।
माटी ले दुरिहावै जेहा।
दुख पीरा भोगे बड़ तेहा।।
नदियाँ नरवा जंगल झाड़ी।
माटी मा भागे बड़ गाड़ी।।
माटी तो मूँगा मोती ए।
माटी तो जीवन जोती ए।।
माटी मान हरे सबझन के।
हरे निसानी माटी धन के।।
माटी मा चाँदी सोना हे।
मँहुला तो माटी होना हे।।
माटी देवय महिनत के फल।
दफने इँहचे हें आजे कल।।
माटी पोंसे माटी पाले।
अउ आ मोहन माटी खाले।।
-
बेटी
जुगनू बन बरहूँ मैं दाई।
उजियारा करहूँ मैं दाई।।
घर बन के करहूँ रखवारी।
कहिलाहूँ बेटी महतारी।।
मोरो अन्तस् मा सपना हे।
सोन असन मोला तपना हे।।
पढ़ लिख के आघू मैं बढ़हूँ।
ऊँच सिंहासन में मैं चढ़हूँ।।
जस सेवा सतकार करे बर।
सब मा ममता मया भरे बर।।
बिन बोले मैं कारज करहूँ।
दीन दुखी के संकट हरहूँ।।
जेन दिखाही आँखी मोला।
दू फाँकी करहूँ वो चोला।।
बेटी बहिनी महतारी बर।
जागत फिरहूँ मैं आरी धर।।
मैं दुर्गा चंडी कंकाली।
मोर रहे नइ रीता थाली।।
कोनो कारज ला नइ छोडौ़।
पुरवा पानी के पथ मोडौ़।।
धरती सँग आगास अमरहूँ।
अब्बड़ अचरज कारज करहूँ।।
कहिलावँव नइ मैं अब अबला।
बन चढ़ ढाहूँ मैं बन सबला।।
38,निच्छल छंद
छत के घर
हाँस हाँस छत के घर मा सब, जिनगी पहाय।
बिन सुविधा के फेर इसन घर, बिरथा ताय।।
चाही पानी बिजली पंखा ,सेज पलंग।
बरसा जाड़ा हाँसत बुलके, गर्मी तंग।।
छत हा पिघले गर्मी दिन मा, घाम जनाय।
कूलर ए सी फ्रीज जिया ला, गजब लुभाय।
छानी परवा के दिन बहुरे, बने अटार।
बरसा पानी संग बेंदरा, पाय न पार।।
इही समय के माँग हरे जी, सबे बनाय।
छानी वाले घर अँगरी मा, आज गनाय।
हीटर कूकर गैस बिना बड़, घर करियाय।
चूल्हा लकड़ी छेना आगी, नइ तो भाय।
आंधी पानी के संसो नइ, चिटिको होय।
छत के घर हा मनखे मन बर, सुविधा बोय।
मुसवा मन हा बिना बिला के, मानय हार।
देखे बर अब घलो मिले नइ, घून दिंयार।।
कहाँ मेकरा परछी घर मा, जाल बनाय।
छानी परवा बिन गौरैया, जाँय नँदाय।।
पाठ पठौवा गोड़ा कोठी, कहिनी होय।
जाँता मुसर बाहना ढेंकी, छत घर खोय।।
अँगना परछी छत छानी मा, छाय सीमेंट।
चर दिनिया जिनगी पर घर हे, परमानेंट।।
समुंदर
कतको नॅदिया कतको झिरिया, जिहां समाय।
पानी पानी जम्मों कोती, रहे भराय।
सब मनखे ला एक झलक के, रहिथे आस।
सागर फेर बुझाय नहीं जी ,कखरो प्यास ।।
जिहाँ भराये रहिथे भारी, खारो नीर ।
खपगे सागर ला नापत ले, कतको बीर।।
सागर जब तक शांत हवै तब, तट मा खेल।
सागर के ताकत के आघू, सब हे फेल ।।
ऊंच ऊंच लहरा धर सागर, बड़ इतराय।
सागर के रेती अउ पानी, जिया लुभाय।।
सबले बड़का रूप प्रकृति के ,सागर ताय।
कभू लेव झन कोनो मनखे, एखर हाय।।
39,माहिया छंद
छेरछेरा
चंदा गोलियाये हे।
पूस पुन्नी के दिन।
छेर छेरा आये हे।।
लागे पबरित बेरा।
का छोटे का बड़े।
माँगे सब छेरछेरा।।
अँगना हवै लिपाये।
हूमधूप धुँवा उड़े।
छेरछेरा परब आये हे।।
कोनो ला झन तैं हीन।
मया म माँगत हे,
नोहे कोनो मनखे दीन।।
ठोमहा ठोमहा दे दे।
हँसहँस के अन्न धन।
सबे के दुवा ले ले।।
ढोलक डंडा बाजे।
गाँव गली गूँजे।
छेरिक छेरा रागे।।
सुवा डंडा के राग।
तन मन ला मोहे।
जुड़े मया के ताग।।
का लइका का सियान।
जुरमिल के सब झन।
