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Wednesday, September 13, 2017

सार-छंद - श्री असकरन दास जोगी

सार-छंद - श्री असकरन दास जोगी

करही पाके खनखन बाजे,
बमरी फर तो गाँसे !
परसा फूले बोइर झरगे,
लीम झुमर के हाँसे !!१!!

बनतुलसा के रुँधना काड़ी,
उल्ला भाजी बगरे !
डूमर डारा हरियर छाये,
मैना गावत हबरे !!२!!

सूरुज ऊँघत बुड़ती कोती,
पीपर पड़की डेरा !
घुघवा खुसरा बाहिर निकले,
होगे संझा बेरा !!३!!

पानी पसिया पीयावन जी
नोहय हमर झमेला !
सुरर-सुरर के डारन पैरा,
खावय गरुवा जेला !!४!!

बिजली बरगे अँगना अँगना,
मन मंदिर मा दीया !
पोहे अंग-अंग मा निरगुन,
सुरती बाँधे जीया !!५!!

धरम करम के पढ़ले पोथी,
तीरथ लागै अँगना !
राज-राज ला काबर फिरबे,
दाई बाँधत बँधना !!६!!

सार-छंद के रचना खाँटी,
सबद-सबद के मोती !
अलथा-कलथा बाँधवँ संगी,
पहिरवँ धोवा धोती !!७!!

रचनाकार - असकरन दास जोगी
ग्राम - डोंडकी, पोस्ट - बिल्हा , जिला - बिलासपुर
छत्तीसगढ़