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Friday, July 3, 2020

कुण्डलिया-श्री सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'

कुण्डलिया-श्री सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'

(1)

खोलव सोशल मीडिया, रोज मिलत हे ज्ञान।
पढ़व सुनव देखव बने, समझव दे के ध्यान।
समझव दे के ध्यान, धरे लाइक ला धरलव।
निज आदत व्यवहार, कार्य मा शामिल करलव।
सबके सुनव विचार, कभू अपनो ला बोलव।
वट्सप इन्स्टाग्राम ,फेसबुक ट्विटर ल खोलव।

(2)

देखत हन हर हाथ मा, आज फोर जी सेट।
दुनियाभर के सोच ला, जोड़ रखे हे नेट।
जोड़ रखे हे नेट, विचारन ला जन मन के।
बुढ़वा के मनभाव , लइकई ला बचपन के।
होही सद् बदलाव, अकारथ हम छेकत हन।
समय अपन अनुकूल, भविस गढ़थे देखत हन।

(3)

जेखर श्रम के अन्न ले, पले जगत परिवार।
ओ किसान भगवान के, होवय जयजेकार।
होवय जयजेकार, गड़य झन पॉंव म कॉंटा।
सुखी रहय संतान, मिलय अमरित के बॉंटा।
कभू न होय शिकार, सुवारथ भेद भरम के।
पले जगत परिवार , अन्न ले जेखर श्रम के।

(4)

जिनगानी के चार दिन, काटव छइहॉं घाम।
करत रहौ सतकाम ला, जपत रहौ सतनाम।
जपत रहौ सतनाम, मगन मन अंतस राखे।
बनही जगत विधान, करे कारज मुॅंह भाखे।
जग अपनाही श्वेत, सियानी खानी बानी।
सुफलित संत सुजान, जनम जोनी जिनगानी।

रचना-सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'
गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़