दुर्मिल सवैया छंद - श्रीमती वसंती वर्मा
(1)
बिहना उठके अब धान लुये बर जावत हे पकलू कमिया ।
पटकू गमछा कुरता करिया पहिरे पनही धरके हसिया ।
धरसा तिर रेंगत जावत वोहर गावत गीत लगे बढ़िया ।
टुकनी चरिहा धर काँवर मा पकलू पहुँचे बहरा सुतिया।
(2)
कचरा झन फेंकव खोल गली घर के मुँहटा अब तो मनसे।
मन के कचरा अब साफ करो हरि नाम जपो सबरी जइसे।
कचरा कस फेंक बुरा अबके कर काम बने जग में अइसे।
जिनगी अनमोल सकेल मया अउ बाँट मया मनुआ सबसे।
रचनाकार - श्रीमती वसंती वर्मा
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(1)
बिहना उठके अब धान लुये बर जावत हे पकलू कमिया ।
पटकू गमछा कुरता करिया पहिरे पनही धरके हसिया ।
धरसा तिर रेंगत जावत वोहर गावत गीत लगे बढ़िया ।
टुकनी चरिहा धर काँवर मा पकलू पहुँचे बहरा सुतिया।
(2)
कचरा झन फेंकव खोल गली घर के मुँहटा अब तो मनसे।
मन के कचरा अब साफ करो हरि नाम जपो सबरी जइसे।
कचरा कस फेंक बुरा अबके कर काम बने जग में अइसे।
जिनगी अनमोल सकेल मया अउ बाँट मया मनुआ सबसे।
रचनाकार - श्रीमती वसंती वर्मा
बिलासपुर, छत्तीसगढ़