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Thursday, July 26, 2018

आल्हा छंद - श्री ललित साहू "जख्मी"

भारतीय लइका के चाह

ददा एक  बंदूक  बिसा दे, महूँ  चलाहूँ  गोली सोज।
बैरी मनला  मार भगाहूँ, चिपा कोनहा ले सब खोज।1।

आठ बछर के लइका मेहा, देंह  नानकुन  पातर हाथ।
फेर जबर हे  आगी  मन मा, देहूँ  मँय  सेना  के साथ।2।

रंग केरवच चुपर गाल मा, खाँखी चैनस मा तन ढाँक।
करिया लंबा बूट पहिर के, कइहूँ बैरी तँय झन झाँक।3।

भारत माँ  के महूँ  लाल अँव, बनहूँ  मँय बैरी बर काल।
राजनीति के दाँव पेंच अउ, उँखर बिफल करहूँ सब चाल।4।

मोर  जतन ला  दाई  करथे, पीरा अड़बड़  सइके रोज।
कलपत वोला देखत रहिथँव, बता मोर कइसे हो भोज।5।

आँखी बड़का  करके  मेहा, कइहूँ  ले अब येती कूद।
लइका-लइका ये भारत के, खुदे  हरे  गोला बारूद।6।

बैरी के छाती ला चिर के, महूँ  निभाहूँ  सेना रीत।
जइसे चाँटी बड़ हाथी ले, हिम्मत करके जाथे जीत।7।

लड़त-लड़त मर जहूँ भले मँय, तबले नइ देखावँव पीठ।
कोनों काहीं कहिले करले, देश जतन बर मँय हौं ढीठ।8।

ददा एक अउ अरजी सुनले, दाई के तँय रखबे ध्यान।
मुरछा खाके वो गिरही जब, मोर देखही तन बेजान।9।

बहिनी राखी धरे खोजही, कहिबे अब रद्दा झन देख।
गोठ बात पतिया ले बेटी, अब जादा झन तहूँ सरेख।10।

झन धरबे तँय तमगा एको, अउ पइसा ला देबे फेंक।
हाथ जोड़ बस बिनती करबे, मतलब के रोटी झन सेंक।11।

तीन रंग के कपड़ा लपटे, भले मोर तन हा झन आय।
फेर देश के जम्मों जनता, भारत माँ के जय बोलाय।12।

रचनाकार- ललित साहू "जख्मी"
पता- छुरा, जिला- गरियाबंद, छत्तीसगढ़