पाये दया मया दान।।
सब छोड़ गरब अभिमान।
घूम ले गाँव गली।
पाले दया मया दान।।
मिले अउ मिलाये के।
छेरछेरा ए तिहार।
मया गीत गाये के।।
आज के दिन के अन्न दान।
अड़बड़ पावन हे।
सब दान ले हवै महान।।
का गत हे
कागत बर का गत हे।
मनखे मन ला देख,
पइसा कहि भागत हे।।
लालच मा धँसगे हे।
माया चारा मा,
मछरी कस फँसगे हे।।
खाये जेन थारी मा।
तेला छेदा करे,
इरसा के आरी मा।।
जे ठउर ठिहा आये।
तउने ला उजारे,
वोला कोन समझाये।।
देखावा मा नित पड़े।
मनखे मखमल बिछा,
खुरवा के उपर खड़े।।
आघू म मीठ बोले।
फेर पाछू जाके,
जिनगी म जहर घोले।।
पानी के पास खड़े।
मनखे प्यास मरे,
होवय अचरज अबड़े।।
धनधन कहिके रटथे।
फेक गरी मया के,
फोकट तीर म डॅटथे।।
वो का होवै पर के।
जेन ह होय नही,
अपनेच घलो घर के।।
जे तीरथ बरत करे।
छोड़ दाई ददा,
कइसे भला वो तरे।।
सिधवा के सब बैरी।
का घर अउ का बन,
मताये सब गैरी।।
40, मधुशाला छंद
दारुभट्ठी
गाँव गली पथ शहर नगर मा, दिख जाथे दारू भट्ठी।
इहाँ बड़े छोटे नइ लागे, सब आथे दारू भट्ठी।
सब ला एक समान समझ के, कहै जेब कर लौ खाली,
अपन तिजोरी मा पइसा नित, खनकाथे दारू भट्ठी।।
भीड़ भाड़ रहिथे मनखे के, चहल पहल रहिथे भारी।
रदखद दिखथे चारो कोती, करे नही कोनो चारी।
कतको झन छुप छुपके लेवैं, कतको झन खुल्लम खुल्ला,
झगरा माते दिखे इही कर, दिखे इही कर बड़ यारी।।
कोनो कोनो गम कहि ढोंके, कोनो पीये मस्ती मा।
साहब बाबू कका बबा का, सब सवार ये कस्ती मा।
लड़भड़ाय पीये पाये ते, खुदे मूड़ माड़ी फोड़े,
कतको पड़े अचेत इही कर, कतको भूँके बस्ती मा।।
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बिलायती कोनो पीये ता, कोनो देशी अउ ठर्रा।
रोक पियइया ला नइ पावै, गरमी पानी घन गर्रा।
अद्धी पाव जुगाड़ करे बर, कतको पाँव परत दिखथे,
नसा पान के कतको आदी, पीथें खीसा नित झर्रा।।
मालामाल आज अउ होगे, जेन रिहिस काली कँगला।
चिंता छोड़ पियइया पीये, बेंच भाँज घर बन बँगला।
रोज पियइया बाढ़त हावय, हाँसत हे दारू भट्ठी।
खाय हवै किरिया कतको मन, नइ छोड़े दारू सँग ला।।
पूल समुंदर में पी बाँधे, टार सके नइ जे ढेला।
चोर पुलिस सबझन के डेरा, भट्ठी मेर भरे मेला।
दारू छोड़व कहे सुबे ते, संझा दिखथे भट्ठी मा,
रोजगार तक देवै भट्ठी, हें दुकान पसरा ठेला।।
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छट्ठी बरही सब मा दारू, नइ सुहाय मुनगा मखना।
पी के मोम लगे कतको मन, ता कतको लागय पखना।
तालमेल तक दिखे गजब के, दिखे गजब दोस्ती यारी,
एक लेय बिन बोले दारू, एक जुगाड़े झट चखना।।
कतको सज धज बड़े बने हे, खुद बर खुद हार बनाके।
सब दिन हीने हें गरीब ला, ऊँच नीच पार बनाके।
एक पियइया होय बेवड़ा, फेर एक के फेंसन हे,
भला बुरा भट्ठी ला बोले, बड़का मन बार बनाके।।
हरे आज के थोरे दारू, सुन शराब के गाना ला।
कतको बाढ़े किम्मत चाहे, कोन भुले मयखाना ला।
अनदेखा करके सब पीथें, नसा नास के हाना ला,
गोद लिये सरकार फिरत हे, भट्ठी भरे खजाना ला।।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)
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