सुरेश पैगवार *कुण्डलिया*
(1)
लेवत गुरु के नाम ले,मिट जाथे सब क्लेश।
समाधान सब के करय, धर के संतन भेष।।
धर के संतन भेष, बनाये जग ला ज्ञानी।
जड़ चेतन संसार, सबल मानौ गुरुबानी।
दिव्य ज्ञान के जोत, जगावे सद्गुन देवत।
होथे नैय्या पार, नाम गुरुवर के लेवत।।
(2)
वंदन गुरु के जे करै, पावै ज्ञान अपार।
सगरो गुन के खान बन,पार करे मँझधार।।
पार करय मँझधार, मान ले गुरु के कहना।
गुरु बतावय ज्ञान, मनुज ला कइसे रहना।
ये धन जेकर पास, तेकरे होथे वंदन।
लोग नवाथें माथ, सबो करथें अभिनंदन।।
(3)
बन के रबो सुपात्र तब,मिलही कृपा अपार।
ज्ञानवान बन जाय ले,मिलही मया दुलार।।
मिलही मया दुलार, माथ मा सजही चंदन।
छूट जही अभिमान,सबो करहीं अभिनंदन।
सच्चा गुरु के ज्ञान, कहाँ पाहौ जी मन के।
जब्भे पाबो मान, रबो जब लायक बन के।।
*सुरेश पैगवार*
जाँजगीर
(1)
लेवत गुरु के नाम ले,मिट जाथे सब क्लेश।
समाधान सब के करय, धर के संतन भेष।।
धर के संतन भेष, बनाये जग ला ज्ञानी।
जड़ चेतन संसार, सबल मानौ गुरुबानी।
दिव्य ज्ञान के जोत, जगावे सद्गुन देवत।
होथे नैय्या पार, नाम गुरुवर के लेवत।।
(2)
वंदन गुरु के जे करै, पावै ज्ञान अपार।
सगरो गुन के खान बन,पार करे मँझधार।।
पार करय मँझधार, मान ले गुरु के कहना।
गुरु बतावय ज्ञान, मनुज ला कइसे रहना।
ये धन जेकर पास, तेकरे होथे वंदन।
लोग नवाथें माथ, सबो करथें अभिनंदन।।
(3)
बन के रबो सुपात्र तब,मिलही कृपा अपार।
ज्ञानवान बन जाय ले,मिलही मया दुलार।।
मिलही मया दुलार, माथ मा सजही चंदन।
छूट जही अभिमान,सबो करहीं अभिनंदन।
सच्चा गुरु के ज्ञान, कहाँ पाहौ जी मन के।
जब्भे पाबो मान, रबो जब लायक बन के।।
*सुरेश पैगवार*
जाँजगीर